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भाग 19: महारानी तारा की चेतावनी, बालि-सुग्रीव का अंतिम युद्ध और बालि वध

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 19: महारानी तारा की चेतावनी, बालि-सुग्रीव का अंतिम युद्ध और बालि वध

गले में गेंदे के समान दिखने वाले 'गजपुष्पी' पुष्पों की वह दिव्य माला धारण किए हुए सुग्रीव अगले दिन पुनः किष्किंधा के मुख्य द्वार पर जा पहुँचा। कल की पराजय का भय अब उसके मन से पूरी तरह निकल चुका था, क्योंकि आज स्वयं त्रिलोकीनाथ श्रीराम उसके पीछे एक विशाल वृक्ष की ओट में अपना अजेय धनुष ताने खड़े थे। सुग्रीव ने अपने सीने में हवा भरी और बादलों की भयंकर गर्जना को भी मात देने वाला ऐसा सिंहनाद किया, जिससे किष्किंधा के महल की दीवारें कांप उठीं।

महल के भीतर अपने शयनकक्ष में विश्राम कर रहा बालि इस ललकार को सुनकर आगबबूला हो उठा। कल ही जिस कायर को उसने अधमरा करके भगाया था, वह आज फिर मौत के मुँह में आ गया? बालि ने फुर्ती से अपना गदा उठाया और दांत पीसता हुआ बाहर जाने के लिए मुड़ा।

परंतु तभी उसकी अर्धांगिनी, किष्किंधा की महारानी 'तारा' ने दौड़कर बालि का हाथ पकड़ लिया। तारा अत्यंत बुद्धिमती, दूरदर्शी और राजनीति में निपुण स्त्री थी। उसने घबराहट और चिंता से कांपते स्वर में कहा, "हे स्वामी! रुक जाइए! आज आपका इस प्रकार क्रोध में बाहर जाना उचित नहीं है। मेरी बात ध्यान से सुनिए।"

बालि ने झिड़कते हुए कहा, "मुझे मत रोको तारा! उस नीच सुग्रीव का साहस तो देखो, वह फिर मुझे ललकार रहा है। आज मैं उसके प्राण ही ले लूँगा।"

तारा ने बालि के चरणों में गिरकर कहा, "हे नाथ! क्रोध में आपका विवेक नष्ट हो गया है। तर्क से सोचिए। कल जो सुग्रीव मार खाकर अपनी जान बचाकर भागा था, वह आज अचानक इतनी निडरता से कैसे लौट आया? कोई भी दुर्बल व्यक्ति बिना किसी अत्यंत शक्तिशाली सहारे के अपने से बलवान शत्रु को ललकारने नहीं आता। मुझे हमारे गुप्तचरों से सूचना मिली है कि अयोध्या नरेश दशरथ के दो अत्यंत प्रतापी पुत्र—राम और लक्ष्मण—ऋष्यमूक पर्वत पर आए हुए हैं। उन्होंने सुग्रीव से अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता कर ली है। राम का बल और पराक्रम तीनों लोकों में अद्वितीय है। मेरा हृदय कह रहा है कि सुग्रीव राम के भरोसे ही यहाँ आया है। आप राम से शत्रुता मोल न लें, सुग्रीव को क्षमा कर दें और उसे किष्किंधा का युवराज बना लें।"

अपनी पत्नी की यह तार्किक और सत्य चेतावनी सुनकर भी बालि का अहंकार नहीं टूटा। उसके विनाश का समय निकट आ गया था। बालि ने हंसते हुए कहा, "अरी! तू व्यर्थ ही चिंता कर रही है। राम तो रघुकुल के मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे धर्म के मार्ग पर चलते हैं, वे बिना कारण मुझ पर प्रहार क्यों करेंगे? और यदि मान भी लूँ कि राम सुग्रीव की सहायता करेंगे, तब भी मैं बालि हूँ! जिसके पसीने से भी देवराज इंद्र घबराते हैं। तू निश्चिंत रह, मैं उस सुग्रीव को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि वह जीवन भर याद रखेगा।"

तारा को रोता हुआ छोड़कर अहंकार में अंधा बालि महल से बाहर निकल आया। द्वार पर पहुँचते ही बालि एक भयंकर बाघ की तरह सुग्रीव पर टूट पड़ा।

दोनों भाइयों में एक बार फिर रोंगटे खड़े कर देने वाला मल्ल-युद्ध आरंभ हो गया। दोनों एक-दूसरे पर वज्र के समान मुक्के बरसाने लगे। उनके प्रहारों की ध्वनि से ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश में बिजलियां टकरा रही हों। धरती उनके पैरों के नीचे धंसने लगी और आस-पास के विशाल वृक्ष जड़ से उखड़कर गिरने लगे।

गले में गजपुष्पी की माला पहने सुग्रीव अपनी पूरी शक्ति से लड़ रहा था, परंतु बालि का बल सचमुच असीम था। कुछ ही देर में बालि सुग्रीव पर हावी होने लगा। बालि के घूसों से सुग्रीव के मुख से रक्त बहने लगा और उसकी पसलियां चटकने लगीं। सुग्रीव की दृष्टि बार-बार उसी वृक्ष की ओर जाती जहाँ श्रीराम छिपे थे। उसकी आंखों में निराशा और पुकार थी— "हे राम! अब बाण चलाइए, अन्यथा मैं मारा जाऊँगा।"

वृक्ष की ओट में खड़े श्रीराम ने देखा कि उनका मित्र सुग्रीव अब अपने प्राण गँवाने के कगार पर है। गजपुष्पी की माला के कारण श्रीराम अब बालि और सुग्रीव में स्पष्ट अंतर कर पा रहे थे। श्रीराम ने अपने होठों को भींचा, अपने दिव्य धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचा और एक अत्यंत भयंकर, काल के समान तीक्ष्ण बाण का संधान किया।

श्रीराम ने वह बाण छोड़ दिया। बाण धनुष से निकलते ही बिजली की गति से आसमान चीरता हुआ गया और सीधे बालि की चौड़ी छाती में गहराई तक धंस गया।

बाण लगते ही बालि की गर्जना एक दर्दनाक चीत्कार में बदल गई। वह विशालकाय योद्धा, जिसने बड़े-बड़े राक्षसों को धूल चटाई थी, किसी कटे हुए पहाड़ की भांति भयंकर आवाज़ के साथ धरती पर गिर पड़ा। बालि के गिरते ही युद्ध भूमि में सन्नाटा छा गया। सुग्रीव हांफता हुआ पीछे हट गया।

बालि के प्राण कंठ तक आ गए थे, परंतु देवराज इंद्र द्वारा दी गई एक स्वर्ण माला उसके गले में थी, जिसके प्रभाव से उसके प्राण तुरंत नहीं निकले। वह रक्त से लथपथ धरती पर तड़प रहा था।

तभी श्रीराम अपने हाथों में धनुष धारण किए, लक्ष्मण के साथ उस वृक्ष की ओट से बाहर आए और धीमे कदमों से बालि के पास पहुँचे।

राम को अपने सामने खड़ा देखकर बालि की आंखों में क्रोध और पीड़ा दोनों छलक उठे। मृत्यु शय्या पर पड़े बालि ने अत्यंत कटु और तीखे वचनों में श्रीराम से प्रश्न किया:

"हे राम! लोग आपको धर्म की मूर्ति कहते हैं, परंतु आपने मेरे साथ यह कौन सा धर्म निभाया? मैं तो अपने भाई से लड़ रहा था, मेरी आपसे कोई शत्रुता नहीं थी। फिर आपने एक कायर की भांति वृक्ष के पीछे छिपकर मुझ पर बाण क्यों चलाया? यदि आपको अपनी पत्नी सीता ही चाहिए थी, तो मुझसे कहते। मैं रावण को उसकी पूरी लंका सहित उखाड़कर आपके चरणों में डाल देता और उस दुष्ट को अपनी कांख (बगल) में दबाकर आपके पास ले आता। एक वानर के लिए आपने अपने क्षत्रिय धर्म को कलंकित कर दिया!"

बालि के इन कठोर प्रश्नों को सुनकर श्रीराम विचलित नहीं हुए। उनका मुख शांत और गंभीर था। उन्होंने अपने धर्म और न्याय का स्पष्टीकरण देते हुए बालि से कहा:

"हे बालि! तू धर्म की बात करता है, जबकि तूने स्वयं सबसे बड़े धर्म का नाश किया है। ध्यान से सुन। छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्री और पुत्रवधू—ये चारों समान होती हैं। जो भी मनुष्य इन पर कुदृष्टि डालता है, उसका वध करना ही सबसे बड़ा धर्म है। तूने अपने ही छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी 'रूमा' का बलपूर्वक अपहरण किया और सुग्रीव को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया। तेरे इस घोर पाप का एकमात्र दंड मृत्यु ही था।"

श्रीराम ने आगे कहा, "रही बात छिपकर बाण चलाने की, तो सुन बालि। मैं इस पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट भरत का प्रतिनिधि हूँ, और अपराधियों को दंड देना मेरा राजधर्म है। हम क्षत्रिय जब वन में किसी हिंसक या मर्यादा तोड़ने वाले पशु का शिकार करते हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि हम उसके सामने आकर उसे ललकारें। एक पापी का अंत करना ही लक्ष्य होता है। तूने अपने भाई की स्त्री को हर कर पशुओं से भी नीच कर्म किया है, इसलिए मैंने तुझे एक व्याध (शिकारी) की भांति छिपकर मारा। इसमें रत्ती भर भी अधर्म नहीं है।"

श्रीराम के इन तार्किक, धर्मसम्मत और सत्य वचनों को सुनकर बालि की आंखों से अज्ञान का पर्दा हट गया। उसका सारा अहंकार टूट कर बह गया। उसे अपने महापाप का बोध हो गया। उसने समझ लिया कि जो राम के हाथों मारा गया, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात परब्रह्म है।

बालि ने हाथ जोड़ लिए और रोते हुए कहा, "हे प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैं अज्ञानी था। आज आपके हाथों मृत्यु पाकर मेरा जन्म सफल हो गया। सुग्रीव वास्तव में भाग्यशाली है जिसे आप जैसा मित्र मिला। मेरी केवल एक ही प्रार्थना है—मेरा पुत्र 'अंगद' अत्यंत वीर और बुद्धिमान है। उसे मेरी ही भांति अपना दास मानकर अपनी शरण में ले लीजिए और उसकी रक्षा कीजिए।"

श्रीराम ने अत्यंत कोमलता से बालि के मस्तक पर हाथ रखा और उसे अभय दान दिया। श्रीराम का पवित्र स्पर्श पाते ही, उस महाबली वानर बालि के प्राण उसके शरीर से मुक्त हो गए और वह परम गति को प्राप्त हुआ। किष्किंधा के इतिहास का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो चुका था, और अब सीता माता की खोज का वास्तविक मार्ग प्रशस्त होने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

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