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भाग 25: अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन, रावण की धमकी और श्रीराम की मुद्रिका

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 25: अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन, रावण की धमकी और श्रीराम की मुद्रिका

परम भक्त विभीषण से यह जानकर कि माता सीता अशोक वाटिका में हैं, हनुमान जी ने तुरंत उस दिशा की ओर प्रस्थान किया। लंका के भव्य और विलासी महलों को पीछे छोड़ते हुए, वे एक अत्यंत विशाल और सघन उपवन (बगीचे) के पास पहुँचे। यह रावण की प्रिय 'अशोक वाटिका' थी। वहां के वृक्षों पर स्वर्ण और रजत (चांदी) के पुष्प खिले हुए थे, और सुंदर सरोवर मीठे जल से भरे थे, परंतु वहां का वातावरण एक अजीब सी उदासी और भय से घिरा हुआ था।

हनुमान जी ने अपना शरीर अत्यंत सूक्ष्म (छोटा) कर लिया और वाटिका के भीतर एक विशाल 'शिंशपा' (अशोक) वृक्ष की घनी पत्तियों के बीच जाकर छिप गए। वहां से उन्होंने जो दृश्य देखा, उसने इस वज्र के समान कठोर वानर की आंखों में भी आंसू ला दिए।

उसी अशोक वृक्ष के नीचे एक अत्यंत दुर्बल, मलिन और उदास स्त्री बैठी थी। उनके वस्त्र मैले हो चुके थे, बाल उलझे हुए थे और मुख पर घोर संताप था। वे पृथ्वी की ओर दृष्टि गड़ाए, निरंतर अश्रु बहाते हुए केवल अपने होठों में "राम... राम..." बुदबुदा रही थीं। उनके आस-पास अनेक अत्यंत भयंकर और कुरूप राक्षसियां—जिनके हाथों में भाले, तलवारें और त्रिशूल थे—उन्हें घेरे हुए बैठी थीं और उन्हें डरा-धमका रही थीं।

हनुमान जी को यह समझने में एक क्षण भी नहीं लगा कि यही उनकी माता, जगत जननी जानकी (सीता) हैं। उनके हृदय में एक ओर अपनी माता के दर्शन का असीम आनंद था, तो दूसरी ओर उनकी यह दुर्दशा देखकर भयंकर क्रोध उबल रहा था।

तभी अचानक वाटिका में नगाड़े और वाद्ययंत्र बजने लगे। हनुमान जी ने वृक्ष की डालियों से झांककर देखा, लंकापति रावण अपनी अनेक रानियों (जिनमें मंदोदरी भी थी) के साथ पूरे लाव-लश्कर के साथ वहां आ रहा था। रावण को अपनी ओर आता देख सीता जी भयभीत हो गईं।

रावण सीता जी के समीप आया और अत्यंत अहंकार भरे स्वर में बोला, "हे सीते! तुम व्यर्थ ही उस वनवासी राम के लिए अपना जीवन नष्ट कर रही हो। राम अब तक तो भूखा मर गया होगा, या मेरे भय से कहीं छिप गया होगा। तुम मेरी ओर देखो। मैं तुम्हें अपनी पटरानी बनाऊँगा। लंका की सारी रानियां तुम्हारी दासियां बनेंगी। मेरी अपार संपत्ति और शक्ति को स्वीकार करो।"

पतिव्रता सीता जी ने रावण की ओर देखना भी पाप समझा। उन्होंने एक घास के तिनके (तृण) को उठाया और अपने तथा रावण के बीच में रख दिया (ताकि एक पराई स्त्री और पर-पुरुष के बीच मर्यादा बनी रहे)।

सीता जी ने अत्यंत निर्भयता और तेज के साथ उत्तर दिया, "अरे नीच! तू क्या समझता है कि एक शेरनी कभी एक सियार के साथ रह सकती है? तूने छिपकर एक कायर की भांति मेरा हरण किया है। यदि मेरे राम के सामने तू आया होता, तो वे अपने एक ही बाण से तेरे दस सिरों को काट कर धरती पर गिरा देते। तू मेरी बात सुन, यदि तूने मुझे ससम्मान मेरे राम को नहीं लौटाया, तो लंका का सर्वनाश निश्चित है!"

सीता जी के मुख से यह कठोर तिरस्कार सुनकर रावण का अहंकार तिलमिला उठा। उसने क्रोध में अपनी अत्यंत भयानक और चमकती हुई तलवार 'चंद्रहास' निकाल ली और गरज कर बोला, "तूने मेरे प्रेम का अपमान किया है!"

रावण ने जैसे ही तलवार उठाई, महारानी मंदोदरी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया। मंदोदरी ने कहा, "स्वामी! एक निहत्थी और बंदी स्त्री की हत्या करना आपके जैसे महान योद्धा को शोभा नहीं देता। इसे थोड़ा और समय दीजिए।"

रावण का क्रोध कुछ शांत हुआ, परंतु जाते-जाते उसने एक भयंकर चेतावनी दी: "हे सीते! मैं तुम्हें केवल एक मास (महीने) का समय और देता हूँ।" रावण के जाते ही राक्षसियां सीता जी पर टूट पड़ीं और उन्हें तरह-तरह से डराने लगीं। सीता जी फूट-फूट कर रो रही थीं।

तभी उन राक्षसियों में से 'त्रिजटा' नाम की एक वृद्ध राक्षसी उठी। त्रिजटा वास्तव में विभीषण की पुत्री थी और स्वभाव से अत्यंत धर्मपरायण थी। उसने सभी राक्षसियों को डांटते हुए कहा, "अरी मूर्खों! तुम सीता को सताना बंद करो। मैंने आज रात एक अत्यंत भयानक स्वप्न देखा है। मैंने देखा कि एक वानर ने पूरी लंका को आग लगा दी है, रावण गधे पर बैठकर दक्षिण दिशा (यमलोक) की ओर जा रहा है, और राम एक सफेद हाथी पर बैठकर लंका आ रहे हैं। यह स्वप्न सत्य होने वाला है। यदि तुम सीता की शरण में जाओगी, तो तुम्हारे प्राण बचेंगे।"

त्रिजटा का भयानक स्वप्न सुनकर सभी राक्षसियां डर गईं और सीता जी को छोड़कर दूर जाकर सो गईं।

जब वाटिका में सन्नाटा छा गया, तब सीता जी ने रोते हुए अशोक वृक्ष से प्रार्थना की, "हे वृक्षराज! तुम्हारा नाम अशोक (शोक दूर करने वाला) है। तुम अपने नाम को सार्थक करो और मुझे अग्नि (आग) प्रदान करो, ताकि मैं इसी क्षण अपना शरीर भस्म कर सकूँ। अब मुझसे यह वियोग और रावण के अत्याचार नहीं सहे जाते। राम के बिना अब यह जीवन व्यर्थ है।"

वृक्ष की डाल पर बैठे हनुमान जी ने देखा कि माता सीता अपने प्राण त्यागने की स्थिति में आ गई हैं। वे समझ गए कि अब सामने आने का समय आ गया है। परंतु यदि वे अचानक सामने आ गए, तो सीता जी डर जाएंगी।

इसलिए हनुमान जी ने वृक्ष के पत्तों के पीछे छिपकर अत्यंत मधुर और शांत स्वर में 'राम कथा' गानी आरंभ की। उन्होंने राजा दशरथ से लेकर, राम जन्म, ताड़का वध, सीता स्वयंवर और स्वर्ण मृग तक की पूरी कथा अत्यंत स्पष्ट शब्दों में गाई।

अपने राम की कथा और उनका नाम सुनते ही सीता जी का सारा दुख पल भर के लिए दूर हो गया। उन्होंने चौंक कर ऊपर देखा और बोलीं, "मेरे कानों में यह अमृत किसने घोला? मेरे प्रभु की यह सत्य कथा कौन गा रहा है?"

तभी हनुमान जी ने अपने हाथ में रखी हुई श्रीराम की वह 'स्वर्ण मुद्रिका' (अंगूठी) नीचे गिरा दी। अंगूठी सीधे सीता जी की गोद में आकर गिरी।

सीता जी ने उस अंगूठी को उठाया। उस पर 'राम' नाम अंकित था और वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसी श्रीराम पहनते थे। सीता जी उसे देखकर रोने लगीं। एक पल को उन्हें लगा कि कहीं यह रावण की कोई माया तो नहीं? परंतु फिर उन्होंने सोचा कि माया से भगवान के नाम की ऐसी पवित्र अंगूठी नहीं बनाई जा सकती।

सीता जी ने व्याकुल होकर पुकारा, "हे अदृश्य प्राणी! तुम जो भी हो, मेरे सामने आओ। तुमने मुझे मेरे प्राणनाथ की यह अंगूठी देकर मुझे नवजीवन दिया है।"

माता की आज्ञा पाकर हनुमान जी एक अत्यंत छोटे (बिल्ली के समान) वानर का रूप धारण करके वृक्ष से नीचे उतरे और हाथ जोड़कर, आंखों में आंसू भरे माता सीता के चरणों में गिर पड़े। अब एक असीम भक्ति और करुणा से भरे संवाद का आरंभ होने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

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