"अपनी डफली अपना राग"

गर्मियों के दिन थे। 'अजबगढ़' नाम के गाँव में पानी का भारी संकट आ गया। गाँव का इकलौता पुराना कुआँ पूरी तरह से सूख गया था। गाँव वालों को पानी के लिए मीलों दूर जाना पड़ रहा था।
गाँव के सरपंच जी बहुत ही समझदार इंसान थे। उन्होंने इस बड़ी समस्या का हल निकालने के लिए बरगद के पेड़ के नीचे 'ग्राम पंचायत' की एक बड़ी बैठक बुलाई। पूरा गाँव वहाँ इकट्ठा हो गया।
सरपंच जी ने खड़े होकर कहा: "भाइयो! हमारे गाँव का कुआँ सूख गया है। अगर हम सब मिलकर पास की नदी से एक 'नहर' खोद लें, तो हमारे गाँव में हमेशा के लिए पानी आ जाएगा। बताइए, आप सबकी क्या राय है?"
बेतुके सुझावों का शोर: सरपंच जी को लगा था कि सब इस अच्छी बात पर सहमत होंगे। लेकिन अजबगढ़ के लोग बहुत ही अजीब थे। किसी को भी दूसरे की बात सुनना पसंद नहीं था।
सबसे पहले 'सुखिया' नाम का एक आदमी खड़ा हुआ। वह हाथ नचाते हुए बोला: "अरे सरपंच जी! नहर खोदने में तो बहुत मेहनत लगेगी। मेरी मानो तो हम सब एक बहुत 'लंबी सीढ़ी' बनाते हैं, उसे बादलों पर लगाते हैं और मटकों में भर-भर कर सीधे बादलों से पानी ले आते हैं!"
सुखिया की इस मूर्खता पर सरपंच जी अपना माथा पकड़ने ही वाले थे कि तभी दूसरा आदमी 'मंगोलू' बीच में चिल्ला पड़ा: "चुप कर सुखिया! मेरी योजना सबसे अच्छी है। गाँव में पानी खत्म हो गया है तो क्या हुआ? आज से हम सब पानी पीना बंद कर देते हैं और केवल 'गायों का दूध' पीकर काम चलाते हैं। न नहाएँगे, न कपड़े धोएँगे!"
तभी पीछे से 'गफूर' नाम का एक आदमी अपनी लाठी पटकते हुए चिल्लाया: "तुम सब बेवकूफ़ हो! मेरी बात सुनो। कुआँ सूखा है ना? हम उस सूखे कुएँ के अंदर 'नीला रंग' पोत देते हैं। जब हम ऊपर से देखेंगे तो कुआँ नीले पानी से भरा हुआ लगेगा और हमारी प्यास आँखों ही आँखों में बुझ जाएगी!"
एकता का अभाव: देखते ही देखते चौपाल 'मछली बाज़ार' में बदल गई। कोई नहर खोदने को तैयार नहीं था। हर आदमी खड़ा होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था। कोई कह रहा था 'हवा से पानी निकालो', तो कोई कह रहा था 'कुएँ में बर्फ डाल दो'।
"मेरी बात सुनो!" "नहीं, मेरी योजना सबसे अच्छी है!"
पूरी चौपाल में भयंकर शोर मच गया। सरपंच जी ने कई बार अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकी, "अरे शांत हो जाओ! एक-दूसरे की बात तो सुनो!" लेकिन कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। सब बस अपने-अपने गले फाड़ कर चिल्ला रहे थे।
अंत में सरपंच जी का सिर चकरा गया। उन्होंने अपने दोनों कानों पर हाथ रखे और झल्लाते हुए ज़ोर से चिल्लाए: "अरे मूर्खो! चुप हो जाओ! मैं यहाँ गाँव की भलाई के लिए सबको एक करने आया था, लेकिन तुम लोगों के बीच तो कोई एकता ही नहीं है। कोई किसी की बात नहीं मान रहा है, सब अपनी-अपनी बेवकूफी में मस्त हैं। तुम्हारी इस पंचायत का तो एक ही हाल है— 'अपनी डफली, और अपना राग!' (यानी हर कोई अपना ही वाद्ययंत्र बजा रहा है और अपना ही अलग गाना गा रहा है, जिससे कोई सुर नहीं बन रहा, केवल शोर हो रहा है)।"
सरपंच जी गुस्से में मीटिंग छोड़कर चले गए, और गाँव वाले अपनी मूर्खता के कारण बिना पानी के ही परेशान होते रहे।
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