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भाग 36: लंका अवतरण, अंगद का शांति-संदेश और रावण की राजसभा में 'अंगद का पैर'

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 36: लंका अवतरण, अंगद का शांति-संदेश और रावण की राजसभा में 'अंगद का पैर'

नल और नील के स्पर्श तथा 'राम' नाम की महिमा से जब वह सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा अद्भुत 'राम सेतु' बनकर तैयार हो गया, तो वानर सेना के उत्साह की कोई सीमा न रही।

श्रीराम ने सेतु के आरंभ में भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना की (जिसे आज हम 'रामेश्वरम' के नाम से जानते हैं) और महादेव का आशीर्वाद लिया। इसके पश्चात, श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण के नेतृत्व में करोड़ों वानरों और भालुओं की वह अनंत सेना उस तैरते हुए पुल पर से गुजरने लगी। जब यह विशाल सेना पुल पार कर रही थी, तो उनके सिंहनाद से समुद्र की लहरें भी सहम गई थीं।

अंततः, बिना किसी नौका या विमान के, श्रीराम की महासेना ने उस अजेय दक्षिण सागर को पार कर लिया और लंका के तट पर स्थित 'सुवेला पर्वत' पर अपना पहला पड़ाव डाला।

सुवेला पर्वत की चोटी से लंका नगरी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। सोने के ऊंचे महल, अभेद्य दीवारें और राक्षसों की विशाल सेनाएं राम के सामने थीं। वानर सेना युद्ध के लिए व्याकुल थी। सभी सेनापति अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र तेज कर रहे थे।

परंतु, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के भीतर युद्ध का कोई उन्माद नहीं था। वे एक आदर्श राजा और धर्म के रक्षक थे। सनातन धर्म की युद्ध नीति (साम, दाम, भेद, दंड) के अनुसार, युद्ध हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। श्रीराम ने अपनी युद्ध-परिषद बुलाई और एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने सभी को चौंका दिया।

श्रीराम ने कहा, "यद्यपि हमने सागर पार कर लिया है और हमारी सेना युद्ध के लिए तैयार है, परंतु मैं नहीं चाहता कि निर्दोष सैनिकों और प्रजा का रक्त बहे। मैं रावण को एक अंतिम अवसर देना चाहता हूँ। मैं अपना एक दूत रावण की राजसभा में भेजूंगा। यदि रावण अब भी अपनी भूल मानकर सीता को लौटा दे, तो हम बिना युद्ध किए अयोध्या लौट जाएंगे।"

सुग्रीव और लक्ष्मण इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे, परंतु राम की आज्ञा सर्वोपरि थी। प्रश्न उठा कि दूत बनकर कौन जाएगा? हनुमान जी लंका जा चुके थे और वहां भयंकर तबाही मचा चुके थे, इसलिए उन्हें दोबारा भेजना कूटनीति के विरुद्ध था। तब श्रीराम की दृष्टि महाबली बालि के पुत्र, युवराज 'अंगद' पर पड़ी।

श्रीराम ने कहा, "हे अंगद! तुम बल, बुद्धि और नीति में अपने पिता बालि के समान ही श्रेष्ठ हो। तुम मेरे शांति-दूत बनकर लंका जाओ और रावण को अंतिम चेतावनी दो।"

श्रीराम का आशीर्वाद पाकर अंगद एक भयंकर उल्कापिंड की भांति आकाश में उड़े और सीधे रावण के राजमहल में जा उतरे।

रावण उस समय अपनी राजसभा में बैठा था। अंगद ने बिना किसी भय के राजसभा में प्रवेश किया। उनके विशाल वानर रूप और ओजस्वी मुखमंडल को देखकर सभा में सन्नाटा छा गया।

रावण ने क्रोधित होकर पूछा, "अरे वानर! तू कौन है और यहाँ मेरी आज्ञा के बिना कैसे आया?"

अंगद ने निर्भय होकर उत्तर दिया, "हे दशानन! मैं किष्किंधा के नरेश महाबली बालि का पुत्र अंगद हूँ। मैं रघुकुल नंदन श्रीराम का दूत बनकर आया हूँ।"

'बालि का पुत्र'—यह सुनते ही रावण को वह पुरानी घटना याद आ गई जब बालि ने उसे अपनी कांख (बगल) में छह महीने तक दबाकर रखा था। रावण ने अपनी कूटनीति का प्रयोग करते हुए अंगद के मन में राम के प्रति जहर घोलने का प्रयास किया।

रावण ने हंसते हुए कहा, "अरे अंगद! तू तो मेरे मित्र बालि का पुत्र है। क्या तुझे लज्जा नहीं आती? जिस राम ने तेरे पिता बालि को छिपकर एक कायर की भांति मारा था, तू आज उसी राम का दास बनकर मेरे सामने खड़ा है? आ, मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे किष्किंधा का नहीं, लंका का सेनापति बनाऊँगा!"

अंगद अत्यंत चतुर और धर्मज्ञ थे। उन्होंने रावण के इस कुटिल वार को मुस्कुराकर टाल दिया और कहा:

"हे रावण! मेरे पिता ने क्या किया और राम ने क्या किया, वह उनका धर्म था। राम ने मुझे जो दिया है, वह तुम जैसे पापी नहीं समझ सकते। मैं यहाँ अपने पिता का प्रतिशोध लेने नहीं, बल्कि तुम्हें बचाने आया हूँ। श्रीराम ने संदेश भेजा है कि यदि तुम सीता माता को ससम्मान लौटा दो और राम के चरणों में गिरकर क्षमा मांग लो, तो वे तुम्हारे सारे अपराध क्षमा कर देंगे। अन्यथा, तुम्हारी यह स्वर्ण लंका श्मशान बन जाएगी और तुम्हारे इस कुल में रोने वाला भी कोई नहीं बचेगा।"

रावण का अहंकार फिर जाग उठा। उसने अट्टहास करते हुए कहा, "मुझे क्षमा करेगा? वह वनवासी राम? जिसके पास न रथ है, न जूते हैं, और जिसकी सेना में केवल जंगली बंदर और भालू हैं? अरे मूर्ख वानर! मैं तीनों लोकों का स्वामी रावण हूँ! काल भी मेरे आदेश से चलता है। जा अपने राम से कह दे कि रावण युद्ध भूमि में ही उससे मिलेगा!"

अंगद समझ गए कि रावण के सिर पर मृत्यु नाच रही है। परंतु वापस लौटने से पूर्व, अंगद ने रावण के अहंकार को पूरी तरह चूर-चूर करने का एक अद्भुत निर्णय लिया।

अंगद राजसभा के बीचों-बीच खड़े हो गए। उन्होंने अपना दाहिना पैर पूरी शक्ति के साथ लंका की धरती पर जमा दिया (रोप दिया)। पैर जमाते ही धरती कांप उठी।

अंगद ने रावण की आंखों में आंखें डालकर एक ऐसी खुली चुनौती दी, जिसने रावण के पूरे साम्राज्य के सम्मान को दांव पर लगा दिया:

"हे दशानन! यदि तेरे इस दरबार में इतने ही महान योद्धा बैठे हैं, तो मेरी यह चुनौती स्वीकार कर! तुम्हारे किसी भी सेनापति, पुत्र या भाई में यदि इतना बल है कि वह मेरे इस पैर को धरती से थोड़ा सा भी हिला दे या उठा दे, तो मैं श्रीराम की ओर से यह शपथ लेता हूँ कि हम हार मान लेंगे! राम बिना सीता को लिए यहाँ से लौट जाएंगे और हम हार स्वीकार कर लेंगे!"

यह कोई साधारण चुनौती नहीं थी। एक वानर राजसभा के बीच में खड़ा होकर रावण की पूरी शक्ति को ललकार रहा था।

रावण ने क्रोध से फुफकारते हुए अपने सेनापतियों को आदेश दिया, "क्या देख रहे हो? जाओ और इस मूर्ख वानर का पैर उखाड़कर इसे समुद्र में फेंक दो!"

रावण के आदेश पर मेघनाद (इंद्रजीत), प्रहस्त, महोदर, अतिकाय और देवान्तक जैसे बड़े-बड़े और महाबली राक्षस उठे। वे एक-एक करके आए। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। पसीने से लथपथ हो गए, उनके दांत किटकिटाने लगे और नसें फूल गईं, परंतु अंगद का वह पैर धरती से एक सूत (inch) भी नहीं हिला। ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात सुमेरु पर्वत ही उस पैर में समा गया हो। एक वानर के पैर को न उठा पाने के कारण रावण के अजेय योद्धाओं के सिर शर्म से झुक गए।

जब सभी राक्षस हार गए, तो रावण की आंखों में खून उतर आया। उसका अहंकार अब बर्दाश्त नहीं कर सका। रावण अपने ऊंचे स्वर्ण सिंहासन से स्वयं उतरा और अपनी पूरी शक्ति के साथ अंगद की ओर बढ़ा।

जैसे ही रावण झुका और उसने अंगद के पैर को पकड़कर उठाने का प्रयास किया, अंगद ने अत्यंत फुर्ती से अपना पैर पीछे हटा लिया।

रावण का संतुलन बिगड़ गया और वह तीनों लोकों का विजेता, लंकापति रावण, मुँह के बल राजसभा की धरती पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसका मुकुट धरती पर लुढ़क गया। पूरी राजसभा स्तब्ध रह गई।

अंगद ने ऊपर से रावण की ओर देखते हुए अत्यंत कठोर और व्यंग्यात्मक स्वर में कहा:

"अरे मूर्ख दशानन! मेरे पैरों में क्यों गिरता है? मेरे पैरों में गिरने से तुझे प्राणदान नहीं मिलेगा। यदि गिरना ही है, तो जाकर करुणानिधान श्रीराम के चरणों में गिर। केवल वही तुझे मृत्यु से बचा सकते हैं!"

यह कहकर अंगद ने अपनी एक ज़ोरदार छलांग लगाई और रावण की महल की छत को तोड़ते हुए आकाश में उड़ चले।

रावण धरती पर गिरा हुआ था, उसका मुकुट धूल में सना था और उसका अहंकार पूरी तरह टूट चुका था। अंगद ने बिना कोई शस्त्र उठाए ही रावण को उसके अपने ही दरबार में मानसिक और शारीरिक रूप से पराजित कर दिया था।

जब अंगद वापस सुवेला पर्वत पर श्रीराम के शिविर में पहुँचे और पूरी कथा सुनाई, तो श्रीराम समझ गए कि रावण का अहंकार अब किसी भी प्रार्थना से नहीं पिघलेगा। शांति का अंतिम मार्ग बंद हो चुका था। श्रीराम ने अपने बाण तरकश से बाहर निकाले और सेना को महायुद्ध का शंख बजाने का आदेश दिया।

अब त्रेता युग का वह सबसे भयंकर महायुद्ध आरंभ होने वाला था, जो युगों-युगों तक धर्म और अधर्म की सबसे बड़ी पहचान बनने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

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