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😄 शेखचिल्ली

मक्खी का शिकार (दोस्त को बचाना)

लोक परंपरा3 मिनट का पठन
मक्खी का शिकार (दोस्त को बचाना)

शेख चिल्ली का एक ही पक्का दोस्त था, जिसका नाम 'रम्मू' था। एक दिन गर्मी की दोपहर में रम्मू शेख चिल्ली के आँगन में खटिया पर लेटा गहरी नींद में सो रहा था।

शेख चिल्ली पास ही बैठकर पंखा झल रहा था। तभी कहीं से एक बहुत ही ढीठ और भिनभिनाती हुई 'मक्खी' उड़कर आई और सोते हुए रम्मू की 'नाक' पर आकर बैठ गई।

रम्मू ने नींद में अपना हाथ हिलाया, मक्खी उड़ी, लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर आकर उसकी नाक पर बैठ गई। ऐसा तीन-चार बार हुआ।

शेख चिल्ली को उस मक्खी पर बहुत तेज़ गुस्सा आ गया। उसने सोचा: "यह दुष्ट मक्खी मेरे प्यारे दोस्त की नींद खराब कर रही है। मैं एक सच्चा दोस्त हूँ। मैं इस मक्खी को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि यह दोबारा मेरे दोस्त के आस-पास भटकने की हिम्मत नहीं करेगी!"

शेख चिल्ली अपनी जगह से उठा। वह मक्खी को हाथ या पंखे से उड़ा सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह आँगन के कोने में गया और वहाँ से एक बहुत ही 'भारी और ठोस ईंट' उठा लाया!

शेख चिल्ली दबे पाँव रम्मू की खटिया के पास पहुँचा। मक्खी अभी भी रम्मू की नाक पर मज़े से बैठी हुई थी।

शेख चिल्ली ने वह भारी ईंट अपने दोनों हाथों से हवा में उठाई। उसने मक्खी पर निशाना साधा और पूरी ताक़त से वह ईंट रम्मू की नाक पर दे मारी— 'धपाक्!'

ईंट के हवा में आते ही मक्खी तो तुरंत फुर्र से उड़ गई, लेकिन ईंट सीधे रम्मू की नाक पर जाकर गिरी।

"आऽऽऽह! मर गया!" रम्मू भयानक दर्द से चीखता हुआ अपनी खटिया से ज़मीन पर आ गिरा। उसकी नाक टूट चुकी थी और खून बह रहा था।

रम्मू ने रोते हुए शेख चिल्ली से पूछा, "अरे दुश्मन! तूने मुझ पर ईंट क्यों मारी? मेरी नाक तोड़ दी!"

शेख चिल्ली ने बहुत ही गर्व से अपना सीना फुलाते हुए कहा, "अरे रम्मू! तू मुझे दुश्मन क्यों कह रहा है? मैं तो तेरी जान बचा रहा था। एक बहुत ही खूँखार मक्खी तेरी नाक पर बैठी थी और मैंने इस ईंट से उस मक्खी का शिकार कर लिया। देख, अब वह मक्खी यहाँ नहीं है। एक दोस्त ही दोस्त के काम आता है!"

रम्मू अपनी टूटी हुई नाक पकड़कर रोता रहा और उसने कसम खा ली कि वह ज़िंदगी में कभी शेख चिल्ली के आस-पास नहीं सोएगा।

🎉 कहानी समाप्त

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