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"खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है"

'किशनपुर' गाँव में 'श्यामू' नाम का एक बहुत ही सीधा-सादा, मेहनती और संस्कारी लड़का रहता था। श्यामू रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले उठता, अपने बूढ़े पिता के पैर छूता और कंधे पर फावड़ा रखकर सीधा अपने खेत में काम करने चला जाता। वह न तो किसी से फालतू बात करता था और न ही उसे कोई बुरी लत थी। पूरे गाँव में श्यामू की मेहनत की मिसालें दी जाती थीं।

उसी गाँव की चौपाल के पीछे 'भैरों' नाम के एक आवारा लड़के का अड्डा था। भैरों और उसके तीन-चार दोस्त दिन भर ताश खेलते, बीड़ी पीते, गालियाँ बकते और कोई काम-धंधा नहीं करते थे।

बुरी संगति की शुरुआत: गर्मियों के दिन थे। एक दोपहर श्यामू खेत से काम करके लौट रहा था। धूप बहुत तेज़ थी और वह थक गया था। भैरों और उसके दोस्त पेड़ की ठंडी छाँव में बैठे ताश पीट रहे थे।

भैरों ने आवाज़ दी: "अरे ओ श्यामू! दिन भर गधे की तरह पसीना बहाता है। आ ज़रा दो मिनट पेड़ की छाँव में बैठ जा, बीड़ी का एक कश लगा ले, सारी थकान मिट जाएगी।"

शुरुआत में श्यामू ने मना किया, लेकिन थकान के कारण वह थोड़ी देर उनके पास बैठ गया। उसने बीड़ी तो नहीं पी, लेकिन उनके मज़ेदार और फालतू के चुटकुले सुनकर उसे बहुत हँसी आई। उसे लगा कि ये लोग कितने आराम से ज़िंदगी जी रहे हैं।

अगले दिन श्यामू फिर काम से लौटते वक्त उनके पास रुका। इस बार वह आधा घंटा बैठा।

रंग बदलना: धीरे-धीरे समय बीतने लगा। 'संगति का असर' किसी ज़हर की तरह श्यामू के दिमाग में फैलने लगा।

एक महीना बीतते-बीतते चमत्कारिक (और भयानक) बदलाव आ गया। अब श्यामू सुबह जल्दी नहीं उठता था। उसका फावड़ा घर के एक कोने में जंग खा रहा था। उसने अपने सादे कपड़े छोड़ दिए थे और भैरों की तरह गले का बटन खोलकर और रूमाल बाँधकर घूमने लगा था।

एक दिन दोपहर को, श्यामू के पिता उसे ढूँढते हुए चौपाल के पीछे पहुँचे। उन्होंने जो नज़ारा देखा, उससे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका वह मेहनती और सीधा बेटा 'श्यामू', भैरों और उसके आवारा दोस्तों के साथ ज़मीन पर बैठा 'ताश के पत्ते फेंट रहा था' और उसके मुँह में बीड़ी दबी हुई थी!

पिता की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने आगे बढ़कर श्यामू के हाथ से ताश के पत्ते छीन लिए और उसे ज़ोरदार तमाचा मारा— 'चटाक्!'

श्यामू सहम कर खड़ा हो गया। भैरों और उसके दोस्त वहाँ से खिसक लिए। पिता ने श्यामू को झकझोरते हुए और रोते हुए कहा: "श्यामू! तू तो मेरे खेत का सबसे होनहार और मेहनती लड़का था। तू इन आवारा और कामचोर लड़कों की संगत में कैसे पड़ गया? आज तेरा खेत सूख रहा है और तू यहाँ बैठकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहा है।"

गाँव के एक बुजुर्ग जो वहीं बैठे थे, उन्होंने गहरी साँस लेते हुए पिता से कहा: "रामदीन भाई! इसमें इतना हैरान होने की बात नहीं है। जब एक टोकरी में एक अच्छा खरबूजा किसी दूसरे पके हुए या सड़े हुए खरबूजे के पास रखा जाता है, तो वह उसकी गर्मी और रंगत देखकर खुद भी वैसा ही रंग पकड़ लेता है। इंसान का स्वभाव भी ऐसा ही है। श्यामू इन बिगड़ैल लड़कों के साथ बैठा, तो इसने भी वही आवारागर्दी सीख ली। इसी को तो कहते हैं— 'खरबूजे को देखकर... खरबूजा रंग बदलता है!'"

(यानी जैसी संगति में बैठोगे, वैसा ही रंग तुम्हारे ऊपर भी चढ़ेगा)। श्यामू को अपनी गलती और अपनी बिगड़ती हुई हालत का अहसास हुआ। उसने उसी दिन उन आवारा दोस्तों का साथ छोड़ दिया और पिता से माफ़ी माँगकर वापस अपने खेत की तरफ लौट गया।

🎉 कहानी समाप्त

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