बकरी की मौत: असली दोषी कौन? — न्याय की कड़ी और मूर्खता का पर्दाफाश

विजयनगर में एक बार बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश के कारण शहर के एक अमीर सेठ की पुरानी दीवार अचानक गिर गई। बदकिस्मती से, उसी समय एक गरीब किसान की बकरी उस दीवार के नीचे बैठी थी। दीवार गिरने से वह बकरी दबकर मर गई।
किसान रोता हुआ महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचा और न्याय की गुहार लगाई: "महाराज! सेठ की कमज़ोर दीवार गिरने से मेरी इकलौती बकरी मर गई। मुझे सेठ से हर्जाना दिलवाइए!"
महाराज ने सेठ को बुलवाया।
दोष मढ़ने की लंबी कड़ी: सेठ बहुत चतुर था। उसने हाथ जोड़कर कहा: "महाराज! इसमें मेरी क्या गलती है? दीवार मैंने थोड़ी बनाई थी, वह तो राजगीर ने बनाई थी। दीवार कमज़ोर थी, तो सज़ा उसे मिलनी चाहिए।"
राजगीर को बुलाया गया। राजगीर ने कहा: "हुज़ूर! मेरा कोई दोष नहीं। गारा बनाने वाले मज़दूर ने गारे में पानी ज़्यादा मिला दिया था, इसलिए दीवार कमज़ोर बनी। सज़ा उसे दीजिए।"
मज़दूर को हाज़िर किया गया। मज़दूर ने कहा: "महाराज! मेरी कोई गलती नहीं। गारा बनाते समय गली से एक बहुत सुंदर नर्तकी गुज़र रही थी। उसकी पायलों की झंकार सुनकर मेरा ध्यान भटक गया और पानी ज़्यादा गिर गया। असली दोषी वह नर्तकी है!"
नर्तकी को दरबार में पेश किया गया। नर्तकी ने कहा: "महाराज! मैं गली में जानबूझकर नहीं घूम रही थी। मैंने सुनार को अपने गहने बनाने को दिए थे, परंतु वह रोज़ मुझे चक्कर लगवा रहा था। इसलिए मुझे गली से गुज़रना पड़ा। असली दोषी सुनार है!"
अंततः सुनार को पकड़ कर लाया गया। सुनार बहुत ही कमज़ोर और दुबला-पतला आदमी था। अब उसके पास दोष मढ़ने के लिए कोई नहीं बचा था।
अजीब न्याय और फंदे की समस्या: महाराज ने तंग आकर आदेश दिया: "इस सुनार की गलती से ही पूरी घटना हुई है। इसे कल सुबह फांसी पर लटका दिया जाए!"
अगली सुबह जब जल्लाद ने सुनार के गले में फांसी का फंदा डाला, तो एक नई समस्या खड़ी हो गई। सुनार इतना दुबला था कि फंदा उसके गले में फिट ही नहीं हो रहा था; वह बहुत ढीला था।
जल्लाद ने महाराज को बताया। महाराज उस दिन किसी बात से परेशान थे, उन्होंने बिना सोचे-समझे कह दिया: "अगर फंदा इस दुबले सुनार के गले में नहीं आ रहा, तो शहर से किसी 'मोटे आदमी' को पकड़ कर लाओ और उसे फांसी दे दो! न्याय तो होना ही चाहिए।"
सैनिक तुरंत शहर गए और उन्हें सबसे मोटा आदमी मिला— वह अमीर सेठ, जिसकी दीवार गिरी थी! सैनिक सेठ को फांसी देने के लिए घसीट कर ले जाने लगे। सेठ रोने लगा।
तेनालीरामा का हस्तक्षेप: तभी तेनालीरामा दरबार में पहुँचे। उन्होंने यह बेवकूफाना न्याय देखा तो हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत महाराज से कहा: "रुकिए महाराज! सेठ को फांसी देना तो न्याय के खिलाफ होगा। असली दोषी तो अभी भी बाहर घूम रहा है!"
महाराज ने पूछा: "कौन है असली दोषी?"
तेनालीरामा ने गंभीर होकर कहा: "महाराज! असली दोषी तो वह 'बकरी' है! जब उसे दिख रहा था कि दीवार पुरानी है, तो वह वहाँ जाकर बैठी ही क्यों? उसने आत्महत्या की है। इसलिए, आप उस 'मरी हुई बकरी' को फांसी पर लटकाने का आदेश दें!"
यह सुनकर महाराज चौंक गए और फिर उन्हें अपनी मूर्खता का एहसास हुआ। वे समझ गए कि दोष मढ़ने की इस बेतुकी कड़ी में वे न्याय का मूल अर्थ ही भूल गए थे और एक दुबले के बदले मोटे को फांसी देने जैसा बेवकूफाना फैसला कर बैठे थे।
महाराज ज़ोर से हंस पड़े। उन्होंने फांसी की सज़ा रद्द की और सेठ को आदेश दिया कि वह अपनी पुरानी दीवार की मरम्मत न करवाने के जुर्म में उस गरीब किसान को एक नई बकरी और मोहरें हर्जाने के रूप में दे।
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