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"भैंस के आगे बीन बजाना"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"भैंस के आगे बीन बजाना"

'ज्ञानपुर' गाँव में एक बहुत ही पढ़े-लिखे और विद्वान पंडित जी रहते थे, जिनका नाम था 'पंडित विद्यासागर'। पंडित जी को वेदों, शास्त्रों और जीवन के मूल्यों का बहुत गहरा ज्ञान था।

उसी गाँव में 'कल्लू' नाम का एक बहुत ही मूर्ख और शराबी आदमी रहता था। कल्लू दिन भर ताड़ी (Desi Liquor) पीकर नालियों के पास पड़ा रहता था। उसे दुनिया-जहान की कोई समझ नहीं थी और न ही वह कोई काम करता था। उसका परिवार उसकी इस लत से बहुत परेशान था।

एक दिन पंडित विद्यासागर को कल्लू पर बहुत दया आई। पंडित जी ने सोचा: "मैं इतना बड़ा विद्वान हूँ। अगर मैं इस मूर्ख कल्लू को सही रास्ते पर ले आऊँ और इसे थोड़ा ज्ञान दे दूँ, तो इसका जीवन सुधर जाएगा।"

ज्ञान की गंगा: पंडित जी ने कल्लू को पकड़कर अपने आश्रम में बैठाया। कल्लू नशे में थोड़ा झूम रहा था और उसकी आँखें आधी बंद थीं।

पंडित जी ने बहुत ही गहरी और मीठी आवाज़ में उसे 'जीवन का ज्ञान' देना शुरू किया। वे बोले: "देख कल्लू! यह जीवन बहुत अनमोल है। शराब पीने से इंसान का शरीर और बुद्धि दोनों नष्ट हो जाते हैं। तुझे कर्म करना चाहिए। गीता में लिखा है कि कर्म ही पूजा है। इंसान को समाज में इज़्ज़त कमानी चाहिए और अच्छे काम करके पुण्य कमाना चाहिए..."

पंडित जी लगातार 'दो घंटे' तक पसीने से तर-बतर होकर कल्लू को उपदेश देते रहे। वे बहुत ही सुंदर-सुंदर श्लोक और कहानियाँ सुना रहे थे।

कल्लू उनके सामने चुपचाप बैठा था। वह बीच-बीच में अपना सिर हिलाता था, जैसे उसे सब कुछ बहुत अच्छी तरह समझ आ रहा हो। पंडित जी बहुत खुश हुए कि उनकी मेहनत रंग ला रही है और कल्लू सुधर रहा है।

मूर्खता की चरम सीमा: दो घंटे का लंबा और शानदार उपदेश खत्म करने के बाद, पंडित जी ने गहरी साँस ली। उन्होंने मुस्कुराते हुए कल्लू के कंधे पर हाथ रखा और पूछा: "तो कल्लू बेटा! मैंने तुम्हें जो इतना ज्ञान दिया, जीवन और कर्म के बारे में जो बातें बताईं, क्या तुम्हें वह सब समझ में आ गया?"

कल्लू ने अपनी आधी खुली आँखों से पंडित जी को देखा। उसने ज़ोर से एक 'डकार' ली, अपना सिर खुजाया और बहुत ही मासूमियत (और मूर्खता) से पूछा: "हाँ पंडित जी! आपकी बातें तो बहुत मीठी थीं... लेकिन बस एक बात बता दीजिए कि यह जो आपने 'ज्ञान और पुण्य' की बात की, इसे बाज़ार में बेचने पर 'कितनी बोतल शराब' मिल जाएगी?"

यह सुनते ही पंडित विद्यासागर का सिर चकरा गया। उन्होंने अपना माथा पीट लिया। उन्हें समझ आ गया कि उनकी दो घंटे की मेहनत बिल्कुल पानी में मिल गई है। इस मूर्ख शराबी के दिमाग में ज्ञान की एक बूँद भी नहीं गई।

तभी पंडित जी का एक शिष्य हँसते हुए वहाँ आया और बोला: "गुरु जी! आप भी किस इंसान को शास्त्र पढ़ा रहे थे? जैसे एक काली भैंस के सामने खड़े होकर कितनी भी सुरीली 'बीन' बजा लो, भैंस नाचेगी नहीं, वह बस अपना चारा चबाती रहेगी। वैसे ही इस मूर्ख शराबी को ज्ञान देना बिल्कुल अपना समय बर्बाद करना है। आप तो सचमुच 'भैंस के आगे बीन बजा' रहे थे!"

पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने उस दिन के बाद से कभी किसी मूर्ख को ज़बरदस्ती ज्ञान देने की कोशिश नहीं की।

🎉 कहानी समाप्त

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