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"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता"

'संग्रामपुर' गाँव पर 'ज़मींदार गज़राज सिंह' का खौफनाक राज था। गज़राज सिंह बहुत ही क्रूर इंसान था। उसके पास डंडे और बंदूकों वाले 'पचास गुंडों' की फौज थी। वह गाँव के गरीब किसानों से ज़बरदस्ती दुगना लगान वसूलता था और जो मना करता, उसे बुरी तरह पिटवाता था।

पूरा गाँव ज़मींदार से खौफ खाता था और कोई उसके खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं करता था।

उसी गाँव में 'शिवा' नाम का एक नौजवान खून वाला लड़का रहता था। शिवा बहुत बहादुर था। एक दिन जब गज़राज के गुंडे एक गरीब बूढ़े किसान को मार रहे थे, तो शिवा से रहा नहीं गया।

अकेले की लड़ाई: शिवा का खून खौल उठा। उसने सोचा, "यह गाँव वाले तो डरपोक हैं, मैं अकेला ही इस ज़मींदार को सबक सिखाऊँगा!"

शिवा ने एक मोटी लाठी उठाई और सीधा ज़मींदार की हवेली पर पहुँच गया। उसने दहाड़ते हुए गज़राज सिंह को ललकारा। गज़राज ने अपने गुंडों को इशारा किया।

शिवा ने बहुत बहादुरी से लड़ाई की। उसने चार-पाँच गुंडों को ज़मीन पर भी गिरा दिया— 'ढिशुम... ढिशुम!' लेकिन गुंडे 'पचास' थे और शिवा 'अकेला'। जल्द ही गुंडों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और लाठियों से उसे बुरी तरह पीट-पीट कर अधमरा कर दिया।

शाम को शिवा खून से लथपथ, लंगड़ाता हुआ गाँव वापस लौटा। वह दर्द से कराह रहा था और उसकी आँखों में हार के आँसू थे।

एकता की ताक़त: गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार 'काका' ने शिवा के घावों पर लेप लगाया। काका ने प्यार से शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा: "शिवा बेटा! तेरी बहादुरी पर हमें गर्व है। लेकिन तेरी बेवकूफी यह थी कि तू अकेले ही उस ज़ालिम फौज से टकराने चला गया। याद रख बेटा, भट्ठी कितनी भी गर्म क्यों न हो, एक 'अकेला चना उछलकर भाड़ (भट्ठी) को नहीं फोड़ सकता'। एक चने की कोई ताक़त नहीं होती, लेकिन जब हज़ारों चने एक साथ उछलते हैं, तो भट्ठी भी फट जाती है।"

शिवा को काका की बात समझ आ गई। उसने अपनी हार से बहुत बड़ी सीख ली।

अगले दिन, शिवा अकेले नहीं गया। उसने रात भर पूरे गाँव में घूम-घूम कर किसानों को इकट्ठा किया। उसने सबके दिलों से डर निकाल दिया। जब अगली सुबह ज़मींदार गज़राज सिंह के गुंडे गाँव में लगान वसूलने आए, तो उनका सामना एक शिवा से नहीं, बल्कि हाथ में फावड़े, कुल्हाड़ी और लाठियाँ लिए 'पाँच सौ गाँव वालों की एक विशाल और ग़ुस्साई हुई भीड़' से हुआ!

गाँव वालों की एकता और उनका खौफनाक रूप देखकर गुंडों के पसीने छूट गए। गुंडे अपनी जान बचाकर ऐसे भागे कि पलट कर वापस नहीं आए। ज़मींदार गज़राज सिंह को भी गाँव छोड़कर भागना पड़ा।

शिवा ने मुस्कुराते हुए काका से कहा: "काका! आपने बिल्कुल सही कहा था। जब तक मैं अकेला चना था, मैं हार गया। लेकिन आज पूरे गाँव ने मिलकर ज़मींदार का 'भाड़' फोड़ दिया!"

और इस तरह पूरे गाँव ने मिलकर अपनी आज़ादी हासिल कर ली।

🎉 कहानी समाप्त

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