भाग 18: श्रीराम की शक्ति का प्रमाण (सप्त-साल भेदन) और सुग्रीव-बालि का प्रथम युद्ध

ऋष्यमूक पर्वत पर श्रीराम की कठोर प्रतिज्ञा सुनकर सुग्रीव के हृदय में आशा तो जगी, परंतु बालि का बल इतना असीम और भयंकर था कि सुग्रीव के मन के किसी कोने में अब भी एक गहरा संशय (संदेह) छिपा हुआ था। सुग्रीव यह सोचकर कांप जाता था कि यदि श्रीराम का बाण बालि को एक ही बार में न मार सका, तो बालि पलटकर उन दोनों का सर्वनाश कर देगा।
अपने इसी संशय को दूर करने के लिए सुग्रीव ने श्रीराम से अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा, "हे मित्र राम! मुझे आपके बल पर पूर्ण विश्वास है, परंतु बालि का पराक्रम भी साधारण नहीं है। एक बार 'दुंदुभि' नाम का एक अत्यंत विशालकाय और पर्वताकार भैंसे के रूप वाला राक्षस किष्किंधा आया था। बालि ने उसके सींग पकड़कर उसे धरती पर ऐसा पटका कि उसके प्राण निकल गए। बालि ने उस विशाल दुंदुभि के शव को हवा में उछालकर मीलों दूर फेंक दिया था। देखिए प्रभु, वह सामने उसी दुंदुभि राक्षस का विशाल अस्थिपंजर (कंकाल) पड़ा है, जो आज भी एक छोटे पहाड़ जैसा दिखता है।"
श्रीराम सुग्रीव के मन का संशय समझ गए। उनके मुख पर एक शांत और आत्मविश्वास भरी मुस्कान उभर आई। उन्होंने बिना कोई शस्त्र उठाए, केवल अपने पैर के अंगूठे से उस पर्वताकार कंकाल को ठोकर मारी। वह विशाल कंकाल सूखे पत्ते की तरह हवा में उड़ता हुआ दस योजन (लगभग 120 मील) दूर जाकर गिरा।
यह देखकर सुग्रीव चकित तो हुआ, लेकिन उसका संशय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उसने तर्क दिया, "हे प्रभु! जब बालि ने इसे फेंका था, तब यह मांस और मज्जा से भरा हुआ अत्यंत भारी शव था। अब तो यह सूखकर कंकाल बन गया है, इसलिए यह हल्का हो गया है। बालि के बल का एक और प्रमाण यह है कि वह सामने खड़े उन सात विशाल 'साल' (साखू) के वृक्षों में से किसी एक को पकड़कर जब हिलाता है, तो उसके सारे पत्ते झड़ जाते हैं। यदि आप अपने एक बाण से इनमें से एक वृक्ष को भी बींध (छेद) दें, तो मुझे पूर्ण विश्वास हो जाएगा।"
सुग्रीव ने जिन सात साल के वृक्षों की ओर संकेत किया था, वे अत्यंत विशाल और चौड़े थे, तथा एक टेढ़ी (सर्पाकार) पंक्ति में खड़े थे।
श्रीराम ने अपना दिव्य धनुष उठाया। उन्होंने किसी वृक्ष को नहीं चुना, बल्कि एक ऐसी अचूक मुद्रा में खड़े हुए और अपने बाण का संधान किया। जैसे ही श्रीराम ने प्रत्यंचा को खींचकर बाण छोड़ा, वह बाण एक भयंकर गर्जना के साथ धनुष से निकला। उस एक ही दिव्य बाण ने पहले साल के वृक्ष को बींधा, फिर दूसरे को, फिर तीसरे को—और पलक झपकते ही उस एक बाण ने सातों के सातों विशाल साल वृक्षों के तनों में एक सीध में छेद कर दिया!
बाण की गति यहीं नहीं रुकी। वह बाण धरती को चीरता हुआ पाताल लोक तक गया और क्षण भर बाद वापस लौटकर चुपचाप श्रीराम के तरकश में आ गया।
यह अलौकिक दृश्य देखकर सुग्रीव सन्न रह गया। उसका सारा भ्रम, सारा संशय और सारा अहंकार उसी क्षण टूट कर बिखर गया। वह कांपते हुए श्रीराम के चरणों में गिर पड़ा और बोला, "हे प्रभु! मैं मूर्ख था जो आपको एक साधारण मनुष्य समझ रहा था। आप साक्षात परमेश्वर हैं। बालि तो क्या, आप एक बाण से तीनों लोकों को भस्म कर सकते हैं। अब मुझे कोई संशय नहीं है।"
श्रीराम ने सुग्रीव को उठाया और कहा, "मित्र! अब विलंब मत करो। आज ही किष्किंधा जाओ और बालि को युद्ध के लिए ललकारो। मैं एक पेड़ की ओट (पीछे) से सब देखता रहूँगा और उचित अवसर मिलते ही अपने एक बाण से उसका अंत कर दूँगा।"
श्रीराम का आश्वासन पाकर सुग्रीव की छाती चौड़ी हो गई। वह किष्किंधा नगरी के द्वार पर पहुँचा और उसने बादलों की गर्जना के समान अत्यंत भयंकर सिंहनाद करते हुए बालि को युद्ध के लिए ललकारा।
बालि अपने महल में था। सुग्रीव की ललकार सुनकर उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गईं। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो सुग्रीव कल तक उससे डरकर छिपता फिर रहा था, आज वह किष्किंधा के द्वार पर उसे चुनौती दे रहा है। बालि एक भयंकर तूफान की तरह महल से बाहर निकला और सुग्रीव पर टूट पड़ा।
दोनों भाइयों के बीच एक अत्यंत भयंकर और प्रलयंकारी मल्ल युद्ध (कुश्ती) छिड़ गया। दोनों मुक्कों, घुटनों और पेड़ों की डालियों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।
इधर, श्रीराम अपने धनुष पर बाण चढ़ाए एक विशाल वृक्ष के पीछे खड़े थे। परंतु जैसे ही उन्होंने बाण छोड़ने के लिए दोनों की ओर देखा, वे ठिठक गए। बालि और सुग्रीव सगे भाई थे। दोनों का आकार, ऊंचाई, मुखाकृति, और यहाँ तक कि उनके शरीर का रंग भी बिल्कुल एक समान था। युद्ध की उस भयानक धूल और फुर्तीली चालों के बीच, श्रीराम के लिए यह पहचानना बिल्कुल असंभव हो गया कि बालि कौन है और सुग्रीव कौन है।
श्रीराम ने विचार किया, "यदि मेरा बाण भूल से मित्र सुग्रीव को लग गया, तो यह धर्म के विरुद्ध होगा और एक महापाप कहलाएगा।" इसी दुविधा में श्रीराम ने अपना बाण नीचे कर लिया।
उधर, सुग्रीव बालि के प्रहारों से लहूलुहान हो रहा था। वह बार-बार उस पेड़ की ओर देखता जहाँ श्रीराम छिपे थे, परंतु जब कोई बाण नहीं चला, तो सुग्रीव की हिम्मत टूट गई। बालि के घूसों से अधमरा होकर सुग्रीव किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागा और वापस ऋष्यमूक पर्वत की शरण में पहुँच गया।
सुग्रीव का शरीर चोटों से चूर-चूर था। वह श्रीराम से अत्यंत क्रोधित और दुखी होकर बोला, "प्रभु! आपने मेरे साथ यह कैसा छल किया? यदि आपको बालि को नहीं मारना था, तो मुझे वहाँ भेजा ही क्यों? आज तो मेरी जान ही निकल गई थी!"
श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से सुग्रीव के घावों पर हाथ फेरा और उसे शांत करते हुए कहा, "हे मित्र, मुझ पर क्रोध मत करो। तुम दोनों भाई रूप और रंग में इतने समान हो कि युद्ध की धूल में मैं पहचान ही नहीं सका कि मेरा मित्र कौन है और शत्रु कौन। मित्र का वध मेरे हाथों हो जाए, इस भय से मैंने बाण नहीं चलाया।"
श्रीराम ने लक्ष्मण को पास बुलाया और कहा, "लक्ष्मण! जाओ और वन से 'गजपुष्पी' (एक प्रकार का जंगली फूल) की एक सुंदर बेल ले आओ।" लक्ष्मण तुरंत वह बेल ले आए। श्रीराम ने उस गजपुष्पी की बेल को एक माला की तरह सुग्रीव के गले में पहना दिया और कहा, "मित्र! यह माला तुम्हारी पहचान होगी। अब तुम कल फिर जाओ और बालि को ललकारो। कल मैं इस माला को देखकर बालि का अचूक वध करूँगा, यह मेरा वचन है।"
अगले दिन के युद्ध की तैयारी हो चुकी थी, परंतु किष्किंधा में अगले दिन बालि की पत्नी तारा उसे एक ऐसी चेतावनी देने वाली थी, जिसे अनदेखा करना बालि के लिए मृत्यु का द्वार खोलने वाला था।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
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