अपनी ही परछाई से रेस

एक बार पूर्णिमा की रात थी। आसमान में चाँद बहुत तेज़ चमक रहा था। शेख चिल्ली दूसरे गाँव से एक दावत खाकर पैदल अपने घर लौट रहा था।
रास्ता सुनसान था। चाँद की तेज़ रोशनी के कारण ज़मीन पर शेख चिल्ली की एक बहुत ही लंबी और साफ़ 'परछाई' बन रही थी। शेख चिल्ली ने ज़िंदगी में कभी रात के समय अपनी परछाई पर ध्यान नहीं दिया था।
अचानक उसकी नज़र ज़मीन पर उस काली परछाई पर पड़ी। उसे लगा कि कोई बहुत ही लंबा और काला 'राक्षस' या 'भूत' चुपके-चुपके उसके साथ चल रहा है।
शेख चिल्ली का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने परछाई से बचने के लिए अपनी चलने की रफ़्तार थोड़ी तेज़ कर दी। उसने देखा कि वह काला राक्षस (परछाई) भी उतनी ही तेज़ चलने लगा है!
"अरे बाप रे! यह तो मेरा पीछा कर रहा है!" शेख चिल्ली घबरा गया।
उसने दौड़ना शुरू कर दिया। चाँद की रोशनी में परछाई भी उसके साथ-साथ दौड़ रही थी। शेख चिल्ली जितनी तेज़ दौड़ता, परछाई उतनी ही तेज़ उसका पीछा करती। वह भागते-भागते पसीने से भीग गया।
रास्ते में एक छोटा सा, गंदा और कीचड़ से भरा हुआ 'तालाब' था। तालाब के ऊपर एक बहुत ही घने पेड़ की छाँव थी, जहाँ बिल्कुल घुप अँधेरा था।
शेख चिल्ली ने अपनी जान बचाने के लिए एक 'मास्टर प्लान' सोचा। वह दौड़कर गया और सीधे उस कीचड़ भरे तालाब के अँधेरे पानी में छलाँग लगा दी— 'छपाक्!'
पेड़ की छाँव और अँधेरा होने के कारण चाँद की रोशनी वहाँ नहीं पहुँच रही थी, इसलिए शेख चिल्ली की परछाई भी बननी बंद हो गई (गायब हो गई)।
शेख चिल्ली ने कीचड़ में सने हुए मुँह से ज़मीन की तरफ देखा, वहाँ कोई राक्षस नहीं था।
शेख चिल्ली ने राहत की साँस ली और मुस्कुराते हुए खुद से कहा, "देखा शेख का दिमाग! वह बेवकूफ़ राक्षस मेरे साथ दौड़ रहा था, लेकिन मैंने पानी में छलाँग लगाकर उसे ऐसा चकमा दिया कि वह मुझे ढूँढ ही नहीं पाया! मैं जीत गया!"
और इस तरह, अपनी ही परछाई से रेस लगाकर शेख चिल्ली ने खुशी-खुशी पूरा कीचड़ अपने कपड़ों पर मल लिया।
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