शेख चिल्ली की ससुराल यात्रा (छोटा और मीठा जवाब)

शेख चिल्ली की शादी को कुछ ही महीने हुए थे। एक दिन उसके ससुराल से बुलावा आया। शेख चिल्ली को पहली बार अकेले अपनी ससुराल जाना था।
शेख चिल्ली की माँ अपने बेटे की बेवकूफियों से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थी। उसे डर था कि कहीं शेख ससुराल जाकर अपनी मूर्खता के कारण पूरे परिवार की नाक न कटवा दे।
इसलिए शेख को विदा करने से पहले, उसकी माँ ने उसे अपने पास बिठाया और बहुत ही गंभीरता से समझाया: "देख बेटा शेख! तू पहली बार ससुराल जा रहा है। ससुराल वालों के सामने बहुत इज़्ज़त से पेश आना। वहाँ फालतू की बकवास मत करना। हमेशा याद रखना, समझदार इंसान वही होता है जो 'कम बोलता है'। इसलिए ससुराल में जो भी इंसान तुझसे कोई सवाल पूछे, उसका जवाब बहुत ही 'छोटा और मीठा' देना। बात समझ गया?"
शेख चिल्ली ने अपना सीना तानते हुए कहा, "अम्मा, तुम बिल्कुल फिक्र मत करो! मैं तुम्हारे कहे अनुसार ऐसा 'छोटा और मीठा' जवाब दूँगा कि ससुराल वाले मेरी समझदारी के दीवाने हो जाएँगे!"
शेख चिल्ली नए कपड़े पहनकर, ठसक के साथ अपनी ससुराल पहुँच गया।
ससुराल वालों ने जब अपने दामाद को देखा, तो वे बहुत खुश हुए। शेख चिल्ली के ससुर जी ने आगे बढ़कर उसे गले लगाया और सम्मान के साथ घर के अंदर ले जाकर एक बड़ी सी चारपाई पर बिठाया।
थोड़ी देर बाद, ससुर जी ने हाल-चाल पूछने के लिए बातचीत शुरू की। ससुर जी ने बहुत प्यार से पूछा, "बेटा शेख! तुम्हारा सफर कैसा रहा? रास्ते में बैलगाड़ी से आने में तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं हुई?"
शेख चिल्ली को तुरंत अपनी माँ की बात याद आ गई— "जवाब बहुत छोटा और मीठा होना चाहिए।"
शेख ने अपने दिमाग पर ज़ोर डाला। 'छोटा' मतलब एक शब्द का। और 'मीठा' मतलब... चीनी जैसा मीठा!
शेख चिल्ली ने बहुत ही आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराते हुए ससुर जी की आँखों में देखा और सिर्फ एक शब्द में जवाब दिया: "बताशा!" (चीनी की बनी एक छोटी सी मीठी गोली)
ससुर जी हैरान रह गए। उन्हें लगा शायद उन्होंने गलत सुना है। "क्या कहा बेटा? बताशा? मैं पूछ रहा हूँ कि रास्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?"
शेख चिल्ली ने सोचा कि शायद ससुर जी को यह जवाब कम मीठा लगा है। उसने इस बार थोड़ा और मीठा नाम लिया: "जलेबी!"
ससुर जी का माथा ठनक गया। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि दामाद यह क्या ऊटपटाँग बातें कर रहा है।
तभी अंदर से शेख चिल्ली की सास पानी का गिलास लेकर आईं। सास ने गिलास देते हुए बहुत ही चिंता से पूछा, "बेटा शेख! हमने सुना था कि तुम्हारे अब्बा जान (पिताजी) को कल रात बहुत तेज़ बुखार था। अब उनकी तबीयत कैसी है?"
शेख चिल्ली ने फिर से माँ की 'छोटा और मीठा' वाली सीख को याद किया। अब्बा की बीमारी की बात है, तो जवाब और भी मीठा होना चाहिए।
शेख चिल्ली ने बहुत ही शांति और गंभीरता से सास को जवाब दिया: "गुलाब जामुन!"
सास के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। "अरे बेटा! यह तुम क्या कह रहे हो? तुम्हारे अब्बा बीमार हैं और तुम गुलाब जामुन कह रहे हो? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न?" सास ने घबराकर पूछा।
शेख चिल्ली को लगा कि ये लोग उसकी समझदारी की परीक्षा ले रहे हैं। वह अपनी जगह से उठा और अपना सबसे 'छोटा और मीठा' ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए बोला: "लड्डू, बर्फी, और रसगुल्ला!"
अब ससुराल वालों के सब्र का बाँध टूट गया। ससुर जी ने अपना सिर पकड़ लिया और सास ने माथा पीटते हुए अपनी बेटी (शेख की पत्नी) को अंदर से आवाज़ लगाई: "अरी ओ भाग्यवान! ज़रा बाहर आ! देख तेरे शौहर को क्या हो गया है! हम इससे बीमारी का हाल पूछ रहे हैं और यह हमें हलवाई की दुकान का मेन्यू सुना रहा है!"
शेख चिल्ली की पत्नी बाहर आई। वह जानती थी कि उसके पति का दिमाग कैसे चलता है। उसने शेख चिल्ली से पूछा, "तुम हर बात के जवाब में इन मिठाइयों के नाम क्यों ले रहे हो?"
शेख चिल्ली ने बहुत ही मासूमियत और गर्व से जवाब दिया, "अरे! मेरी अम्मा ने मुझे घर से निकलते वक्त बहुत सख्ती से समझाया था कि ससुराल में चाहे कुछ भी हो जाए, कम बोलना और हर सवाल का जवाब हमेशा 'छोटा और मीठा' ही देना! अब तुम ही बताओ, दुनिया में इन मिठाइयों से 'छोटा और मीठा' जवाब और क्या हो सकता है?"
यह सुनकर शेख चिल्ली की पत्नी, सास और ससुर तीनों को समझ आ गया कि वे इस दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़ इंसान से बात कर रहे थे। उनका गुस्सा हवा हो गया और वे शेख चिल्ली के इस 'शाब्दिक अर्थ' वाले भोलेपन पर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगे। और शेख चिल्ली अपनी समझदारी पर खुश होता रहा।
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