हिन्दी कहानियाँ
🏹 रामायण

भाग 37: मंदोदरी की अंतिम चेतावनी और लंका की घेराबंदी (चक्रव्यूह रचना)

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 37: मंदोदरी की अंतिम चेतावनी और लंका की घेराबंदी (चक्रव्यूह रचना)

अंगद के राजसभा से सफलतापूर्वक और अत्यंत तेजस्वी रूप से लौट आने के पश्चात, लंका के भीतर एक अजीब सा सन्नाटा और भय छा गया। अंगद का वह पैर, जिसे रावण के महाबली योद्धा हिला तक नहीं सके, उसने लंका के अजेय होने के भ्रम को चकनाचूर कर दिया था।

यह वृत्तांत जब रावण के अंतःपुर (रनिवास) में पहुँचा, तो महारानी मंदोदरी का हृदय कांप उठा। वे समझ गईं कि अब विनाश साक्षात लंका के द्वार पर खड़ा है। वे अत्यंत व्याकुल होकर, अपने बाल खोले हुए और अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ रावण के कक्ष में गईं।

मंदोदरी ने रावण के चरण पकड़ लिए और अत्यंत आर्त (दुखी) स्वर में अंतिम बार अपने पति को समझाने का प्रयास किया: "कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥" (अर्थात: हे स्वामी! श्रीहरि (राम) से वैर त्याग दीजिए। मेरी इस बात को अपने हृदय में अत्यंत कल्याणकारी मानकर धारण कर लीजिए।)

मंदोदरी ने रोते हुए कहा, "हे नाथ! जिसके एक साधारण दूत (हनुमान) ने आपकी लंका जला दी, और जिसके दूसरे दूत (अंगद) का पैर आपके योद्धा सभा में हिला तक नहीं सके, उस राम से युद्ध करना वीरता नहीं, आत्महत्या है। राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात नारायण हैं। उनके बाणों के सामने आपके ये मायावी अस्त्र-शस्त्र वैसे ही भस्म हो जाएंगे जैसे सूर्य के सामने अंधकार। मैं हाथ जोड़ती हूँ, माता सीता को लौटा दीजिए। मुझे और लंका की लाखों स्त्रियों को विधवा होने से बचा लीजिए!"

परंतु रावण का अंधकार अब इतना गहरा हो चुका था कि उसे मृत्यु के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। उसने हंसते हुए मंदोदरी को उठाया और कहा, "अरी मूर्ख स्त्री! तू जंगली वानरों के बल से डर गई? अरे, मेरे एक-एक योद्धा ने देवताओं को रुलाया है। कल जब मैं युद्ध भूमि में उतरूँगा, तो राम और लक्ष्मण के कटे हुए सिर तेरे सामने उपहार स्वरूप लाऊँगा। जा, जाकर विश्राम कर।" मंदोदरी निराश होकर लौट गई; वह जानती थी कि अब रावण के मस्तक पर काल नाच रहा है।

लंका की घेराबंदी (चक्रव्यूह रचना): उधर सुवेला पर्वत पर, अंगद ने श्रीराम को बताया कि रावण ने शांति का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। श्रीराम का मुखमंडल अब एक प्रलयंकारी योद्धा के समान गंभीर हो गया। उन्होंने तुरंत विभीषण और सुग्रीव के साथ युद्ध की रणनीति बनाने के लिए सभा बुलाई।

विभीषण ने लंका के रक्षा-तंत्र का पूरा गुप्त रहस्य बताते हुए कहा, "हे प्रभु! लंका नगरी चारों ओर से अभेद्य स्वर्ण दीवारों से घिरी है। इसके भीतर प्रवेश करने के केवल चार मुख्य द्वार हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। रावण ने हर द्वार पर अपनी एक-एक लाख राक्षसों की शक्तिशाली सेना और भयंकर सेनापति तैनात कर दिए हैं।"

श्रीराम ने एक महान सेनापति की भांति पूरी वानर सेना को चार भागों में विभाजित किया और लंका की अभेद्य घेराबंदी की योजना बनाई:

पूर्वी द्वार: श्रीराम ने पूर्वी द्वार को तोड़ने का दायित्व वानर सेनापति 'नील' को सौंपा। नील के सामने रावण का सेनापति 'प्रहस्त' था।

पश्चिमी द्वार: पश्चिमी द्वार पर रावण का सबसे मायावी और क्रूर योद्धा 'महोदर' खड़ा था। श्रीराम ने इस द्वार को ध्वस्त करने के लिए वानरराज 'सुग्रीव' और पवनपुत्र 'हनुमान' को नियुक्त किया।

दक्षिणी द्वार: दक्षिण का द्वार सबसे भयंकर था, जहाँ महाबली 'महापार्श्व' तैनात था। श्रीराम ने इस द्वार पर आक्रमण के लिए युवराज 'अंगद' और भालूराज 'जाम्बवंत' को भेजा।

उत्तरी द्वार: लंका का उत्तरी द्वार सबसे महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहाँ स्वयं लंकापति 'रावण' और उसका अजेय पुत्र 'मेघनाद' अपनी रक्षा पंक्ति बनाकर खड़े थे। इस द्वार का दायित्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लक्ष्मण और विभीषण के साथ स्वयं अपने कंधों पर लिया।

अगली सुबह, जब सूर्योदय की पहली किरण लंका के स्वर्ण शिखरों पर पड़ी, तब श्रीराम ने अपने 'कोदंड' धनुष की भयंकर टंकार की। लक्ष्मण ने युद्ध का शंख बजाया और पूरी वानर सेना ने एक साथ "जय श्रीराम" का ऐसा जयघोष किया कि लंका के महलों की नींव कांप उठी। महायुद्ध का शंखनाद हो चुका था!

🎉 कहानी समाप्त

🏹 रामायण की और कहानियाँ

🏹 रामायण10 मिनट

भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा

सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।

पढ़ें →
🏹 रामायण10 मिनट

भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण

श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।

पढ़ें →
🏹 रामायण8 मिनट

भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल

चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा

महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर

मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई

राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।

पढ़ें →