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शेख चिल्ली और घोड़ी का अंडा

लोक परंपरा4 मिनट का पठन
शेख चिल्ली और घोड़ी का अंडा

शेख चिल्ली को हमेशा से इस बात का बहुत शौक था कि उसके पास भी एक शानदार अरबी घोड़ा हो, जिस पर बैठकर वह पूरे गाँव में अपनी शान बघार सके। लेकिन समस्या यह थी कि घोड़े बहुत महँगे आते थे और शेख चिल्ली की जेब में हमेशा हवा ही उड़ती थी।

एक दिन शेख चिल्ली कुछ पैसे लेकर पास के शहर के एक बड़े बाज़ार में गया। वह बाज़ार में घूम-घूम कर सस्ते घोड़े तलाश रहा था।

उसी बाज़ार में एक बहुत ही चालाक और ठग किस्म का सब्ज़ी वाला बैठा था। उसकी दुकान पर बड़े-बड़े और गोल मटोल 'तरबूज' रखे हुए थे। उस सब्ज़ी वाले ने जब शेख चिल्ली को हर दुकान पर जाकर बेवकूफी भरे सवाल पूछते देखा, तो वह समझ गया कि यह कोई सिरे का मूर्ख इंसान है।

जब शेख चिल्ली सब्ज़ी वाले की दुकान के पास से गुज़रा, तो उसकी नज़र उन बड़े-बड़े हरे रंग के तरबूजों पर पड़ी। शेख ने ज़िंदगी में पहली बार इतने बड़े तरबूज देखे थे।

शेख ने हैरानी से पूछा, "अरे भाई! यह हरे रंग की गोल-गोल चीज़ें क्या हैं?"

ठग सब्ज़ी वाले ने अपनी चालाकी दिखाते हुए बहुत ही रहस्यमयी आवाज़ में कहा, "अरे भाई! चुप रहो, धीरे बोलो। ये कोई मामूली चीज़ें नहीं हैं। ये 'घोड़ी के अंडे' हैं! जो अरब देश के बहुत ही खास घोड़ों की नस्ल से आते हैं।"

"घोड़ी के अंडे?" शेख चिल्ली की आँखें फटी की फटी रह गईं।

ठग ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "हाँ! अगर तुम इनमें से एक अंडा खरीद लो और इसे एक महीने तक अपने बिस्तर में गरम कंबल के नीचे छिपाकर रखो, तो इसमें से एक बहुत ही सुंदर और तेज़ दौड़ने वाला 'घोड़े का बच्चा' बाहर निकलेगा।"

शेख चिल्ली खुशी से उछल पड़ा। उसे लगा कि अब उसका घोड़े पर बैठने का सपना पूरा होने वाला है। उसने तुरंत अपनी जेब के सारे पैसे उस ठग के हाथ में रख दिए। ठग ने सबसे बड़ा और भारी तरबूज शेख चिल्ली के हाथों में थमा दिया।

शेख चिल्ली उस भारी 'घोड़ी के अंडे' को बड़ी सावधानी से अपने दोनों हाथों में उठाए, खुशी-खुशी अपने गाँव की तरफ पैदल लौट पड़ा।

रास्ते में चलते हुए उसका दिमाग फिर से खयाली पुलाव पकाने लगा। उसने सोचा: "वाह! जब इस अंडे में से घोड़े का बच्चा निकलेगा, तो मैं उसे खूब बादाम और चना खिलाऊँगा। कुछ ही महीनों में वह एक विशाल और तेज़ घोड़ा बन जाएगा। मैं उस पर लाल रंग की मखमली काठी रखूँगा और जब मैं उस पर बैठकर गाँव में निकलूँगा, तो सब देखते रह जाएँगे!"

शेख चिल्ली सपनों में इतना खो गया था कि उसे रास्ते के गढ्ढे और पत्थर दिखाई ही नहीं दे रहे थे।

रास्ते में एक बहुत ही ढलान वाली पहाड़ी थी। पहाड़ी के नीचे एक घनी और काँटेदार झाड़ी थी। शेख चिल्ली जब उस ढलान से नीचे उतर रहा था, तो अचानक उसका पैर एक बड़े पत्थर से टकराया।

शेख चिल्ली का संतुलन बिगड़ा और उसके हाथों से वह भारी 'तरबूज' (घोड़ी का अंडा) छूट गया!

तरबूज ढलान पर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा नीचे उस घनी झाड़ी में जाकर बहुत ज़ोर से गिरा— 'धपाक्!'

तरबूज के गिरते ही वह बुरी तरह फूट गया और उसका लाल गूदा और पानी चारों तरफ बिखर गया।

इत्तेफाक की बात यह थी कि उस झाड़ी के अंदर पहले से ही एक बहुत ही बड़ा 'जंगली खरगोश' सोया हुआ था। तरबूज के ज़ोरदार धमाके से खरगोश बुरी तरह डर गया। वह अपनी जान बचाने के लिए तुरंत झाड़ी से बाहर निकला और बिजली की फुरती से जंगल की तरफ दौड़ लगा दी।

पहाड़ी के ऊपर खड़े शेख चिल्ली ने जब झाड़ी के अंदर से एक छोटे से जानवर को बाहर निकलते और तेज़ी से दौड़ते हुए देखा, तो उसका बेवकूफ़ दिमाग खुशी से पागल हो गया।

शेख चिल्ली ने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा, "अरे गज़ब! मेरे गिरने से वह अंडा टूट गया और उसमें से मेरा 'घोड़े का बच्चा' बाहर निकल आया! और देखो, यह कितना तेज़ दौड़ता है!"

शेख चिल्ली उस खरगोश के पीछे-पीछे पूरी ताक़त से जंगल में दौड़ने लगा। वह हाँफते हुए आवाज़ें लगा रहा था, "अरे मेरे प्यारे घोड़े! रुक जा! मैं तेरा मालिक हूँ। मुझे छोड़कर मत जा! मैंने तुझे पूरे पाँच रुपये में खरीदा है!"

खरगोश अपनी तेज़ रफ्तार से कुछ ही सेकंड में जंगल की झाड़ियों में ओझल हो गया।

शेख चिल्ली थक-हार कर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसने अपना माथा पीटते हुए बहुत ही उदास मन से कहा, "हाय अल्लाह! मेरा घोड़ा तो पैदा होते ही इतना तेज़ दौड़ता था कि अगर वह बड़ा हो जाता, तो मैं उसे पकड़ ही नहीं पाता। चलो, अच्छा ही हुआ जो भाग गया, वरना रोज़ उसे पकड़ने में ही मेरी जान निकल जाती!"

और इसी अजीबोगरीब तसल्ली के साथ शेख चिल्ली खाली हाथ अपने घर वापस लौट गया।

🎉 कहानी समाप्त

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