"मुँह में राम बगल में छुरी"

'धर्मपुर' नाम का एक बहुत ही सीधा-सादा और शांतिप्रिय गाँव था। गाँव वाले पूजा-पाठ में बहुत विश्वास रखते थे।
एक दिन गाँव में एक 'साधु बाबा' पधारे। उनका नाम था 'बाबा ढोंगीदास'। बाबा जी का भेष बहुत ही शानदार था— उन्होंने चमचमाते भगवा कपड़े पहने थे, गले में रुद्राक्ष की बड़ी-बड़ी मालाएँ थीं, माथे पर लंबा तिलक था और उनके हाथ में हमेशा एक माला रहती थी, जिसे वे फेरते हुए लगातार "राम-राम, सीता-राम" का जाप करते रहते थे।
बाबा ढोंगीदास ने गाँव के बाहर बरगद के पेड़ के नीचे अपना डेरा जमाया। वे बहुत ही 'मीठी आवाज़' में बातें करते थे।
मीठी बातों का जाल: बाबा ने गाँव वालों को प्रवचन देना शुरू किया: "बच्चो! यह दुनिया मोह-माया है। लालच बुरी बला है। इंसान को अपना सारा धन-धान्य गरीबों और साधु-संतों की सेवा में लगा देना चाहिए। मैं तो एक तपस्वी हूँ, मुझे धन-दौलत से कोई लगाव नहीं है।"
गाँव वाले बाबा की इन मीठी और धार्मिक बातों से इतने प्रभावित हुए कि वे उन्हें 'पहुँचा हुआ संत' मान बैठे। गाँव की औरतें रोज़ बाबा के लिए बढ़िया पकवान, फल और दूध लातीं। गाँव के सेठ और ज़मींदार बाबा के चरणों में 'चाँदी के सिक्के और रेशमी कपड़े' चढ़ाते।
बाबा हर किसी के सिर पर हाथ फेरते और "कल्याण हो" कहते, लेकिन उनके मन में बहुत ही भयानक कपट भरा हुआ था। असल में, बाबा ढोंगीदास कोई साधु नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े 'डाकुओं के गिरोह का सरदार' था।
असलियत का पर्दाफाश: बाबा ने गाँव में कुछ दिन रहकर यह अच्छी तरह देख लिया था कि किस सेठ के घर में कितना सोना रखा है और गाँव का अनाज गोदाम कहाँ है।
अमावस की काली रात थी। पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था। बाबा ढोंगीदास ने अपने भगवा कपड़े उतारे और काले कपड़े पहन लिए। उसने अपने साथियों (डाकुओं) को जंगल से बुला लिया। बाबा के हाथ में अब माला नहीं, बल्कि एक बहुत ही तेज़ धार वाली 'छुरी' और चाबियों का गुच्छा था।
बाबा और उसके डाकू साथी चुपके से गाँव के सबसे बड़े सेठ की हवेली में घुसे। वे तिजोरी तोड़ने ही वाले थे कि तभी गाँव के 'चौकीदार' की नज़र उन पर पड़ गई। चौकीदार ने तुरंत ज़ोर-ज़ोर से सीटी बजा दी और चिल्लाने लगा: "जागते रहो! चोर आए हैं!"
आवाज़ सुनकर पूरा गाँव डंडे और मशालें लेकर जाग गया। गाँव वालों ने चारों तरफ से हवेली को घेर लिया।
जब गाँव वालों ने मशाल की रोशनी में डाकुओं के सरदार का चेहरा देखा, तो उनके होश उड़ गए! वह कोई और नहीं, बल्कि दिन भर "राम-राम" जपने वाला वही 'बाबा ढोंगीदास' था, और उसके हाथ में एक बड़ी सी 'छुरी' चमक रही थी।
गाँव के सरपंच ने गुस्से में बाबा को पकड़ लिया और गाँव वालों से कहा: "अरे भाइयो! इसे देखो, यही है वह पाखंडी जिसे हम भगवान मान रहे थे। दिन के उजाले में इसके होंठों पर भगवान का नाम होता था और रात के अँधेरे में इसके हाथों में हथियार। ऐसे ही कपटी और धोखेबाज़ लोगों के लिए हमारे बुजुर्गों ने कहा है— 'मुँह में राम, बगल में छुरी!'"
गाँव वालों ने उस पाखंडी बाबा की जमकर धुनाई की और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
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