शेख चिल्ली और पहलवान की चुनौती

शेख चिल्ली शरीर से तो बहुत दुबला-पतला था, लेकिन बातों में वह खुद को दुनिया का सबसे बड़ा शूरवीर और रुस्तम समझता था।
एक बार गाँव में एक बहुत बड़ा 'दंगल' (कुश्ती का मेला) लगा। दूर-दूर के गाँवों से बड़े-बड़े पहलवान वहाँ अपनी ताक़त का जलवा दिखाने आए हुए थे। दंगल के बीचों-बीच शहर का एक बहुत ही खूँखार और विशालकाय पहलवान खड़ा था। उसका नाम था 'शेरा'।
शेरा का शरीर किसी पहाड़ जैसा था। उसकी गर्दन एक साँड जैसी मोटी थी और उसके डोलों में लोहे जैसी ताक़त नज़र आती थी। शेरा ने अखाड़े में खड़े होकर आस-पास के सभी गाँवों को चुनौती दी।
"है कोई माई का लाल जो मेरे सामने अखाड़े में दो मिनट भी टिक सके? मैं चाहूँ तो एक हाथ से हाथी को भी ज़मीन पर पटक दूँ!" शेरा ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ रहा था।
पूरे गाँव के अच्छे-अच्छे पहलवानों की हिम्मत टूट गई। कोई भी शेरा के सामने जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
शेख चिल्ली भी भीड़ में खड़ा यह सब देख रहा था। उसके आस-पास गाँव के कुछ लोग खड़े थे। शेख चिल्ली को लगा कि यह अपनी शान बघारने का सबसे अच्छा मौका है। उसने अपनी मूँछों (जो थीं ही नहीं) पर ताव देते हुए अपने दोस्तों से कहा:
"अरे, यह शेरा क्या चीज़ है! मैं तो बस उस पर तरस खाकर चुप खड़ा हूँ। अगर मैं अखाड़े में उतर गया, तो इसकी हड्डियाँ चूर-चूर कर दूँगा।"
दोस्तों ने मज़ाक में कहा, "अरे शेख! तो फिर जा ना अखाड़े में। बातों से क्या होता है, ताक़त है तो जाकर दिखा!"
शेख चिल्ली ने जोश में आकर अपनी धोती कसी और भीड़ को चीरता हुआ सीधे अखाड़े के बीचों-बीच पहुँच गया।
इतने दुबले-पतले, सींक-सलाई जैसे आदमी को अखाड़े में उतरता देख पूरा गाँव हैरान रह गया। शेरा पहलवान ने जब शेख चिल्ली को देखा, तो वह ज़ोर से ठहाका लगाकर हँसने लगा।
शेरा ने अपने बड़े-बड़े दाँत निकालते हुए कहा, "अरे ओ चींटी! तू मुझसे लड़ेगा? मेरी एक फूँक से तू उड़कर सीधा अपने घर की छत पर गिरेगा। जा, घर जाकर दूध पी।"
शेख चिल्ली ने अखाड़े में तो कदम रख दिया था, लेकिन शेरा को इतने करीब से देखकर उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई थी। शेरा का एक पैर शेख चिल्ली की कमर से भी ज़्यादा मोटा था। शेख के घुटने काँपने लगे थे और पसीने छूट रहे थे।
लेकिन अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए शेख चिल्ली ने बहुत ही 'शातिर' दिमाग लगाया। उसने सीना तानकर शेरा की तरफ देखा और कहा, "अरे ओ मोटे पहलवान! तू क्या समझता है, असली ताक़त सिर्फ इन सूजे हुए डोलों और मोटे शरीर में होती है? मेरी ताक़त शरीर में नहीं, मेरे अंदर है!"
शेरा ने हैरानी से पूछा, "कैसी ताक़त?"
शेख चिल्ली ने अपना सीना फुलाते हुए कहा, "मेरे अंदर 'हवा की ताक़त' है! मैं अगर अपने मुँह से पूरी ताक़त से 'फूँक' मारूँगा ना, तो तेरे जैसा भारी-भरकम पहलवान भी सूखे पत्ते की तरह उड़कर उस सामने वाले पेड़ पर जाकर अटकेगा। लेकिन मैं ऐसा नहीं करूँगा।"
शेरा ने गुस्साते हुए कहा, "क्यों नहीं करेगा? मार फूँक! मैं भी तो देखूँ तेरी ताक़त।"
शेख चिल्ली ने बहुत ही गंभीरता से अपना हाथ हिलाते हुए कहा, "नहीं! मेरे उसूल मुझे इसकी इजाज़त नहीं देते। अगर मैंने फूँक मारी और तू हवा में उड़कर नीचे गिरा, तो तेरी गर्दन टूट जाएगी और तू मर जाएगा। मैं एक निहत्थे और कमज़ोर पहलवान की जान नहीं ले सकता। जा, मैंने तुझे जीवनदान दिया!"
यह कहकर, इससे पहले कि शेरा पहलवान को गुस्सा आता या वह शेख को पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाता, शेख चिल्ली ने तुरंत पीछे मुड़कर ऐसी फुरती से दौड़ लगाई कि देखने वालों की नज़र ही नहीं ठहर पाई।
वह अखाड़े से बाहर भागा और भीड़ को चीरता हुआ सीधे अपने घर में जाकर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
पूरा अखाड़ा और शेरा पहलवान शेख चिल्ली की इस बेतुकी बहानेबाज़ी और फर्राटेदार दौड़ को देखकर पेट पकड़कर हँसने लगा। गाँव वाले समझ गए कि शेख चिल्ली ने सिर्फ अपनी 'फूँक' की बात बनाकर बड़ी ही चालाकी से अपनी जान बचा ली!
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