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😄 शेखचिल्ली

चश्मा और पढ़ाई

लोक परंपरा4 मिनट का पठन
चश्मा और पढ़ाई

शेख चिल्ली बिल्कुल अनपढ़ था। उसे पढ़ना-लिखना बिल्कुल नहीं आता था। एक दिन वह गाँव के सबसे अमीर सेठ के घर गया। उसने देखा कि सेठ का 'मुनीम' एक बहुत ही मोटी और भारी किताब (बहीखाता) खोलकर बैठा है और उसमें लिखे हुए छोटे-छोटे अक्षरों को बहुत ही तेज़ी से और फर्राटेदार तरीके से पढ़ रहा है।

शेख चिल्ली ने एक चीज़ बहुत ध्यान से देखी। मुनीम जी ने किताब पढ़ने से पहले अपनी आँखों पर एक काले रंग के फ्रेम वाला 'चश्मा' पहना था।

शेख चिल्ली का दिमाग दौड़ा। उसने सोचा: "अच्छा! तो यह बात है! असल में मुनीम जी कोई पढ़े-लिखे इंसान नहीं हैं, बल्कि यह सारा कमाल इस 'चश्मे' का है! यह चश्मा एक जादुई चीज़ है। जो भी इंसान इसे अपनी आँखों पर पहन लेता है, उसे अपने आप किताबें पढ़नी आ जाती हैं!"

यह महान खोज करने के बाद, शेख चिल्ली ने फैसला किया कि वह भी यह जादुई चीज़ खरीदेगा ताकि वह पूरे गाँव का सबसे बड़ा विद्वान बन सके।

अगले दिन शेख चिल्ली शहर गया और चश्मे की एक बहुत बड़ी दुकान पर पहुँचा।

दुकानदार ने मुस्कुराते हुए पूछा, "आइए जनाब! बताइए, आपको कैसा चश्मा चाहिए?"

शेख चिल्ली ने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "दुकानदार भाई! मुझे आपकी दुकान का सबसे बेहतरीन और ताक़तवर चश्मा निकाल कर दो, जिसे पहनते ही मैं बड़ी-बड़ी किताबें फर्राटे से पढ़ सकूँ।"

दुकानदार को लगा कि शायद शेख चिल्ली की नज़र कमज़ोर हो गई है, इसलिए उसे पढ़ने में दिक्कत होती है। दुकानदार ने अपनी दराज़ से एक बहुत ही सुंदर चश्मा निकाला और शेख चिल्ली की आँखों पर लगा दिया। फिर उसने जाँचने के लिए शेख चिल्ली के हाथों में एक 'किताब' थमा दी।

अब चूँकि शेख चिल्ली को पढ़ना तो आता नहीं था, उसने किताब को अनजाने में 'उल्टा' पकड़ लिया।

दुकानदार ने कहा, "पढ़कर देखिए जनाब, क्या अब आपको अक्षर साफ़ दिखाई दे रहे हैं?"

शेख चिल्ली ने उल्टी किताब के पन्नों को बहुत ध्यान से देखा। फिर उसने चश्मा उतारा और निराश होकर बोला, "नहीं भाई! यह चश्मा बिल्कुल बेकार है। इसे पहनने के बाद भी मुझे इस किताब का एक भी शब्द पढ़ना नहीं आ रहा है। कोई दूसरा चश्मा दिखाओ।"

दुकानदार ने सोचा कि शायद इस चश्मे का नंबर गलत है। उसने एक दूसरा चश्मा निकाला और शेख चिल्ली को पहनाया।

शेख चिल्ली ने फिर से उल्टी किताब की तरफ देखा और सिर हिलाते हुए बोला, "नहीं-नहीं! यह चश्मा तो पहले वाले से भी ज़्यादा खराब है। तुम मुझे कोई अच्छा और महँगा चश्मा क्यों नहीं देते?"

दुकानदार परेशान हो गया। उसने एक-एक करके अपनी दुकान के दस-पंद्रह अलग-अलग नंबरों वाले चश्मे शेख चिल्ली की आँखों पर लगा दिए, लेकिन शेख का हर बार एक ही जवाब होता— "मुझे कुछ पढ़ना नहीं आ रहा है!"

अंत में दुकानदार का धैर्य जवाब दे गया। वह काउंटर के बाहर आया और जब उसने ध्यान से देखा कि शेख चिल्ली ने तो किताब ही उल्टी पकड़ रखी है, तो उसका माथा ठनक गया।

दुकानदार ने गुस्से और हैरानी से पूछा, "अरे भाई साहब! ज़रा यह तो बताओ, क्या आपको पढ़ना-लिखना (अक्षर ज्ञान) आता भी है या नहीं?"

यह सुनकर शेख चिल्ली को भी बहुत ज़ोर का गुस्सा आ गया। उसने अपना सीना तानते हुए दुकानदार से कहा:

"अरे बेवकूफ़ इंसान! कैसी बात करते हो! अगर मुझे पढ़ना-लिखना आता, तो मैं इतनी दूर चलकर तुम्हारी इस मनहूस दुकान पर यह 'चश्मा' खरीदने क्यों आता? मैं तो यह चश्मा खरीदने ही इसलिए आया हूँ ताकि मुझे पढ़ना आ जाए, और तुम मुझे ही पढ़ना सिखा रहे हो!"

दुकानदार ने जब शेख चिल्ली का यह अद्भुत तर्क सुना, तो उसने अपना सिर दीवार पर मार लेने का मन किया।

दुकानदार ने गहरी साँस ली और दोनों हाथ जोड़कर कहा, "अरे दुनिया के सबसे महान इंसान! चश्मा इंसान को 'दिखने' में मदद करता है, अनपढ़ इंसान को 'पढ़ना' नहीं सिखाता! पढ़ना सीखने के लिए चश्मे की नहीं, स्कूल जाने की ज़रूरत होती है। जाइए और जाकर पहले स्कूल में ए, बी, सी, डी सीखिए!"

शेख चिल्ली को जब यह सच्चाई पता चली कि बिना पढ़ाई किए चश्मा कोई काम का नहीं है, तो वह बहुत झेंप गया। उसने चुपचाप किताब काउंटर पर रखी और बिना कोई चश्मा खरीदे सिर झुकाकर दुकान से बाहर निकल गया।

🎉 कहानी समाप्त

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