भाग 24: लंका में प्रवेश, लंकिनी से युद्ध और विभीषण से भेंट

रात के घने अंधकार में, समुद्र को लांघकर पवनपुत्र हनुमान त्रिकूट पर्वत पर बसी रावण की अभेद्य नगरी 'लंका' के मुख्य द्वार पर जा पहुँचे। उन्होंने पहले ही अपना शरीर अत्यंत सूक्ष्म (एक छोटे से मच्छर या बिल्ली के बच्चे के समान) कर लिया था, ताकि लंका के भयंकर पहरेदारों की दृष्टि से बच सकें।
लंका का वैभव देखकर हनुमान जी भी एक क्षण के लिए चकित रह गए। सोने की दीवारें, मणियों से जड़े हुए खंभे और हर तरफ जलते हुए रत्न-दीपकों से वहां रात में भी दिन जैसा उजाला था। परंतु हनुमान जी का मन इस भौतिक चकाचौंध में नहीं अटका। वे छिपते-छिपाते मुख्य द्वार के भीतर प्रवेश करने ही वाले थे कि अचानक एक भयंकर और कर्कश आवाज़ गूंजी:
"कहाँ जा रहा है रे तुच्छ प्राणी? क्या तू नहीं जानता कि मैं इस लंका की रक्षक 'लंकिनी' हूँ? कोई भी चोर या गुप्तचर मेरी आंखों से बचकर अंदर नहीं जा सकता। मेरा भोजन ही वे मूर्ख हैं जो लंका में चोरी-छिपे घुसने का प्रयास करते हैं!"
लंकिनी कोई साधारण राक्षसी नहीं थी, वह स्वयं लंका नगरी की अधिष्ठात्री देवी थी। उसने अपने विशाल हाथों से उस सूक्ष्म रूप वाले हनुमान जी को पकड़ लिया।
हनुमान जी समझ गए कि यदि यहाँ युद्ध लंबा खिंचा, तो पूरी लंका जाग जाएगी। इसलिए उन्होंने अपना रूप थोड़ा सा बड़ा किया और अपना बायां हाथ (मुट्ठी) कसकर लंकिनी के सिर पर दे मारा। हनुमान जी ने जानबूझकर प्रहार धीमा रखा था, क्योंकि वे एक स्त्री का वध नहीं करना चाहते थे। परंतु वह प्रहार भी वज्र के समान था।
मुक्का लगते ही लंकिनी चक्कर खाकर धरती पर गिर पड़ी। जब उसे होश आया, तो उसका क्रोध शांत हो चुका था और उसकी आंखों में एक दिव्य चमक थी। लंकिनी ने हाथ जोड़कर हनुमान जी से कहा:
"हे वानर श्रेष्ठ! मुझे क्षमा करें। मैं जान गई हूँ कि आप कौन हैं। जब ब्रह्मा जी ने रावण को वरदान दिया था, तब उन्होंने मुझसे एक रहस्य कहा था— 'जिस दिन कोई वानर आकर तुम्हें अपने प्रहार से व्याकुल कर दे, उस दिन समझ लेना कि अब राक्षसों के विनाश का समय आ गया है।' हे रामदूत! आज वह भविष्यवाणी सत्य हो गई। अब लंका का अंत निश्चित है। आप भीतर प्रवेश करें और अपने प्रभु के सारे कार्य पूर्ण करें।" (प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥)
लंकिनी का आशीर्वाद पाकर हनुमान जी ने लंका के भीतर प्रवेश किया। रात का समय था और लंका के सभी राक्षस मदिरा पीकर और मांसाहार करके गहरी नींद में सो रहे थे। हनुमान जी एक महल से दूसरे महल की छत पर कूदते हुए माता सीता को खोजने लगे।
उन्होंने राक्षसों के शयनकक्ष देखे, उनके भयंकर अस्त्र-शस्त्र देखे, परंतु सीता माता कहीं नहीं मिलीं। खोजते-खोजते हनुमान जी लंकापति रावण के मुख्य और सबसे विशाल महल में जा पहुँचे। वहां का ऐश्वर्य और विलासिता अवर्णनीय थी। रावण एक अत्यंत विशाल सोने के पलंग पर सो रहा था।
तभी हनुमान जी की दृष्टि रावण के कक्ष में सो रही एक अत्यंत रूपवान और तेजस्वी स्त्री पर पड़ी। वह रावण की पटरानी 'मंदोदरी' थी। एक क्षण के लिए हनुमान जी को लगा कि कहीं यही तो सीता नहीं है? परंतु अगले ही क्षण उन्होंने स्वयं को धिक्कारा और सोचा, "मेरे प्रभु राम की सीता राम के वियोग में कभी इस प्रकार सुख की नींद नहीं सो सकती, और न ही वह ऐसे आभूषण धारण कर सकती है। यह अवश्य ही रावण की कोई रानी होगी।"
रावण के महल का कोना-कोना छानने के बाद भी जब सीता का कोई सुराग नहीं मिला, तो हनुमान जी अत्यंत निराश हो गए। वे सोचने लगे कि कहीं रावण ने सीता को मार तो नहीं डाला? या कहीं सीता समुद्र पार करते समय रावण के चंगुल से छूटकर समुद्र में तो नहीं गिर गईं?
इसी निराशा और उदासी के बीच, हनुमान जी लंका के एक एकांत मार्ग से गुजर रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक ऐसे भवन पर पड़ी जो पूरी लंका से बिल्कुल भिन्न था। उस भवन की दीवारें सोने की तो थीं, परंतु उन पर शंख, चक्र, गदा और धनुष-बाण (भगवान विष्णु और राम के आयुध) के पवित्र चिह्न बने हुए थे। और सबसे बड़ी बात—उस भवन के द्वार पर एक अत्यंत सुंदर 'तुलसी' का पौधा लगा हुआ था!
हनुमान जी आश्चर्य में पड़ गए। "लंका तो राक्षसों और पापियों का निवास है। यहाँ यह सज्जन और भक्त का घर कहाँ से आ गया?"
तभी उस भवन के भीतर से अत्यंत मधुर और शांत स्वर में एक ध्वनि सुनाई दी: "राम... राम... राम..." कोई ब्रह्म मुहूर्त में उठकर श्रीराम के नाम का जप कर रहा था। हनुमान जी का हृदय आनंद से नाच उठा। वे समझ गए कि यह कोई परम रामभक्त है और इससे मुझे माता सीता का पता अवश्य मिल जाएगा।
हनुमान जी ने एक ज्ञानी 'ब्राह्मण' का रूप धारण किया और उस भवन के द्वार पर जाकर पुकारा। द्वार खुला और एक अत्यंत सात्विक और शांत मुखमंडल वाला व्यक्ति बाहर आया। यह रावण का सबसे छोटा भाई 'विभीषण' था।
विभीषण ने जब एक ब्राह्मण को लंका में देखा तो वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और बोला, "हे विप्र देव! आप कौन हैं? क्या आप साक्षात मेरे आराध्य श्रीराम के कोई भक्त हैं? लंका में मुझे इस प्रकार रहना पड़ता है जैसे बत्तीस दांतों के बीच में एक बेचारी जीभ रहती है। क्या कभी मेरे प्रभु राम मुझ अनाथ पर कृपा करेंगे?"
विभीषण के इन प्रेमपूर्ण वचनों को सुनकर हनुमान जी ने अपना असली वानर रूप धारण कर लिया और विभीषण को अपने गले से लगा लिया। हनुमान जी ने कहा, "हे विभीषण! मैं उसी करुणानिधान श्रीराम का दूत और दास हनुमान हूँ। प्रभु राम तो इतने दयालु हैं कि उन्होंने मुझ जैसे एक जंगली वानर को अपना मित्र बना लिया, फिर आप तो इतने बड़े ज्ञानी और भक्त हैं।"
राम का संदेश और उनके दूत को पाकर विभीषण के नेत्रों से अश्रु बहने लगे। हनुमान जी ने अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया और पूछा, "हे मित्र! मुझे बताएँ कि मेरी माता जानकी को उस नीच रावण ने कहाँ छिपा रखा है?"
विभीषण ने एक गहरी सांस ली और कहा, "हे वीर हनुमान! माता सीता रावण के महल में नहीं हैं। रावण ने उन्हें लंका के सबसे सुरक्षित और घने उपवन—'अशोक वाटिका'—में कैद कर रखा है। वहां भयंकर राक्षसियां दिन-रात उन पर पहरा देती हैं। रावण रोज़ उन्हें डराने और विवाह के लिए विवश करने वहां जाता है, परंतु माता सीता ने अपने प्राणों को केवल राम के नाम के सहारे रोक रखा है।"
अशोक वाटिका का नाम और माता सीता का कष्ट सुनकर हनुमान जी की मुट्ठियां कस गईं। उन्होंने तुरंत विभीषण से विदा ली। अब उनके हृदय में केवल एक ही लक्ष्य था—अशोक वाटिका पहुँचना और अपनी माता के दुख भरे नेत्रों में राम के संदेश की ज्योति जगाना।
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