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🏹 रामायण

भाग 26: सीता-हनुमान संवाद, चूड़ामणि प्रदान और अशोक वाटिका विध्वंस

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 26: सीता-हनुमान संवाद, चूड़ामणि प्रदान और अशोक वाटिका विध्वंस

वृक्ष की डाल से एक अत्यंत सूक्ष्म (छोटे) वानर को उतरते और अपने चरणों में प्रणाम करते देख माता सीता पहले तो ठिठक गईं। रावण की मायावी चालों से परिचित होने के कारण, उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि कहीं यह कोई मायावी राक्षस तो नहीं है जो राम की अंगूठी लेकर मुझे छलने आया है?

हनुमान जी माता सीता के मन का संशय समझ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर, अत्यंत अश्रुपूर्ण नेत्रों और मधुर वाणी में कहा, "हे माता! मुझ पर संदेह न करें। मैं सचमुच करुणानिधान श्रीराम का दूत और दास हूँ। मेरा नाम हनुमान है। यह मुद्रिका (अंगूठी) स्वयं प्रभु ने मुझे आपकी पहचान के लिए दी थी।"

माता सीता को अभी भी पूर्ण विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, "वानर और मनुष्यों की मित्रता कैसे हो सकती है? यदि तुम सचमुच राम के दूत हो, तो मुझे उनके रूप और उनके शरीर के चिह्नों का वर्णन करके सुनाओ।"

तब हनुमान जी ने श्रीराम के मस्तक, उनके कमल नयन, उनकी लंबी भुजाओं और उनके शरीर का ऐसा सटीक वर्णन किया, जो केवल अत्यंत निकट रहने वाला व्यक्ति ही जान सकता था। इसके साथ ही, हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता का पूरा वृत्तांत भी सुनाया।

यह सुनकर माता सीता का सारा संदेह मिट गया। उनके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। जो सीता पिछले कई महीनों से एक भी शब्द प्रेम का सुनने के लिए तरस रही थीं, आज राम का संदेश पाकर उनका हृदय फूल के समान खिल उठा। उन्होंने कांपते स्वर में पूछा, "हे पुत्र हनुमान! मेरे राम कैसे हैं? क्या वे मुझे याद करते हैं? मेरे देवर लक्ष्मण कैसे हैं?"

हनुमान जी ने भारी गले से उत्तर दिया, "माता! प्रभु शारीरिक रूप से तो ठीक हैं, परंतु आपके वियोग में वे अत्यंत दुखी हैं। वे रात-दिन केवल आपका ही स्मरण करते हैं। उन्होंने मुझे यह संदेश दिया है कि आप तनिक भी भयभीत न हों। बहुत शीघ्र वे अपनी विशाल वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण करेंगे और रावण का वध करके आपको ससम्मान अयोध्या ले जाएंगे।"

यह सुनकर सीता जी के हृदय को बड़ी सांत्वना मिली। परंतु रावण की सेना और लंका की अजेयता को देखकर उन्होंने एक शंका प्रकट की, "पुत्र! रावण की सेना अत्यंत विशाल और भयंकर है। तुम तो इतने छोटे से वानर हो, तुम्हारी सेना भी तुम्हारे ही जैसी होगी। तुम सब इन बलवान राक्षसों से कैसे युद्ध करोगे?"

माता की इस शंका को दूर करने के लिए हनुमान जी ने क्षण भर के लिए अपना वह 'सुमेरु पर्वत' के समान विशाल और भयंकर रूप प्रकट किया, जिसे देखकर देवता भी कांप उठते थे। उस रूप को देखकर माता सीता को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह वानर सेना लंका का सर्वनाश करने में पूर्णतः सक्षम है।

हनुमान जी ने पुनः अपना सामान्य रूप धारण किया और हाथ जोड़कर एक अत्यंत साहसिक प्रस्ताव रखा। "हे माता! यदि आप आज्ञा दें, तो मैं आपको अभी इसी क्षण अपनी पीठ पर बिठाकर समुद्र के पार श्रीराम के पास ले चलूँ। मुझमें इतनी शक्ति है कि रावण की पूरी सेना मिलकर भी मुझे नहीं रोक सकती।"

माता सीता हनुमान जी की शक्ति और उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुईं, परंतु उन्होंने इस प्रस्ताव को अत्यंत मर्यादापूर्ण ढंग से अस्वीकार कर दिया। सीता जी ने कहा:

"हे पुत्र! तुम्हारा यह प्रस्ताव तुम्हारे बल और प्रेम के अनुकूल है, परंतु यह उचित नहीं होगा। पहली बात, उड़ते समय यदि राक्षसों ने तुम पर आक्रमण किया, तो तुम युद्ध करोगे या मेरी रक्षा? दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात—मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ और अपनी इच्छा से किसी भी अन्य पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती (रावण ने बलपूर्वक स्पर्श किया था)। और सबसे बड़ी बात, यदि तुम मुझे चुराकर ले गए, तो मेरे राम के यश पर कलंक लगेगा कि राम अपनी पत्नी को युद्ध में जीत कर नहीं, बल्कि चोरी से वापस लाए। मेरे राम का धर्म है कि वे स्वयं आएं, रावण को उसके पाप का दंड दें और मुझे पूरे सम्मान के साथ वापस ले जाएं।"

हनुमान जी माता सीता के इस धर्मनिष्ठ और दूरदर्शी उत्तर को सुनकर उनके चरणों में नतमस्तक हो गए।

चलने का समय निकट आ रहा था। हनुमान जी ने कहा, "माता! अब मुझे विदा दें। प्रभु को विश्वास दिलाने के लिए कृपया मुझे कोई ऐसी 'पहचान' (चिह्न) दें, जिसे देखकर प्रभु को यह विश्वास हो जाए कि मैं आपसे मिल चुका हूँ।"

सीता जी ने अपने बालों से अपनी 'चूड़ामणि' (एक अत्यंत सुंदर और दिव्य रत्न जड़ा आभूषण, जो महाराज दशरथ ने उन्हें विवाह के समय दिया था) निकाली और हनुमान जी को सौंप दी।

इसके साथ ही सीता जी ने एक गुप्त कथा भी सुनाई। उन्होंने कहा, "पुत्र! राम से कहना कि जब हम चित्रकूट में थे, तब 'जयंत' (इंद्र का पुत्र) ने एक कौए का रूप धारण करके मेरे पैरों में चोंच मारी थी। तब आपने एक साधारण सींक (घास के तिनके) को 'ब्रह्मास्त्र' बनाकर उस कौए के पीछे छोड़ दिया था। वह तीनों लोकों में अपनी जान बचाता फिरा, परंतु किसी ने उसे शरण नहीं दी। अंततः आपके ही चरणों में गिरकर उसकी जान बची। जो राम एक साधारण कौए द्वारा मुझे कष्ट देने पर इतने क्रोधित हो गए थे, वे आज इतने शांत क्यों हैं? उनसे कहना कि सीता ने उन्हें केवल 'एक मास' (महीने) का समय दिया है। यदि एक महीने के भीतर वे मुझे लेने नहीं आए, तो वे अपनी सीता को जीवित नहीं पाएंगे।"

हनुमान जी ने वह चूड़ामणि अत्यंत आदर से अपने मस्तक से लगाई। राम का कार्य पूर्ण हो चुका था, परंतु हनुमान जी एक अत्यंत चतुर नीतिज्ञ (कूटनीतिज्ञ) भी थे। उन्होंने सोचा, "मैंने सीता माता को खोज तो लिया, परंतु एक अच्छे गुप्तचर का कर्तव्य है कि वह शत्रु की सैन्य शक्ति, उसके योद्धाओं के बल और उसके हथियारों का भी अनुमान लगाए, ताकि श्रीराम युद्ध की उचित योजना बना सकें। और शत्रु की शक्ति जानने का सबसे अच्छा तरीका है—उन्हें युद्ध के लिए उकसाना।"

इसके अतिरिक्त, हनुमान जी को अत्यंत तेज भूख भी लग रही थी। उन्होंने सीता जी से कहा, "माता! आपके दर्शन से मेरा मन तो तृप्त हो गया, परंतु इस सुंदर वाटिका के पके हुए फलों को देखकर मेरे पेट में भयंकर भूख जाग उठी है। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं कुछ फल खा लूँ?"

सीता जी ने चिंतित होकर कहा, "पुत्र! यहाँ बहुत क्रूर राक्षस पहरा देते हैं, तुम संभल कर रहना।" हनुमान जी ने मुस्कुराकर कहा, "माता! आप मेरी चिंता न करें।"

आज्ञा पाते ही हनुमान जी ने अपना अत्यंत विशाल रूप धारण कर लिया और अशोक वाटिका में प्रलय मचाना शुरू कर दिया। उन्होंने केवल फल ही नहीं खाए, बल्कि बड़े-बड़े फलों वाले वृक्षों को जड़ों से उखाड़-उखाड़ कर फेंकना शुरू कर दिया। उन्होंने वाटिका के सुंदर मंडपों, सरोवरों और विश्राम गृहों को तहस-नहस कर दिया। उन्होंने केवल उस 'अशोक वृक्ष' को नहीं छुआ, जिसके नीचे माता सीता बैठी थीं।

जब रक्षक राक्षसों ने यह तबाही देखी और हनुमान जी को रोकने आए, तो हनुमान जी ने उन्हें पेड़ों के तनों और अपनी लातों से मार-मार कर धरती पर सुला दिया। जो राक्षस बच गए, वे लहूलुहान होकर रावण के दरबार में पहुँचे और त्राहि-त्राहि करते हुए बोले:

"महाराज! एक अत्यंत विशाल और भयंकर वानर ने आपकी प्रिय अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है। वह कोई साधारण वानर नहीं है, वह काल के समान है। उसने हमारे सैकड़ों रक्षकों को मार डाला है!"

अपनी प्रिय वाटिका के विनाश का समाचार सुनकर रावण क्रोध से पागल हो गया। उसने तुरंत अपने सबसे छोटे और अत्यंत पराक्रमी पुत्र 'अक्षय कुमार' को एक विशाल सेना के साथ उस वानर को बंदी बनाने के लिए भेजा।

अक्षय कुमार एक स्वर्ण रथ पर सवार होकर, अपने साथ कई हजार सैनिकों को लेकर अशोक वाटिका पहुँचा। उसने हनुमान जी पर चारों ओर से तीरों की वर्षा आरंभ कर दी। अक्षय कुमार वास्तव में एक बहुत बड़ा योद्धा था, और उसके बाण हनुमान जी के शरीर से टकराने लगे।

हनुमान जी ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ा और उसे घुमाकर अक्षय कुमार के रथ पर दे मारा। रथ चकनाचूर हो गया और उसके घोड़े मारे गए। परंतु अक्षय कुमार हवा में उड़ गया और तलवार लेकर हनुमान जी पर झपटा।

दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंततः हनुमान जी ने अक्षय कुमार के दोनों पैर पकड़े, उसे हवा में गोल-गोल घुमाया और पूरी शक्ति के साथ धरती पर पटक दिया। रावण का वह वीर और युवा पुत्र वहीं लहूलुहान होकर मारा गया। हनुमान जी ने उसकी पूरी सेना को भी कुचल डाला और वापस उसी महल के द्वार (तोरण) पर जाकर बैठ गए, जैसे किसी अगले शिकार की प्रतीक्षा कर रहे हों।

जब अक्षय कुमार की मृत्यु का समाचार रावण तक पहुँचा, तो वह सिंहासन से उठ खड़ा हुआ। उसके पुत्र का वध हो चुका था। अब रावण समझ गया कि यह कोई साधारण जंगली वानर नहीं है। रावण ने अपनी लाल आंखों से अपने सबसे बड़े, सबसे शक्तिशाली और अजेय पुत्र—'मेघनाद' (इंद्रजीत)—की ओर देखा और उसे उस वानर को बांधकर लाने का आदेश दिया। अब दो महाबलियों के बीच एक भयंकर टक्कर होने वाली थी।

🎉 कहानी समाप्त

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