बिना दूल्हे की बारात

शेख चिल्ली की उम्र हो चली थी और बड़ी मुश्किल से, एक दूर के गाँव में उसकी शादी तय हुई थी। शादी वाले दिन शेख चिल्ली के घर में बहुत खुशी का माहौल था।
उसे नहला-धुलाकर, एक बहुत ही चमचमाती हुई सुनहरी शेरवानी पहनाई गई। उसके सिर पर एक बहुत ही सुंदर और भारी 'सेहरा' (फूलों का मुकुट) बाँधा गया, जिससे उसका चेहरा पूरी तरह छिप गया था। कमर में तलवार और पैरों में मखमली जूतियाँ पहने, शेख चिल्ली बिल्कुल एक राजकुमार की तरह लग रहा था।
गाँव के बाहर एक बहुत ही सजी-धजी 'सफेद घोड़ी' उसका इंतज़ार कर रही थी। शेख चिल्ली को बड़ी शान से घोड़ी पर बिठाया गया। उसके आस-पास उसके दोस्त, रिश्तेदार और गाँव के लोग बाराती बनकर चल रहे थे।
बारात के सबसे आगे एक बहुत बड़ा 'बैंड-बाजा' चल रहा था। बैंड वाले ढोल, ताशे और तुरही बजाते हुए बहुत ही ज़ोरदार और जोशीली धुनें निकाल रहे थे। उस तेज़ और मज़ेदार संगीत को सुनकर किसी के भी पैर थिरकने लगें।
बैंड के ठीक पीछे गाँव के कुछ नौजवान लड़के रुमाल हिला-हिलाकर और उछल-उछल कर ज़बरदस्त नाच रहे थे।
शेख चिल्ली अपनी घोड़ी पर बैठा-बैठा यह सब देख रहा था। उसके अंदर का बचपना और चंचलता जाग उठी। उसे घोड़ी पर चुपचाप और अकड़कर बैठना बहुत उबाऊ लग रहा था। उसका भी मन कर रहा था कि वह घोड़ी से उतरे और उन नाचने वाले लड़कों के साथ मिलकर खूब धमाचौकड़ी मचाए।
शेख चिल्ली से रहा नहीं गया। जब बारात गाँव की संकरी गलियों से गुज़र रही थी और सब लोग नाचने-गाने में मगन थे, तो शेख चिल्ली ने बहुत ही चालाकी से घोड़ी की लगाम छोड़ी और चुपके से घोड़ी की पीठ से नीचे उतर गया!
उसने अपना सेहरा थोड़ा नीचे खींच लिया ताकि फूलों की लड़ियों के पीछे उसका चेहरा किसी को दिखाई न दे।
धीरे-धीरे खिसकता हुआ, शेख चिल्ली बारात के सबसे पिछले हिस्से में पहुँच गया। वहाँ जाकर वह भीड़ में शामिल हो गया और ढोल की ताल पर दोनों हाथ हवा में उठाकर ज़ोर-ज़ोर से नाचने लगा!
"बल्ले-बल्ले! शावा-शावा!" शेख चिल्ली अपनी ही बारात में एक आम बाराती की तरह पसीने से लथपथ होकर कूद-कूद कर नाच रहा था।
बारात आगे बढ़ती रही। आगे बैंड बज रहा था, लोग नाच रहे थे और बीच में 'खाली घोड़ी' चल रही थी। चूँकि घोड़ी को सज़ा रखा था और रात का समय था, इसलिए किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि घोड़ी के ऊपर तो दूल्हा है ही नहीं! सबको लगा कि दूल्हा अपने सेहरे में छुपकर शांति से बैठा है।
नाचते-गाते हुए बारात दूसरे गाँव में दुल्हन के घर पहुँच गई।
दुल्हन के घर वालों ने बारात का स्वागत करने के लिए बहुत बड़ी तैयारी कर रखी थी। दुल्हन के पिता हाथ में फूलों की माला और तिलक की थाली लेकर, बड़ी इज़्ज़त के साथ दूल्हे का स्वागत करने के लिए आगे बढ़े।
जब वे घोड़ी के पास पहुँचे और उन्होंने तिलक करने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया, तो उनके हाथ से थाली छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी।
"अरे गज़ब हो गया! घोड़ी पर तो दूल्हा है ही नहीं!" दुल्हन के पिता ने घबराकर ज़ोर से चिल्लाया।
यह सुनते ही बारातियों में हड़कंप मच गया। सबका नाचना-गाना एकदम रुक गया। बैंड वालों ने अपने बाजे बंद कर दिए। शेख चिल्ली के घरवाले बुरी तरह घबरा गए।
"हाय अल्लाह! दूल्हा कहाँ गया? क्या रास्ते में घोड़ी से गिर गया? या डर के मारे भाग गया?" सब लोग इधर-उधर दौड़कर दूल्हे को ढूँढने लगे।
पूरे पंडाल में कोहराम मच गया। तभी एक आदमी ने बारात के सबसे पीछे वाले हिस्से में इशारा करते हुए कहा, "अरे रुको! वह देखो, वह शेरवानी और सेहरा पहनकर कौन नाच रहा है?"
सब लोग दौड़कर पीछे गए। उन्होंने देखा कि शेख चिल्ली, जो कि दूल्हा था, वह अपनी भारी शेरवानी और सेहरे में पसीने से तर-बतर होकर, आँखें बंद किए अभी भी ढोल की काल्पनिक ताल पर अकेले ही नाच रहा था!
शेख चिल्ली के पिता ने गुस्से में उसका कान पकड़ा और उसे झकझोरते हुए कहा, "अरे दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़! तू यहाँ पीछे क्या कर रहा है? तू दूल्हा है या बाराती? तेरी घोड़ी वहाँ आगे खाली खड़ी है और तू यहाँ अपनी ही बारात में पीछे नाच रहा है?"
शेख चिल्ली ने अपना सेहरा हटाकर बहुत ही मासूमियत से जवाब दिया, "अरे अब्बा जान! घोड़ी पर बैठे-बैठे मेरे पैर सुन्न हो रहे थे और बैंड वाले इतना अच्छा बाजा बजा रहे थे कि मुझसे रुका नहीं गया। मैंने सोचा थोड़ा मैं भी नाच लूँ, इसमें बुराई ही क्या है?"
यह सुनकर दुल्हन के पिता और गाँव वाले पेट पकड़कर हँसने लगे। शादी के उस तनाव भरे माहौल में ठहाकों की गूँज उठ गई। लोगों ने हँसते-हँसते शेख चिल्ली को वापस घोड़ी पर बिठाया और फिर किसी तरह उस 'अनोखे दूल्हे' की शादी संपन्न हुई।
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