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"डूबते को तिनके का सहारा"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"डूबते को तिनके का सहारा"

'दीनदयाल' नाम का एक बहुत ही गरीब और सीधा-सादा जुलाहा (Weaver) था। वह अपने घर में एक छोटा सा लकड़ी का 'हथकरघा' (Handloom) लगाकर कपड़े बुनता था और उसी से अपने परिवार का पेट पालता था।

एक रात, किस्मत ने दीनदयाल के साथ बहुत बुरा खेल खेला। एक मोमबत्ती गिरने के कारण उसकी छोटी सी झोपड़ी में भयंकर आग लग गई। दीनदयाल अपने परिवार की जान तो बचा पाया, लेकिन उसका हथकरघा, बुने हुए कपड़े और उसकी ज़िंदगी भर की जमा-पूँजी सब कुछ 'जलकर राख' हो गया।

निराशा का गहरा सागर: अगली सुबह, जब दीनदयाल ने अपनी जली हुई झोपड़ी की राख देखी, तो वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसके पास अपने बच्चों को खिलाने के लिए एक दाना तक नहीं बचा था।

उसने गाँव वालों से मदद माँगी, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। साहूकार ने उसे कर्ज़ा देने से साफ़ मना कर दिया।

निराशा और हताशा से भरा हुआ दीनदयाल गाँव के बाहर एक घने जंगल की तरफ चला गया। वह इतना टूट चुका था कि उसे अपनी ज़िंदगी खत्म होती नज़र आ रही थी। वह एक नदी के किनारे बैठा और रोते हुए भगवान से कहने लगा: "हे भगवान! अब मैं बर्बाद हो चुका हूँ। मेरे पास दोबारा काम शुरू करने का कोई रास्ता नहीं है। मैं इस कर्ज़ और गरीबी के गहरे समंदर में डूब रहा हूँ।"

उम्मीद की छोटी किरण: रोते-रोते दीनदयाल ने अपना सिर ज़मीन पर रख दिया। तभी उसकी नम आँखों को पास की मिट्टी में कुछ 'चमकता' हुआ दिखाई दिया।

उसने आँसू पोंछे और मिट्टी को थोड़ा सा खोदा। अंदर से एक बहुत ही पुराना, लेकिन असली 'चाँदी का छोटा सा सिक्का' निकला। किसी राहगीर का वह सिक्का शायद बरसों पहले वहाँ गिर गया होगा।

वह चाँदी का सिक्का कोई बहुत बड़ा खज़ाना नहीं था। उससे न तो कोई नई झोपड़ी बन सकती थी और न ही कोई नया बड़ा करघा खरीदा जा सकता था। लेकिन... उस 'एक छोटे से सिक्के' ने दीनदयाल की मरी हुई उम्मीदों में फिर से 'जान' फूँक दी।

दीनदयाल की आँखों में चमक आ गई। उसने उस सिक्के को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया। "यह भगवान का दिया हुआ इशारा है!" उसने सोचा।

दीनदयाल दौड़ता हुआ बाज़ार गया। उसने उस एक चाँदी के सिक्के से केवल 'थोड़ा सा सूत (Thread) और बुनाई की दो सिलाइयाँ' खरीदीं। वह अपनी जली हुई झोपड़ी के बाहर बैठा और अपने हाथों से बहुत ही सुंदर और छोटे-छोटे रुमाल बुनने लगा।

अगले दिन उसने वे रुमाल बाज़ार में बेचे, जिससे उसे थोड़ा और पैसा मिला। उस पैसे से उसने और सूत खरीदा। दिन-रात एक करके, दीनदयाल की मेहनत रंग लाई और कुछ ही महीनों में उसने अपना व्यापार दोबारा खड़ा कर लिया।

जब गाँव के सरपंच ने देखा कि जो दीनदयाल पूरी तरह बर्बाद हो चुका था, वह दोबारा कैसे उठ खड़ा हुआ, तो उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई और कहा: "दीनदयाल! तुमने साबित कर दिया कि इंसान को कभी हार नहीं माननी चाहिए। तुम्हारी निराशा के उस गहरे समंदर में, वह 'एक छोटा सा चाँदी का सिक्का' तुम्हारे लिए किसी खज़ाने से कम नहीं था। सच ही कहा गया है कि संकट के समय एक छोटी सी उम्मीद भी बहुत होती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे— 'डूबते को तिनके का सहारा!' (यानी नदी में डूबते हुए इंसान के हाथ में अगर घास का एक छोटा सा तिनका भी आ जाए, तो वह उसे पकड़कर बचने की पूरी कोशिश करता है)।"

दीनदयाल ने मुस्कुराते हुए अपनी मेहनत से बनी उस नई ज़िंदगी को गले लगा लिया।

🎉 कहानी समाप्त

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