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"बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी"

'चंदनपुर' गाँव में 'मक्खनलाल' नाम का एक बहुत ही लालची और बेईमान दूधवाला रहता था। मक्खनलाल के पास बहुत सारी गाएँ थीं। लेकिन वह ज़्यादा पैसे कमाने के लालच में हर रोज़ एक बहुत बड़ी 'बेईमानी' करता था।

गाँव के किनारे से एक बहुत बड़ी और गहरी 'नदी' बहती थी। मक्खनलाल रोज़ सुबह गायों का दूध निकालता और फिर अपनी साइकिल से उस नदी के किनारे जाता। वहाँ जाकर वह अपने दूध के पीपों में 'आधा दूध और आधा नदी का पानी' मिला देता था।

पाप की कमाई: मक्खनलाल यह मिलावटी पानी वाला दूध गाँव वालों को असली दूध के दाम पर बेचता था। जब गाँव वाले शिकायत करते: "मक्खनलाल! तुम्हारे दूध में बिल्कुल मलाई नहीं पड़ती, यह पानी जैसा क्यों है?" तो मक्खनलाल झूठी कसम खाकर कहता: "अरे काकी! मेरी गाएँ आजकल घास कम खा रही हैं, इसलिए दूध पतला है। मैं तो एकदम शुद्ध दूध लाता हूँ!"

इस बेईमानी से मक्खनलाल ने बहुत सारा पैसा कमा लिया था। उसने अपनी सारी काली कमाई 'चाँदी के सिक्कों' में बदलकर एक भारी पोटली में बाँध रखी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी चोरी कभी पकड़ी नहीं जाएगी।

नदी का इंसाफ: बरसात का मौसम आ गया था। एक दिन सुबह-सुबह, मक्खनलाल हमेशा की तरह अपनी साइकिल और दूध के पीपे लेकर नदी के किनारे पहुँचा। उसने अपनी 'चाँदी के सिक्कों की पोटली' भी अपने साथ रखी हुई थी, जिसे वह ज़मीन पर रखकर नदी का पानी दूध में मिलाने लगा।

अचानक, पहाड़ों पर भारी बारिश के कारण नदी में एक बहुत ही भयंकर 'बाढ़' आ गई! पानी का स्तर एक ही पल में भयानक शोर— 'शूऽऽऽ!' के साथ ऊपर उठने लगा।

मक्खनलाल कुछ समझ पाता, उससे पहले ही नदी की एक बहुत ऊँची और तेज़ लहर आई। उस लहर ने न केवल मक्खनलाल के 'दूध के पीपों' को नदी में बहा दिया, बल्कि ज़मीन पर रखी उसकी वह 'चाँदी के सिक्कों की भारी पोटली' भी हमेशा के लिए गहरे पानी में डूब गई!

मक्खनलाल अपनी जान बचाने के लिए पीछे भागा। वह किनारे पर खड़ा होकर रोने लगा और चिल्लाने लगा: "मेरे पैसे! मेरी ज़िंदगी भर की कमाई डूब गई!"

शोर सुनकर गाँव का सरपंच और कुछ लोग वहाँ पहुँच गए। जब उन्होंने मक्खनलाल के दूध के पीपे नदी में बहते देखे और उसकी मिलावट का सच जाना, तो सरपंच जी ने गुस्से से कहा:

"रोना बंद कर मक्खनलाल! तूने सालों तक इस नदी का मुफ़्त का पानी दूध में मिलाकर बेईमानी की। आज उसी नदी ने अपना सारा पानी और तेरी सारी पाप की कमाई वापस ले ली। कोई भी पापी हमेशा के लिए नहीं बच सकता। हमारे बुजुर्ग बिल्कुल सही कह गए हैं— 'बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी!'"

(यानी जैसे बकरे को एक न एक दिन कसाई के हाथ लगना ही होता है, वैसे ही बेईमान इंसान की चोरी एक दिन पकड़ी ही जाती है)। मक्खनलाल को अपनी बेईमानी की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी।

🎉 कहानी समाप्त

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