बैलों का दूध — महाराज की अजीब ज़िद और आधी रात का हंगामा

महाराजा कृष्णदेवराय के दरबार के कुछ ईर्ष्यालु मंत्री हमेशा तेनालीरामा को नीचा दिखाने की ताक में रहते थे। एक दिन उन्होंने महाराज के कान भरे और कहा: "महाराज, तेनालीरामा खुद को दुनिया का सबसे ज्ञानी इंसान समझता है। यदि वह इतना ही ज्ञानी और सक्षम है, तो आप उससे कोई ऐसा काम करवा कर देखिए जो दुनिया में कोई न कर सके!"
महाराज को यह चुनौती अच्छी लगी। उन्होंने अगले दिन तेनालीरामा को दरबार में बुलाया और एक अत्यंत अजीबोगरीब आदेश दिया: "तेनालीरामा! मुझे पता चला है कि 'बैलों' का दूध सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। मेरी ज़िद है कि तुम कल सुबह तक मेरे पीने के लिए एक बाल्टी 'बैलों का दूध' लेकर आओ! यदि तुम नहीं ला पाए, तो तुम्हें दरबार से निकाल दिया जाएगा।"
यह सुनकर दरबार के ईर्ष्यालु मंत्री मन ही मन मुस्कुराने लगे। पूरी दुनिया जानती है कि दूध गाय देती है, बैल नहीं। यह एक असंभव काम था।
परंतु तेनालीरामा बिल्कुल नहीं घबराए। उन्होंने सिर झुकाकर कहा, "जैसी आपकी आज्ञा महाराज! कल सुबह तक आपको बैलों का दूध मिल जाएगा।"
आधी रात का हंगामा: उस रात तेनालीरामा ने एक गठरी में बहुत सारे गंदे कपड़े बांधे और राजमहल के ठीक पीछे बने उस तालाब पर पहुँच गए, जिसके किनारे महाराज का शयनकक्ष था।
आधी रात के समय, जब पूरी राजधानी गहरी नींद में सो रही थी, तेनालीरामा ने एक बड़ी सी लकड़ी की थापी उठाई और कपड़ों को पत्थर पर ज़ोर-ज़ोर से पीट-पीट कर धोना शुरू कर दिया।
छपाक! धड़ाम! छपाक! धड़ाम!
रात के सन्नाटे में कपड़े पीटने की तेज़ आवाज़ ने महाराज कृष्णदेवराय की नींद उड़ा दी। महाराज को बहुत गुस्सा आया कि इतनी रात गए कौन उनके महल के पास कपड़े धो रहा है।
उन्होंने अपने पहरेदारों को भेजा। पहरेदार गए और उस आदमी को पकड़ कर महाराज के सामने ले आए। जब महाराज ने देखा कि वह आदमी कोई और नहीं बल्कि स्वयं तेनालीरामा है, तो उनका गुस्सा और बढ़ गया।
तेनाली की कहानी और राजा का गुस्सा: महाराज ने गरजते हुए पूछा: "तेनालीरामा! क्या तुम पागल हो गए हो? आधी रात को मेरे महल के पीछे कपड़े पीटने का क्या मतलब है? तुम कल सुबह भी तो ये कपड़े धो सकते थे!"
तेनालीरामा ने हाथ जोड़कर अत्यंत चिंता भरे स्वर में कहा: "महाराज, मुझे क्षमा करें! परंतु बात ही कुछ ऐसी है कि मैं सुबह का इंतज़ार नहीं कर सकता था। कल शाम को मेरे 'चाचा जी' ने एक बहुत ही सुंदर बच्चे को जन्म दिया है!"
तेनालीरामा ने आगे कहा: "बच्चे के जन्म के कारण घर में बहुत सारे कपड़े गंदे हो गए थे। मुझे तुरंत वे कपड़े धोने पड़े ताकि कल सुबह तक वे सूख सकें। चाचा जी को साफ कपड़ों की ज़रूरत है।"
लॉजिक का वार: यह सुनते ही महाराज का गुस्सा हैरानी में बदल गया। उन्होंने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा: "मूर्ख तेनालीरामा! क्या तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है? दुनिया का कोई भी 'पुरुष' किसी बच्चे को जन्म कैसे दे सकता है? यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है!"
तेनालीरामा इसी बात का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने तुरंत अपनी आँखें उठाईं, मुस्कुराए और अत्यंत शालीनता से कहा: "बिल्कुल सही फरमाया महाराज! दुनिया का कोई पुरुष बच्चे को जन्म नहीं दे सकता। परंतु हुज़ूर... जब विजयनगर के ताकतवर 'बैल' दूध दे सकते हैं, तो मेरे चाचा जी बच्चा क्यों नहीं पैदा कर सकते?"
यह अचूक और व्यंग्यात्मक जवाब सुनकर महाराज के होश उड़ गए। उन्हें तुरंत याद आ गया कि उन्होंने तेनालीरामा से 'बैलों का दूध' लाने की कितनी बेतुकी और असंभव मांग की थी।
महाराज कृष्णदेवराय अपनी ही ज़िद और मूर्खता पर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे। ईर्ष्यालु मंत्री जो वहाँ खड़े थे, शर्म से पानी-पानी हो गए। महाराज ने मान लिया कि तेनालीरामा को किसी भी बेतुके सवाल में फंसाना असंभव है।
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