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भाग 20: सुग्रीव का राज्याभिषेक, वर्षा ऋतु में श्रीराम का विरह और लक्ष्मण का भयंकर क्रोध

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 20: सुग्रीव का राज्याभिषेक, वर्षा ऋतु में श्रीराम का विरह और लक्ष्मण का भयंकर क्रोध

बालि के मोक्ष प्राप्ति के पश्चात, किष्किंधा नगरी का आकाश जो अब तक भय और आतंक से घिरा हुआ था, अचानक शांत हो गया। सुग्रीव ने अपने बड़े भाई का पूरे राजकीय और वैदिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। सभी वानर और भालू हाथ जोड़कर श्रीराम के पास आए और उनसे किष्किंधा के भीतर चलकर राजमहल में विश्राम करने का आग्रह किया।

परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया, "हे वानर श्रेष्ठों! मेरे पिता महाराज दशरथ की आज्ञा है कि मैं चौदह वर्ष तक किसी भी नगर, गांव या पक्के भवन की सीमा में प्रवेश न करूँ। मैं वनवासी हूँ और वन ही मेरा घर है। सुग्रीव मेरा मित्र है, इसलिए लक्ष्मण किष्किंधा जाकर सुग्रीव का राज्याभिषेक संपन्न करेंगे।"

श्रीराम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण, हनुमान, जाम्बवंत और अन्य मंत्री सुग्रीव को लेकर किष्किंधा गए। एक अत्यंत भव्य समारोह में सुग्रीव को किष्किंधा का राजा घोषित किया गया। श्रीराम के वचन के अनुसार, बालि के वीर और तेजस्वी पुत्र 'अंगद' को युवराज (उत्तराधिकारी) का पद सौंपा गया। सुग्रीव को अपना खोया हुआ राज्य और अपनी प्रिय पत्नी रूमा वापस मिल गई। किष्किंधा में चारों ओर उत्सव का माहौल छा गया।

इधर, श्रीराम और लक्ष्मण ने किष्किंधा के पास ही स्थित 'प्रस्रवण पर्वत' (जिसे माल्यवान पर्वत भी कहा जाता है) की एक विशाल और सुरक्षित गुफा में अपना निवास स्थान बनाया।

इसी बीच, आकाश में काले-काले बादल छाने लगे। बिजली कड़कने लगी और मूसलाधार वर्षा आरंभ हो गई। यह 'चातुर्मास' (वर्षा ऋतु के चार महीने) का आरंभ था। सनातन धर्म के नियमों के अनुसार, वर्षा ऋतु में संन्यासी और तपस्वी यात्रा नहीं करते, क्योंकि रास्ते बंद हो जाते हैं और कीचड़ तथा नदियों के उफान के कारण खोज अभियान चलाना असंभव होता है। इसलिए श्रीराम और सुग्रीव ने यह निर्णय लिया कि इन चार महीनों तक सीता की खोज रोक दी जाएगी और वर्षा ऋतु समाप्त होते ही, 'शरद ऋतु' के आगमन पर खोज आरंभ की जाएगी।

परंतु ये चार महीने श्रीराम के लिए चार युगों के समान बीते। प्रस्रवण पर्वत की उस गुफा में बैठे श्रीराम दिन-रात केवल सीता का स्मरण करते रहते। जब आकाश में बिजलियां चमकतीं, तो राम को लगता कि रावण के चंगुल में फंसी सीता भय से कांप रही होंगी। जब मोर खुशी से नाचते और कोयल कूकती, तो राम का हृदय विरह की अग्नि में जलने लगता।

श्रीराम रातों को सो नहीं पाते थे। वे लक्ष्मण से कहते, "लक्ष्मण! देखो, यह वर्षा ऋतु कितनी निर्दयी है। जिन बादलों को देखकर दुनिया खुश होती है, वे बादल मेरे हृदय को चीर रहे हैं। न जाने मेरी जानकी कहाँ होगी, किस हाल में होगी, क्या उसे भोजन मिला होगा? कहीं राक्षसों ने उसे डराया तो नहीं होगा?" लक्ष्मण पूरी रात जागकर अपने बड़े भाई को सांत्वना देते और उनके चरण दबाते।

देखते ही देखते वर्षा ऋतु के वे चार महीने बीत गए। आकाश से काले बादल छंट गए और 'शरद ऋतु' (सर्दियों की शुरुआत) का निर्मल और उज्ज्वल चांद आकाश में चमकने लगा। नदियां शांत हो गईं और रास्ते खुल गए।

अब श्रीराम को सुग्रीव की प्रतीक्षा थी। सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर वचन दिया था कि वर्षा ऋतु समाप्त होते ही वह अपनी पूरी सेना के साथ सीता की खोज में निकल पड़ेगा। परंतु दिन बीतते गए, सुग्रीव नहीं आया।

वास्तव में, सुग्रीव राजमहल की सुख-सुविधाओं, मदिरा में इतना अंधा और मदमस्त हो गया था कि वह अपना वचन, श्रीराम का उपकार और अपना धर्म सब कुछ भूल बैठा। उसने राजकाज मंत्रियों पर छोड़ दिया और स्वयं महलों के भीतर विलासिता में डूब गया।

जब शरद ऋतु का एक बड़ा भाग बीत गया और सुग्रीव की ओर से कोई संदेश नहीं आया, तो श्रीराम का धैर्य टूट गया। उनके शांत और करुणामय नेत्रों में भयंकर क्रोध की ज्वाला धधक उठी। श्रीराम ने अपने धनुष पर हाथ रखते हुए अत्यंत कठोर स्वर में लक्ष्मण से कहा:

"लक्ष्मण! सुग्रीव राज्य और सुख पाकर कृतघ्न हो गया है। वह भूल गया है कि जिस बाण से मैंने बालि का वध किया था, वह बाण अभी मेरे तरकश में ही है। सुग्रीव ने मेरे साथ विश्वासघात किया है। जाओ किष्किंधा और उस मूर्ख वानर को मेरी यह चेतावनी दे आओ— 'हे सुग्रीव! बालि जिस मार्ग से यमलोक गया है, वह मार्ग अभी बंद नहीं हुआ है। यदि तूने अपना वचन नहीं निभाया, तो मैं आज ही तुझे उसी मार्ग से बालि के पास भेज दूँगा!'"

श्रीराम के मुख से ऐसे क्रोधपूर्ण वचन सुनकर लक्ष्मण, जो स्वभाव से ही अत्यंत उग्र और क्रोधी थे, आगबबूला हो गए। उनका शरीर क्रोध से कांपने लगा। उन्होंने अपना धनुष उठाया, बाण कसे और एक विनाशकारी आंधी की तरह किष्किंधा की ओर दौड़ पड़े।

लक्ष्मण के चलने के वेग से धरती कांपने लगी और बड़े-बड़े वृक्ष उखड़ने लगे। उनके लाल नेत्रों और तने हुए धनुष को देखकर किष्किंधा के द्वार पर खड़े पहरेदार वानर अपनी जान बचाकर भागने लगे। लक्ष्मण ने एक पहाड़ की चोटी को अपने पैरों की ठोकर से चकनाचूर कर दिया। किष्किंधा के भीतर त्राहि-त्राहि मच गई। अंगद और हनुमान समझ गए कि आज लक्ष्मण पूरी किष्किंधा को भस्म कर देंगे।

लक्ष्मण राजमहल के द्वार पर पहुँचे और उन्होंने अपने धनुष की ऐसी भयंकर टंकार की कि मदमस्त सुग्रीव के हाथ से मदिरा का प्याला गिर पड़ा। सुग्रीव का नशा पल भर में उतर गया और वह भय से कांपने लगा। कोई भी वीर वानर लक्ष्मण के सामने जाने का साहस नहीं कर पा रहा था।

तब उस संकट की घड़ी में महारानी 'तारा' आगे आईं। तारा जानती थी कि लक्ष्मण के क्रोध को शस्त्रों से नहीं, बल्कि कूटनीति और मधुर वचनों से ही शांत किया जा सकता है।

तारा अपने बाल खोले हुए, अत्यंत साधारण और सौम्य रूप में, बिना किसी आभूषण के लक्ष्मण के सामने गईं। एक स्त्री को इस दशा में देखकर लक्ष्मण ने अपनी मर्यादा का पालन करते हुए अपनी दृष्टि तुरंत नीचे कर ली और उनका क्रोध कुछ धीमा पड़ गया।

तारा ने हाथ जोड़कर अत्यंत मधुर और संयमित स्वर में कहा, "हे वीर लक्ष्मण! आप शेषनाग के अवतार हैं, आपका क्रोध अनुचित नहीं है। सुग्रीव से अवश्य ही भारी भूल हुई है, परंतु वह कृतघ्न नहीं है। जो वानर वर्षों से जंगलों में दर-दर भटक रहा था, उसे अचानक जब इतना बड़ा राज्य और सुख मिला, तो वह माया के प्रभाव में भटक गया। महर्षि विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी भी अप्सराओं के मोह में भटक गए थे, फिर यह तो एक चंचल वानर है। इसे क्षमा कर दें।"

तारा ने आगे कहा, "हे लक्ष्मण! सुग्रीव ने वास्तव में कुछ दिन पहले ही हनुमान को आदेश दे दिया था कि वे चारों दिशाओं से वानरों की विशाल सेनाओं को किष्किंधा बुला लें। करोड़ों वानर आज ही यहाँ पहुँचने वाले हैं। आप अपना क्रोध शांत करें और भीतर पधारें।"

तारा के इन नीतिपूर्ण और शांत वचनों ने लक्ष्मण की क्रोधाग्नि पर जल का कार्य किया। लक्ष्मण का धनुष नीचे हो गया। तभी सुग्रीव कांपता हुआ वहाँ आया और लक्ष्मण के चरणों में गिर पड़ा। उसने रोते हुए क्षमा मांगी और तुरंत अपनी वानर सेना को एकत्र करने का आदेश दिया। अब, सीता माता की खोज का सबसे बड़ा और विश्वव्यापी अभियान आरंभ होने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

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