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"एक हाथ से ताली नहीं बजती"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"एक हाथ से ताली नहीं बजती"

'रामू' और 'शामू' दोनों पड़ोसी थे। दोनों के घरों के बीच केवल एक छोटी सी 'ईंट की दीवार' थी। रामू स्वभाव से थोड़ा तुनकमिज़ाज था और शामू बहुत ही ज़िद्दी था।

एक दिन रामू ने अपनी दीवार के बिल्कुल पास एक 'आम का पेड़' लगा दिया। जब पेड़ बड़ा हुआ, तो उसकी टहनियाँ शामू के आँगन की तरफ झुक गईं। पतझड़ के मौसम में आम के पेड़ के सारे 'सूखे पत्ते' शामू के साफ़-सुथरे आँगन में गिरने लगे।

शामू को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने रामू से कई बार पेड़ काटने को कहा, लेकिन रामू ने अकड़ते हुए जवाब दिया: "पेड़ मेरी ज़मीन पर है, मैं नहीं काटूँगा। पत्ते गिरते हैं तो खुद साफ़ कर ले।"

झगड़े की शुरुआत: शामू को बहुत गुस्सा आया। उसने अपनी ज़िद में आकर, अपने घर का सारा 'कूड़ा-कचरा' इकट्ठा किया और उस दीवार के ऊपर से सीधा रामू के आँगन में फेंकना शुरू कर दिया!

जब रामू ने अपने आँगन में कूड़ा देखा, तो वह आग-बबूला हो गया। रामू दीवार पर चढ़कर शामू को गालियाँ देने लगा। शामू ने भी पलटकर गालियाँ दीं। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने अपने-अपने घरों से मोटी-मोटी 'लाठियाँ' निकाल लीं और दीवार के बीच में खड़े होकर एक-दूसरे पर लाठियाँ भाँजने लगे— 'ठकाक्... ठकाक्!'

दोनों के सिर फूट गए और खून बहने लगा। मोहल्ले वालों ने बीच-बचाव करके दोनों को अलग किया और मामला 'ग्राम पंचायत' में पहुँचा।

पंचायत का न्याय: सरपंच जी ने चौपाल लगाई। रामू और शामू दोनों के सिर पर पट्टियाँ बँधी थीं। दोनों खुद को बिल्कुल 'बेकसूर' साबित करने में लगे थे।

रामू ने रोते हुए कहा: "सरपंच जी! देखिए इस शामू को। मैंने इसे कुछ नहीं कहा, इसने जानबूझकर मेरे घर में सड़ा हुआ कूड़ा फेंका और मुझे लाठी से मारा। मुझे इंसाफ़ चाहिए!"

शामू तुरंत चिल्लाया: "यह झूठ बोल रहा है! इसके पेड़ के पत्तों ने मेरा घर गंदा कर दिया था। जब मैंने शिकायत की, तो इसने मुझे गंदी-गंदी गालियाँ दीं, इसलिए मैंने कूड़ा फेंका। गलती रामू की है!"

दोनों एक-दूसरे पर सारा दोष मढ़ रहे थे और खुद को बेचारा बता रहे थे।

सरपंच जी बहुत ही अनुभवी थे। उन्होंने दोनों को शांत करवाया और बहुत ही कड़क आवाज़ में कहा: "चुप हो जाओ तुम दोनों! कोई भी दूध का धुला नहीं है।"

सरपंच ने रामू की तरफ देखकर कहा: "रामू! तुम्हारी गलती यह है कि तुमने अपने पेड़ की टहनियाँ नहीं काटीं और शिकायत करने पर पड़ोसी को गालियाँ दीं।" फिर सरपंच ने शामू की तरफ देखकर कहा: "और शामू! तुम्हारी गलती यह है कि तुमने बात सुलझाने के बजाय उसके आँगन में कूड़ा फेंका और पहले लाठी उठाई।"

सरपंच जी ने अपना फैसला सुनाते हुए पूरे गाँव से कहा: "गाँव वालो! कभी भी हवा में केवल एक हाथ हिलाने से ताली की आवाज़ नहीं आती। ताली बजने के लिए हमेशा दोनों हाथों का टकराना ज़रूरी है। झगड़ा भी बिल्कुल ताली की तरह होता है। यह दोनों एक-दूसरे पर दोष लगा रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि 'एक हाथ से ताली नहीं बजती!' दोनों बराबर के दोषी हैं।"

सरपंच ने सज़ा के तौर पर रामू को पेड़ की टहनियाँ काटने और शामू को रामू का पूरा आँगन साफ़ करने का आदेश दिया। दोनों पड़ोसी शर्मिंदा हुए और उन्होंने हाथ मिलाकर आगे से न लड़ने की कसम खाई।

🎉 कहानी समाप्त

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