भाग 12: दंडकारण्य प्रवेश, विराध वध, मुनि अगस्त्य से भेंट और पंचवटी निवास

चित्रकूट से प्रस्थान करने के पश्चात श्रीराम, लक्ष्मण और सीता घने और भयंकर 'दंडकारण्य' (दंडक वन) में प्रवेश कर गए। यह वन मायावी राक्षसों और हिंसक पशुओं से भरा हुआ था। वन के आरंभ में ही उन्हें महर्षि अत्रि का आश्रम मिला। महर्षि की पत्नी, परम सती माता अनुसूया ने सीता जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र तथा आभूषण भेंट किए जो कभी मैले नहीं होते थे और न ही कभी फटते या पुराने होते थे।
आश्रम से विदा लेकर वे और गहरे जंगल में गए। अचानक वहां 'विराध' नाम का एक अत्यंत विशाल और भयंकर राक्षस आ धमका। उसने झपटकर माता सीता को उठा लिया और राम-लक्ष्मण को डराने लगा। विराध को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र-शस्त्र उसे मार नहीं सकता। श्रीराम और लक्ष्मण ने तीखे बाणों से उसे घायल कर दिया, परंतु वह मरा नहीं। तब दोनों भाइयों ने उसके दोनों हाथ काट डाले और उसे एक विशाल गड्ढे में धकेल कर ऊपर से मिट्टी और पत्थर डालकर जीवित ही गाड़ दिया। मृत्यु के समय विराध को अपने पूर्व जन्म का ज्ञान हुआ; वह वास्तव में एक गंधर्व था जिसे कुबेर ने श्राप देकर राक्षस बना दिया था। श्रीराम के हाथों वह श्राप-मुक्त होकर वापस देवलोक चला गया।
विराध वध के बाद, तीनों वनवासी महर्षि शरभंग के आश्रम पहुंचे। महर्षि शरभंग केवल श्रीराम के दर्शनों की प्रतीक्षा में जीवित थे। प्रभु के दर्शन कर उन्होंने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर दिया और ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।
दंडकारण्य में आगे बढ़ते हुए श्रीराम ने एक अत्यंत हृदय विदारक दृश्य देखा। वहां मार्ग में हड्डियों के बड़े-बड़े ढेर लगे हुए थे। मुनियों से पूछने पर पता चला कि ये उन तपस्वियों की हड्डियां हैं, जिन्हें राक्षसों ने पूजा-पाठ करते समय खा लिया था। ऋषियों की यह दुर्दशा देखकर श्रीराम की आंखों में क्रोध और करुणा के आंसू आ गए। उन्होंने अपनी भुजा उठाकर एक कठोर प्रतिज्ञा की—
"निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।" (अर्थात: मैं अपने भुजबल से इस पूरी पृथ्वी को राक्षसों से विहीन कर दूंगा)।
राक्षसों के संहार का संकल्प लेकर श्रीराम महान ऋषि सुतीक्ष्ण के आश्रम से होते हुए कुंभज ऋषि (महर्षि अगस्त्य) के आश्रम पहुंचे। महर्षि अगस्त्य अत्यंत प्रतापी थे, जिन्होंने एक बार विंध्याचल पर्वत के घमंड को तोड़ दिया था और समुद्र का सारा जल पी लिया था। महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम का भव्य स्वागत किया। उन्होंने श्रीराम को भगवान विष्णु का एक दिव्य और अत्यंत शक्तिशाली धनुष, कभी खाली न होने वाले दो तरकश (बाण रखने का पात्र) और स्वर्ण जटित एक अजेय खड्ग (तलवार) प्रदान की। महर्षि ने कहा, "राम! अब से आप इन दिव्य अस्त्रों को धारण करें। यहाँ से कुछ दूरी पर गोदावरी नदी के तट पर 'पंचवटी' नाम का एक अत्यंत सुंदर स्थान है। आप अपने वनवास का शेष समय वहीं व्यतीत करें।"
महर्षि अगस्त्य की आज्ञा पाकर श्रीराम पंचवटी की ओर चल पड़े। मार्ग में एक विशाल वृक्ष पर उन्हें एक अत्यंत विशालकाय गिद्ध बैठा दिखा। लक्ष्मण ने उसे कोई राक्षस समझा, परंतु उस पक्षी ने मधुर वाणी में कहा, "राम! मैं तुम्हारे पिता दशरथ का परम मित्र 'जटायु' हूँ। जब तुम दोनों भाई कंद-मूल फल लाने या शिकार के लिए वन में जाया करोगे, तब मैं माता सीता की रक्षा करूंगा।" श्रीराम ने प्रसन्न होकर जटायु को गले लगा लिया और पिता के समान उनका सम्मान किया।
गोदावरी नदी के तट पर पहुंचकर श्रीराम को पंचवटी का वातावरण बहुत प्रिय लगा। वहां पांच विशाल वट (बरगद) के वृक्ष थे। लक्ष्मण ने वहां बांस, लकड़ी और पत्तों से एक अत्यंत सुंदर और मजबूत कुटिया का निर्माण किया। उस पर्णकुटी के आसपास सुंदर फूल और फलों के वृक्ष थे।
श्रीराम, सीता और लक्ष्मण पंचवटी में अत्यंत सुख और शांति से निवास करने लगे। वहां रहते हुए वे ऋषियों को राक्षसों के भय से मुक्त करते और धर्म की चर्चा करते थे। परंतु, पंचवटी की यह शांति एक भयंकर तूफान से पहले का सन्नाटा थी। लंका के राजा रावण की बहन, शूर्पणखा, इसी दंडकारण्य वन में रहती थी, और उसकी दृष्टि जल्द ही इस सुंदर कुटिया पर पड़ने वाली थी।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।
पढ़ें →भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण
श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।
पढ़ें →भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल
चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।
पढ़ें →भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा
महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।
पढ़ें →भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर
मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।
पढ़ें →भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई
राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।
पढ़ें →