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😄 शेखचिल्ली

अल्लाह का माल (मुफ्त की मिठाई)

लोक परंपरा4 मिनट का पठन
अल्लाह का माल (मुफ्त की मिठाई)

शेख चिल्ली की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह हर बात का बिल्कुल 'शाब्दिक अर्थ' (Literal meaning) निकाल लेता था। किसी बात के पीछे की गहराई या असल मतलब को समझना उसके बस की बात नहीं थी।

एक दिन शुक्रवार (जुमे) का दिन था। गाँव की मस्जिद में मौलवी साहब गाँव वालों को बहुत ही अच्छी और गहरी आध्यात्मिक बातें समझा रहे थे। शेख चिल्ली भी पहली कतार में बैठकर मौलवी जी की बातें बहुत ध्यान से सुन रहा था।

मौलवी जी ने बहुत ही भावुक होकर कहा, "ऐ मेरे भाइयो! याद रखो, इस दुनिया में हमारा अपना कुछ भी नहीं है। यह ज़मीन, यह आसमान, यह धन-दौलत, अनाज और खाने-पीने की सारी चीज़ें... सब अल्लाह की बनाई हुई हैं। इस दुनिया की हर चीज़ पर सिर्फ और सिर्फ 'अल्लाह का हक' है। हम तो बस खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएँगे। इसलिए कभी किसी चीज़ को 'अपना' मत कहो, सब अल्लाह का माल है!"

मौलवी जी की यह बात शेख चिल्ली के दिमाग में एक पत्थर की लकीर की तरह छप गई। उसे लगा कि आज उसे दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान मिल गया है।

शेख चिल्ली ने मन ही मन सोचा: "वाह! मौलवी जी ने तो मेरी सारी चिंताएँ ही खत्म कर दीं। जब इस दुनिया की हर चीज़ 'अल्लाह का माल' है, तो फिर मुझे पैसे कमाने की क्या ज़रूरत है? मैं जो चाहूँ खा सकता हूँ, जो चाहूँ ले सकता हूँ, क्योंकि सब कुछ तो अल्लाह का ही है!"

मस्जिद से बाहर निकलते ही शेख चिल्ली सीधा गाँव के बाज़ार की तरफ चल दिया। उसे बहुत ज़ोरों की भूख लग रही थी।

बाज़ार के चौराहे पर 'गफूर हलवाई' की एक बहुत बड़ी दुकान थी। गफूर हलवाई बहुत ही गुस्सैल आदमी था। उस वक्त गफूर अपनी भट्टी पर एक बड़ी सी कड़ाही में देसी घी की 'गरमा-गरम जलेबियाँ और गुलाब जामुन' तल रहा था। दुकान के बाहर मिठाइयों की खुशबू महक रही थी।

शेख चिल्ली दुकान पर गया। उसने बिना गफूर हलवाई से कुछ पूछे, अपना हाथ सीधा एक बड़ी सी थाली में डाला और एक बड़ा सा गुलाब जामुन उठाकर अपने मुँह में रख लिया।

गुलाब जामुन खाते ही शेख ने आँखें बंद कर लीं और मगन होकर बोला, "वाह! अल्लाह के माल का क्या स्वाद है!"

फिर उसने दूसरी थाली में से एक मुट्ठी भर गरमा-गरम जलेबियाँ उठाईं और उन्हें भी गपागप खाने लगा। गफूर हलवाई, जो कड़ाही के पास खड़ा था, यह सब देखकर हक्का-बक्का रह गया।

गफूर ने कड़छी हाथ में लेकर गुस्से से चिल्लाया, "अरे शेख चिल्ली! क्या पागल हो गया है? बिना पैसे दिए, बिना मुझसे पूछे मेरी मिठाइयाँ क्यों खा रहा है? चल जल्दी से दस रुपये निकाल!"

शेख चिल्ली ने बहुत ही शांति से एक और जलेबी मुँह में डाली और मौलवी जी वाले ज्ञानी अंदाज़ में कहा: "अरे गफूर भाई! गुस्सा क्यों करते हो? यह तुम्हारी मिठाई कहाँ है? अभी मौलवी जी ने बताया है कि इस दुनिया की हर चीज़ 'अल्लाह' की है। यह जलेबी अल्लाह की है, यह गुलाब जामुन अल्लाह का है और मैं अल्लाह का बंदा हूँ। मैं तो बस 'अल्लाह का माल' खा रहा हूँ, तुम बीच में पैसे माँगने वाले कौन होते हो?"

गफूर हलवाई ने जब शेख चिल्ली का यह अद्भुत और बेतुका तर्क सुना, तो उसका खून खौल उठा। उसे समझ आ गया कि इस बेवकूफ़ को बातों से नहीं समझाया जा सकता।

गफूर ने दुकान के कोने में रखी हुई एक बहुत ही 'मोटी और भारी लाठी' उठाई। वह काउंटर फाँदकर बाहर आया और बिना कुछ बोले, शेख चिल्ली की पीठ पर पूरी ताक़त से वह लाठी जड़ दी— 'धपाक्!'

"हाय अल्लाह! मर गया!" शेख चिल्ली दर्द के मारे ज़मीन पर उछल पड़ा।

गफूर ने दूसरी लाठी उठाई और शेख चिल्ली के पैरों पर मारी— 'ठकाक्!'

शेख चिल्ली रोते हुए और अपने हाथ जोड़ते हुए चिल्लाने लगा, "अरे गफूर भाई! मुझे क्यों मार रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? मुझे छोड़ दो!"

गफूर हलवाई ने लाठी को हवा में लहराते हुए बिल्कुल शेख चिल्ली वाले अंदाज़ में जवाब दिया: "अरे शेख भाई! तुम रो क्यों रहे हो? मैं तुम्हें कहाँ मार रहा हूँ? ज़रा ध्यान से सुनो... यह लाठी 'अल्लाह' की है, यह हाथ भी 'अल्लाह' का है, और तुम भी 'अल्लाह' के बंदे हो! यहाँ तो बस अल्लाह की लाठी, अल्लाह के बंदे की पीठ पर पड़ रही है। इसमें मैं बीच में कौन होता हूँ रोकने वाला? लो, एक और खाओ!"

और गफूर ने एक और ज़ोरदार लाठी शेख चिल्ली की कमर पर जड़ दी।

शेख चिल्ली को अब जाकर मौलवी जी के ज्ञान का 'असली और व्यावहारिक' मतलब समझ में आ गया था। वह दर्द से कराहता हुआ, बिना पीछे मुड़े बाज़ार से भाग खड़ा हुआ। उसने कसम खा ली कि आज के बाद वह कभी किसी 'अल्लाह के माल' पर बिना पैसे दिए हाथ नहीं लगाएगा।

🎉 कहानी समाप्त

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