जादुई चप्पलें और लालची सेठ — हवा में उड़ने का लालच

विजयनगर में धनीराम नाम का एक सेठ रहता था। वह बहुत ही अमीर था, लेकिन उससे भी ज़्यादा लालची था। उसे जादुई और चमत्कारिक चीज़ें खरीदने का बड़ा शौक था, ताकि वह उनका इस्तेमाल करके और भी ज़्यादा धन कमा सके। तेनालीरामा उस सेठ की इस कमज़ोरी को भली-भांति जानते थे और उन्होंने उसका लालच खत्म करने की एक योजना बनाई।
एक दिन तेनालीरामा ने लकड़ी की दो साधारण खड़ाऊं (चप्पलें) लीं, उन पर सुनहरे रंग का पेंट किया और कुछ रंग-बिरंगे पंख चिपका दिए। फिर वे उन चप्पलों को लेकर सेठ धनीराम के पास पहुँचे।
तेनालीरामा ने अत्यंत रहस्यमयी आवाज़ में कहा: "सेठ जी! आज मुझे हिमालय के एक साधु से यह 'जादुई चप्पलें' मिली हैं। जो भी इन्हें पहनता है, वह पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है! आप चाहें तो इन्हें पहनकर आसमान से पूरी दुनिया देख सकते हैं।"
सेठ का लालच और सौदेबाज़ी: सेठ की आँखें लालच से चमक उठीं। उसने सोचा, "अगर मैं हवा में उड़ने लगूं, तो मैं बिना किसी को दिखाई दिए राजा के खज़ाने या किसी भी दूसरे देश के खज़ाने तक आसानी से पहुँच सकता हूँ!"
सेठ ने तुरंत पूछा, "तेनाली जी, ये चप्पलें आप मुझे कितने में देंगे?"
तेनालीरामा ने कहा, "सेठ जी, वैसे तो ये अनमोल हैं, परंतु आपके लिए मैं इन्हें 2,000 सोने के सिक्कों में दे दूँगा। परंतु एक शर्त है!"
सेठ ने बेताबी से पूछा: "क्या शर्त है?"
तेनालीरामा ने गंभीर होकर कहा: "साधु बाबा ने बताया था कि ये चप्पलें तभी उड़ेंगी जब इन्हें पहनने वाले का मन बिल्कुल साफ हो और उसके दिल में 'लालच' का एक भी विचार न हो! अगर मन में ज़रा भी लालच हुआ, तो चप्पलों का जादू काम नहीं करेगा।"
सेठ ने घमंड से कहा, "अरे! मेरे मन में कोई लालच नहीं है। मैं तो बहुत बड़ा दानी हूँ।" सेठ ने तुरंत 2,000 सिक्के तेनालीरामा को दे दिए और चप्पलें ले लीं।
हवा में उड़ान और ज़मीन पर पछाड़: अगले दिन सुबह, सेठ धनीराम अपने घर की ऊंची छत पर गया। उसने वे 'जादुई चप्पलें' पहनीं। उसके मन में लालच हिलोरें मार रहा था कि उड़कर कहाँ-कहाँ से धन लूटना है।
सेठ ने अपनी आँखें बंद कीं, दोनों हाथ हवा में फैलाए और छत से छलांग लगा दी!
धड़ाम!
उड़ने के बजाय सेठ धनीराम सीधा ज़मीन पर आ गिरा। उसकी दोनों टांगें टूट गईं और वह दर्द से कराहने लगा।
दरबार में शिकायत: पट्टियां बंधवाकर सेठ धनीराम महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचा। उसने रोते हुए तेनालीरामा पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया।
महाराज ने तेनालीरामा से पूछा: "तेनाली! तुमने इस सेठ को नकली चप्पलें देकर क्यों ठगा?"
तेनालीरामा ने हाथ जोड़कर अत्यंत शांति से कहा: "महाराज! मैंने कोई धोखा नहीं दिया। मैंने सेठ जी को पहले ही बता दिया था कि ये चप्पलें केवल तभी उड़ेंगी जब मन में 'लालच' न हो। जब सेठ जी छत से कूदे, तो उनके मन में जादुई चप्पलों से मुफ़्त में उड़ने और दूसरों का धन लूटने का भयंकर लालच भरा हुआ था! उनके इसी लालच के भारीपन ने उन्हें उड़ने नहीं दिया और वे नीचे गिर गए। इसमें चप्पलों का क्या दोष?"
सेठ धनीराम अपना सा मुँह लेकर रह गया। वह राजा के सामने यह नहीं कह सकता था कि उसके मन में लालच था। महाराज सारी बात समझ गए और उन्होंने मुस्कुराते हुए सेठ को चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी 'शॉर्टकट' या अंधविश्वास के लालच में न पड़े।
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