"हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और"

'चंदननगर' में एक सेठ जी रहते थे, जिनका नाम था 'सेठ करोड़ीमल'। सेठ जी के नाम में ही करोड़ था। वे गाँव के बीचों-बीच बनी एक बहुत ही विशाल 'हवेली' में रहते थे।
सेठ जी का 'बाहरी दिखावा' किसी राजा-महाराजा से कम नहीं था। जब भी सेठ जी घर से बाहर बाज़ार में निकलते, तो वे मखमली कपड़े पहनते, गले में सोने की चार-चार मोटी चेन डालते, और एक बहुत ही सुंदर सजी हुई बग्घी पर बैठकर निकलते। वे पूरे बाज़ार में ऐसे हाथ हिलाते जैसे वे दुनिया के सबसे अमीर और उदार इंसान हों। पूरा गाँव सोचता था कि सेठ जी के घर में तो रोज़ 'छप्पन भोग' बनते होंगे और वे बहुत ऐश की ज़िंदगी जीते होंगे।
हवेली के अंदर का सच: लेकिन हवेली के दरवाज़े के अंदर की हकीकत बिल्कुल ही भयानक और उल्टी थी। सेठ करोड़ीमल दुनिया का सबसे बड़ा 'महा-कंजूस' इंसान था।
जैसे ही वह हवेली के अंदर आता, वह अपने रेशमी कपड़े उतारकर एक पुराना और कई जगह से फटा हुआ सूती कुर्ता पहन लेता। पैसे बचाने के चक्कर में हवेली के अंदर रात को 'दीये या लालटेन' में तेल नहीं डाला जाता था; पूरा परिवार घुप अँधेरे में रहता था।
खाने के नाम पर, सेठ जी अपनी पत्नी और बच्चों को केवल 'बासी रूखी रोटी और कच्चा प्याज़' खाने को देते थे ताकि राशन का पैसा बच सके। अगर कोई बच्चा दूध माँग लेता, तो सेठ जी उसे डांट कर भगा देते। बाहर से महलों जैसी दिखने वाली हवेली अंदर से किसी भिखारी के घर से भी बदतर थी।
असलियत का पर्दाफाश: एक रात, गाँव के सरपंच और शहर के कुछ बड़े अधिकारी किसी बहुत ही 'ज़रूरी सरकारी काम' के सिलसिले में सेठ जी से मिलने आ गए। उन्होंने हवेली का दरवाज़ा ज़ोर से खटखटाया।
सेठ जी को लगा कि कोई भिखारी होगा। उन्होंने फटे हुए कपड़ों में ही दरवाज़ा खोल दिया। सामने सरपंच और बड़े अधिकारियों को देखकर सेठ जी के होश उड़ गए!
सरपंच और अधिकारी ज़बरदस्ती हवेली के अंदर आ गए। अंदर का नज़ारा देखकर वे सन्न रह गए। पूरी हवेली में अँधेरा था। ज़मीन पर फटी हुई चटाई बिछी थी और एक कोने में सेठ जी की थाली रखी थी, जिसमें 'कल की सूखी हुई आधी रोटी और थोड़ा सा नमक' रखा था।
सरपंच ने अपनी आँखें मलते हुए पूछा: "सेठ जी! यह क्या है? आप बाहर तो सोने से लदे रहते हैं, महलों जैसी बातें करते हैं, और अपने ही घर के अंदर अँधेरे में बैठकर बासी रोटी और नमक खा रहे हैं? आपके घर में तो लालटेन जलाने के लिए तेल तक नहीं है!"
सेठ जी शर्म के मारे पानी-पानी हो गए। वे अपना सिर खुजाते हुए बहाने बनाने लगे, लेकिन उनका सारा खोखला दिखावा दुनिया के सामने आ चुका था।
अधिकारियों के साथ आए एक समझदार मुनीम ने हँसते हुए सरपंच से कहा: "सरपंच जी! इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है। दुनिया में ऐसे कई खोखले लोग होते हैं। ज़रा 'हाथी' को देखिए— उसके बाहर निकले हुए सफेद दाँत कितने बड़े और सुंदर होते हैं, लेकिन वे केवल दिखावे के लिए होते हैं। हाथी असल में खाना अपने अंदर वाले छोटे और बदसूरत दाँतों से चबाता है। सेठ जी की हालत भी बिल्कुल वैसी ही है— 'हाथी के दाँत खाने के और... दिखाने के और!'"
(यानी बाहर से अमीरी और शान-ओ-शौकत का झूठा दिखावा, और अंदर से गरीबी और भयानक कंजूसी)।
उस दिन के बाद पूरे गाँव में सेठ करोड़ीमल के झूठे दिखावे का बहुत मज़ाक उड़ा।
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