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🏹 रामायण

भाग 35: समुद्र की शरणागति और 'नल-नील' का रहस्य

महर्षि वाल्मीकि — रामायण8 मिनट का पठन
भाग 35: समुद्र की शरणागति और 'नल-नील' का रहस्य

जब श्रीराम ने अग्निबाण छोड़ने के लिए प्रत्यंचा खींची, तब समुद्र देव का सारा अहंकार पल भर में हवा हो गया। वे सोने के थाल में मणियां और उपहार लेकर, एक ब्राह्मण के रूप में जल की लहरों से बाहर प्रकट हुए। उन्होंने कांपते हुए श्रीराम के चरणों में अपना सिर रख दिया और क्षमा मांगी।

समुद्र देव ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! क्षमा करें। जड़ता मेरा स्वभाव है। आपने ही इस सृष्टि के पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) की मर्यादा निश्चित की है। यदि मैं मार्ग दे दूँ, तो मेरी मर्यादा नष्ट हो जाएगी। परंतु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है। मैं आपको मार्ग बनाने का एक उपाय बताता हूँ।"

समुद्र देव ने एक अत्यंत गुप्त भेद प्रकट किया: "हे राघव! आपकी सेना में 'नल' और 'नील' नाम के दो वानर वीर हैं। उन्हें बचपन में एक ऋषि ने श्राप (जो अब वरदान बन गया है) दिया था कि उनके स्पर्श से भारी से भारी पत्थर भी जल में नहीं डूबेंगे। आप उनसे समुद्र पर सेतु (पुल) का निर्माण करवाएं। मैं उन पत्थरों को अपनी लहरों पर थामे रखूँगा।"

श्रीराम ने समुद्र देव को क्षमा कर दिया। परंतु वह बाण जो धनुष पर चढ़ चुका था, उसे खाली नहीं छोड़ा जा सकता था। श्रीराम ने समुद्र के कहने पर उस बाण को उत्तर दिशा की ओर छोड़ दिया, जहाँ 'द्रुमकुल्य' नामक स्थान पर पापी दस्यु निवास करते थे। बाण के प्रभाव से वह स्थान मरुस्थल (रेगिस्तान) बन गया, जिसे आज हम 'मारवाड़' के नाम से जानते हैं।

अब पूरी वानर सेना में भारी उत्साह था। श्रीराम की आज्ञा पाकर नल और नील के नेतृत्व में करोड़ों वानर जंगलों की ओर दौड़ पड़े। वे बड़े-बड़े पहाड़, विशाल चट्टानें और भारी वृक्ष उखाड़कर लाने लगे। हनुमान जी और अंगद जैसे महाबली वानर विशाल पर्वतों को उठाकर समुद्र तट पर लाने लगे।

नल और नील उन पत्थरों पर 'राम' नाम अंकित करते और उन्हें समुद्र में छोड़ देते। चमत्कार यह था कि 'राम' नाम के प्रभाव और नल-नील के स्पर्श से वे भारी पत्थर भी पानी पर किसी सूखी लकड़ी की तरह तैरने लगे। देखते ही देखते, सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा एक विशाल 'राम सेतु' बनकर तैयार होने लगा। यह दृश्य इतना अद्भुत था कि देवता भी आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे।

🎉 कहानी समाप्त

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