शेख चिल्ली की चिट्ठी

पुराने ज़माने की बात है, जब गाँव में किसी की चिट्ठी आती थी, तो वह पूरे गाँव के लिए एक बहुत बड़ी खबर हुआ करती थी। शेख चिल्ली बिल्कुल अनपढ़ था। उसे 'काला अक्षर भैंस बराबर' लगता था। उसने ज़िंदगी में कभी किसी किताब या कागज़ को हाथ नहीं लगाया था।
एक दिन दोपहर के समय, गाँव का डाकिया शेख चिल्ली के घर आया। डाकिए ने उसे एक सफेद लिफाफा पकड़ाते हुए कहा, "शेख भाई! शहर से तुम्हारे किसी दूर के रिश्तेदार की चिट्ठी आई है। यह लो।"
शेख चिल्ली ने चिट्ठी हाथ में ली। वह बहुत घबरा गया। उन दिनों जब किसी दूर के रिश्तेदार की चिट्ठी अचानक आती थी, तो गाँव के लोग अक्सर यही सोचते थे कि शायद किसी की बीमारी या मौत की कोई 'बुरी खबर' आई है।
शेख चिल्ली ने चिट्ठी को उलट-पुलट कर देखा। उसे पढ़ना तो आता नहीं था। उसने सोचा, "ज़रूर इसमें कोई बहुत ही बुरी खबर है। मुझे तुरंत किसी पढ़े-लिखे आदमी के पास जाकर इसे पढ़वाना चाहिए।"
शेख चिल्ली चिट्ठी लेकर घर से निकला और गाँव के बाज़ार की तरफ चल दिया। वह किसी ऐसे आदमी को ढूँढ रहा था जो चिट्ठी पढ़ सके।
बाज़ार के एक कोने में, एक हलवाई की दुकान थी। उस दुकान के बाहर एक आदमी ज़मीन पर बैठा हुआ था। वह आदमी अपने दोनों हाथों से अपनी आँखें मल रहा था और उसकी आँखों से 'झर-झर आँसू' बह रहे थे। वह आदमी बहुत ही तकलीफ में रो रहा था और सिसकियाँ ले रहा था।
शेख चिल्ली ने जब उस रोते हुए आदमी को देखा, तो उसके भोले दिमाग ने तुरंत एक बहुत ही बेतुका निष्कर्ष निकाल लिया।
शेख चिल्ली ने सोचा: "अरे बाप रे! यह आदमी तो बहुत ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है। ज़रूर इसे दूर से ही मेरी इस चिट्ठी के अंदर लिखी हुई 'बुरी खबर' के बारे में पता चल गया है। इसका मतलब है कि मेरे उस रिश्तेदार की मौत हो चुकी है, इसीलिए यह आदमी मेरी चिट्ठी देखकर इतना फूट-फूट कर रो रहा है!"
बस फिर क्या था! शेख चिल्ली ने न तो उस आदमी से कुछ पूछा और न ही अपनी चिट्ठी किसी को दिखाई। उसने तुरंत ज़ोर-ज़ोर से अपना सीना पीटना शुरू कर दिया और वहीं बाज़ार के बीचों-बीच खड़े होकर दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा।
"हाय रे! मैं लुट गया! मैं बर्बाद हो गया! हाय मेरे रिश्तेदार, तू मुझे छोड़कर क्यों चला गया!" शेख चिल्ली इतनी ज़ोर से विलाप कर रहा था कि पूरा बाज़ार इकट्ठा हो गया।
गाँव के लोग दौड़े-दौड़े आए। उन्होंने देखा कि शेख चिल्ली के हाथ में एक चिट्ठी है और वह किसी के मरने का मातम मना रहा है।
गाँव के सरपंच ने आगे बढ़कर शेख चिल्ली के कंधे पर हाथ रखा और सांत्वना देते हुए पूछा, "शांत हो जा शेख! क्या हो गया? इस चिट्ठी में किसकी मौत की खबर आई है?"
शेख चिल्ली ने रोते हुए और सुबकते हुए उस ज़मीन पर बैठे 'रोते हुए आदमी' की तरफ इशारा किया और कहा, "सरपंच जी! मुझे तो पढ़ना नहीं आता। आप इस रोते हुए आदमी से पूछिए। इसी ने मेरी चिट्ठी दूर से पढ़ ली है और यह उसी बुरी खबर को पढ़कर इतनी ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है!"
सरपंच और गाँव वाले हैरान रह गए। सरपंच उस रोते हुए आदमी के पास गया और पूछा, "अरे भाई! तुम कौन हो? और तुमने इस शेख चिल्ली की चिट्ठी में ऐसा क्या पढ़ लिया जो तुम इतने आँसू बहा रहे हो?"
वह आदमी, जो अपनी आँखें मल रहा था, उसने बहुत ही मुश्किल से अपनी लाल और सूजी हुई आँखें खोलीं। वह आदमी असल में गाँव का 'मिर्ची पीसने वाला' मज़दूर था।
उस आदमी ने रोते-रोते और अपनी आँखें मलते हुए गुस्से में जवाब दिया, "अरे सरपंच जी! मैं कोई पढ़ा-लिखा इंसान नहीं हूँ, और मुझे क्या पता इस पागल की चिट्ठी में क्या लिखा है! मैं तो हलवाई की दुकान के पीछे 'लाल मिर्ची' पीसने का काम कर रहा था। अचानक हवा का झोंका आया और मिर्ची का सारा पाउडर मेरी आँखों में घुस गया! मेरी आँखों में इतनी भयंकर जलन हो रही है कि मेरे आँसू नहीं रुक रहे हैं, और यह बेवकूफ़ मेरे पास आकर खुद भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा!"
यह सुनते ही पूरे बाज़ार में एकदम सन्नाटा छा गया। और फिर अगले ही पल, पूरी भीड़ ठहाके मारकर हँसने लगी।
सरपंच ने हँसते-हँसते शेख चिल्ली के हाथ से वह चिट्ठी ली और उसे खोला।
सरपंच ने चिट्ठी पढ़कर कहा, "अरे शेख! इसमें किसी की मौत की खबर नहीं है। तेरे रिश्तेदार ने शहर से यह पैगाम भेजा है कि अगले महीने उसकी बेटी की शादी है और उसने तुझे न्यौता दिया है!"
शेख चिल्ली का रोना एकदम बंद हो गया। उसने अपने आँसू पोंछे, मिर्ची पीसने वाले मज़दूर को झेंपते हुए देखा और अपनी बेवकूफी पर शर्मिंदा होकर चुपचाप वहाँ से खिसक लिया। पूरा गाँव उस दिन शेख चिल्ली की 'मिर्ची वाली चिट्ठी' के मातम पर हँसता रहा।
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