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बीमार की तीमारदारी (मरीज़ को डराना)

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
बीमार की तीमारदारी (मरीज़ को डराना)

शेख चिल्ली को दुनियादारी और बातचीत करने के सलीके की बिल्कुल भी समझ नहीं थी। उसे यह पता ही नहीं था कि किस मौके पर क्या बात बोलनी चाहिए।

एक बार शेख चिल्ली के पड़ोस में रहने वाले 'रहीम चाचा' बहुत सख्त बीमार पड़ गए। उन्हें बहुत तेज़ बुखार था और कमजोरी के कारण वे अपनी चारपाई से उठ भी नहीं पा रहे थे। गाँव के हकीम जी (वैद्य) ने रहीम चाचा की नब्ज़ देखी और उन्हें दवा दी।

जाते-जाते हकीम जी ने रहीम चाचा के घरवालों को एक बहुत ही सख्त हिदायत दी। हकीम जी ने कहा, "मरीज़ की हालत बहुत नाज़ुक है। दवा से ज़्यादा इन्हें हौसले की ज़रूरत है। इसलिए ध्यान रहे कि मरीज़ के पास बैठकर कोई भी उदासी या निराशा की बात न करे। इनसे हमेशा हँस-बोल कर बातें करें और इन्हें खुश रखें, ताकि ये जल्दी ठीक हो सकें।"

शेख चिल्ली को जब पता चला कि रहीम चाचा बीमार हैं, तो वह भी एक अच्छे पड़ोसी की तरह उनकी 'तीमारदारी' (हाल-चाल पूछने) के लिए उनके घर पहुँच गया।

रहीम चाचा के घरवालों ने जब शेख चिल्ली को देखा, तो वे थोड़ा घबराए, क्योंकि वे जानते थे कि शेख चिल्ली कुछ भी ऊटपटाँग बोल सकता है। उन्होंने शेख को अंदर भेजने से पहले दरवाज़े पर ही रोककर कहा, "शेख भाई! हकीम जी ने कहा है कि चाचा से सिर्फ अच्छी और खुशी की बातें करनी हैं। कोई भी ऐसी बात मत करना जिससे वे डर जाएँ या उनका दिल घबराए।"

शेख चिल्ली ने बहुत ही समझदारी दिखाते हुए अपना सिर हिलाया और कहा, "अरे तुम लोग फिक्र मत करो! मैं कोई बच्चा थोड़ी हूँ। मैं तो ऐसी मीठी बातें करूँगा कि चाचा का आधा बुखार तो मेरी बातें सुनकर ही उतर जाएगा।"

शेख चिल्ली घर के अंदर गया। रहीम चाचा चारपाई पर लेटे हुए थे। बीमारी के कारण उनका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखें अंदर धंस गई थीं और वे बहुत कमज़ोर लग रहे थे।

शेख चिल्ली जाकर उनके सिरहाने बैठ गया। उसने रहीम चाचा का हाथ अपने हाथ में लिया। रहीम चाचा ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं और धीमी आवाज़ में पूछा, "कैसे हो शेख बेटा?"

शेख चिल्ली ने सोचा कि अब उसे हकीम जी के कहे अनुसार चाचा को 'हौसला' देना चाहिए। उसने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए और एक बहुत ही 'गहरी' बात कहने की सोची।

शेख चिल्ली ने बहुत ही उत्साह और खुशी भरे लहज़े में कहा, "अरे रहीम चाचा! आप तो बिल्कुल फिक्र मत कीजिए। आप बहुत जल्दी उस दुनिया में जाने वाले हैं जहाँ कोई बीमारी नहीं होती! और हाँ, आपका चेहरा देखकर तो मुझे बिल्कुल अपने 'गफूर मियाँ' की याद आ गई!"

रहीम चाचा ने कमज़ोर आवाज़ में पूछा, "गफूर मियाँ? कौन गफूर मियाँ?"

शेख चिल्ली ने अपनी आँखों को बड़ा करते हुए और भी ज़्यादा चहक कर कहा, "अरे वही अपने गफूर मियाँ, जो पिछले हफ्ते ही गुज़र गए! मरने से ठीक एक दिन पहले गफूर मियाँ का चेहरा भी बिल्कुल आपके ही जैसा पीला पड़ गया था। उनकी आँखें भी ऐसे ही अंदर धंस गई थीं और उनकी आवाज़ भी आपकी तरह ही काँप रही थी। कसम से चाचा, आप दोनों में कोई फर्क ही नहीं लग रहा! आपकी यह हालत देखकर तो मुझे यकीन हो गया है कि आप बिल्कुल गफूर मियाँ के रास्ते पर ही चल रहे हैं!"

यह सुनते ही रहीम चाचा के चेहरे का बचा-खुचा रंग भी उड़ गया। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। जिस मरीज़ को हौसला देना था, उसे शेख चिल्ली ने जीते-जी मौत का खौफ दिखा दिया। रहीम चाचा घबराहट के मारे बेसुध होकर चारपाई पर गिर पड़े।

रहीम चाचा के घरवालों ने जब यह भयानक बात सुनी, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने शेख चिल्ली को गर्दन से पकड़ा और घर से बाहर धक्के मारते हुए निकाला।

"अरे बेवकूफ़! हमने तुझे हौसला देने को कहा था, और तूने तो जीते-जी इंसान को मार ही डाला!" घरवालों ने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई।

शेख चिल्ली घर से बाहर आकर अपना सिर खुजाते हुए बड़बड़ाया, "अजीब लोग हैं! मैं तो बस यह बता रहा था कि वे गफूर मियाँ जैसे लग रहे हैं, इसमें गुस्सा करने वाली क्या बात थी?" अपनी बेवकूफी का बिना कोई अहसास किए शेख चिल्ली वहाँ से खिसक लिया।

🎉 कहानी समाप्त

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