"मान न मान मैं तेरा मेहमान"

'शांतिपुर' गाँव में 'भोलानाथ' नाम का एक बहुत ही शरीफ़ और सीधा-सादा आदमी रहता था। भोलानाथ को शांति से रहना पसंद था।
सर्दियों की एक रात, भोलानाथ अपने घर के आँगन में अलाव जलाकर बैठा था। उसकी पत्नी ने उसके लिए थाली में गरम-गरम 'मक्के की रोटी, सरसों का साग और गुड़' परोस कर रखा था। भोलानाथ जैसे ही पहला निवाला तोड़ने वाला था, तभी उसके दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई— 'खट-खट-खट!'
भोलानाथ ने दरवाज़ा खोला। सामने एक बिल्कुल 'अनजान' और बहुत ही बातूनी आदमी खड़ा था, जिसके कंधे पर एक झोला था। उसका नाम था 'गप्पू'।
गप्पू ने बिना भोलानाथ की इजाज़त लिए, सीधे घर के अंदर कदम रख दिया और ज़ोर से बोला: "अरे भाई! बाहर बहुत ठंड है। मैं पास के गाँव जा रहा था, सोचा तुम्हारे यहाँ थोड़ा आराम कर लूँ।"
ज़बरदस्ती का कब्ज़ा: भोलानाथ अपनी शराफत के कारण उसे रोक नहीं पाया। गप्पू सीधा जाकर भोलानाथ की खटिया पर बैठ गया।
गप्पू की नज़र भोलानाथ की खाने की थाली पर पड़ी। उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने बिना हाथ धोए, झटके से वह थाली अपनी तरफ खींची और बोला: "अरे वाह! सरसों का साग! तुम तो बहुत किस्मत वाले हो भाई। मुझे भी बहुत ज़ोरों की भूख लगी थी।"
भोलानाथ बेचारा हक्का-बक्का होकर देखता रह गया। गप्पू 'गपागप' सारा खाना खा गया और डकार लेते हुए भोलानाथ के ही लोटे से पानी पी गया— 'गट... गट... गट!'
भोलानाथ ने हिम्मत करके पूछा: "भाई साहब, आप हैं कौन? मैंने आपको पहचाना नहीं।"
गप्पू ने ज़ोर से ठहाका लगाया और भोलानाथ के कंधे पर ज़ोर से हाथ मारते हुए बोला: "अरे यार! पहचान में क्या रखा है? इंसानियत ही सबसे बड़ा रिश्ता है। अब से हम पक्के दोस्त हैं!"
झल्लाहट की इंतहा: भोलानाथ भूखा पेट लिए खड़ा था। उसे लगा कि खाना खाकर गप्पू चला जाएगा। लेकिन गप्पू ने अपना झोला तकिये की जगह रखा, भोलानाथ की सबसे अच्छी रज़ाई अपने ऊपर ओढ़ी और खटिया पर मज़े से लेट गया।
गप्पू ने आँखें बंद करते हुए कहा: "भाई भोलानाथ! अब तुम दरवाज़ा बंद कर लो और ज़मीन पर चटाई बिछाकर सो जाओ। और हाँ, सुबह मेरे लिए अदरक वाली चाय ज़रूर बना देना!"
भोलानाथ का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। यह कैसा आदमी था! न कोई जान, न कोई पहचान, घर में घुसकर सारा खाना खा गया और अब उसकी खटिया पर कब्ज़ा करके सो भी रहा है।
भोलानाथ ने अपना माथा पीट लिया और मन ही मन बड़बड़ाते हुए बोला: "हे भगवान! यह कैसी मुसीबत मेरे गले पड़ गई है? मैंने तो इसे कभी देखा भी नहीं था और यह मेरे ही घर का मालिक बन बैठा है। यह तो बिल्कुल वही बात हो गई— 'मान न मान... मैं तेरा मेहमान!'"
(यानी तुम मुझे मेहमान मानो या न मानो, मैं तो ज़बरदस्ती यहाँ रहूँगा)। भोलानाथ को वह पूरी रात ज़मीन पर सिकुड़ कर काटनी पड़ी और गप्पू खुर्राटे मारता रहा।
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