"बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय"

एक कस्बे में 'भैरव सिंह' नाम का एक बहुत ही क्रूर और लालची साहूकार रहता था। भैरव सिंह के दिल में दया नाम की कोई चीज़ नहीं थी। वह गरीब किसानों को बहुत ऊँचे ब्याज पर पैसे देता और जब वे पैसे नहीं चुका पाते, तो वह बेरहमी से उनके खेत, उनके घर और उनके जानवरों पर कब्ज़ा कर लेता था।
कई गरीब परिवार उसकी क्रूरता के कारण बेघर हो गए और सड़क पर आ गए। जब लोग रोते हुए उसके सामने गिड़गिड़ाते, तो वह ज़ोर-ज़ोर से हँसता और उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाल देता।
बुरे संस्कार: भैरव सिंह के दो बेटे थे— रंगा और बिल्ला। भैरव सिंह ने कभी अपने बच्चों को प्यार, दया या इंसानियत नहीं सिखाई। उसने बचपन से ही अपने बेटों को यही सिखाया: "बेटो! इस दुनिया में केवल 'पैसा' ही भगवान है। रिश्ते-नाते, दया और भावनाएँ सब कमज़ोरों का काम हैं। हमेशा क्रूर बनो और अपना फायदा देखो।"
रंगा और बिल्ला ने भी अपने पिता की बातें अच्छी तरह सीख लीं। वे भी गाँव वालों के साथ गाली-गलौज करते और पिता से भी ज़्यादा क्रूर बन गए। भैरव सिंह यह देखकर बहुत खुश होता कि उसके बेटे उसके नक्शे-कदम पर चल रहे हैं।
कर्मों का फल: समय बीतता गया। भैरव सिंह बूढ़ा हो गया। उसके हाथ-पैर काँपने लगे और वह एक गंभीर बीमारी का शिकार हो गया। अब उससे हवेली का कामकाज नहीं सँभाला जाता था। सारा कारोबार उसके दोनों बेटों, रंगा और बिल्ला ने अपने हाथ में ले लिया।
बीमार भैरव सिंह अपने बड़े से कमरे में खाट पर पड़ा रहता था। एक दिन उसे बहुत ज़ोरों की भूख लगी। उसने खाँसते हुए अपने बेटों को आवाज़ दी: "रंगा! बिल्ला! मुझे गरम दूध और रोटी दे दो। मेरे शरीर में बहुत दर्द है, मेरी थोड़ी मालिश कर दो।"
रंगा और बिल्ला कमरे में आए, लेकिन उनके चेहरे पर अपने बूढ़े पिता के लिए कोई दया नहीं थी। रंगा ने बहुत ही रूखी और कठोर आवाज़ में कहा: "पिताजी! अब आप किसी काम के नहीं बचे हैं। आपका इलाज करवाने में हमारे बहुत पैसे खर्च हो रहे हैं। आपने ही तो हमें सिखाया था कि 'फायदा' सबसे ऊपर है। अब आप हमारे किसी फायदे के नहीं हैं।"
बिल्ला ने आगे बढ़कर भैरव सिंह को धक्का दिया और कहा: "यह बड़ा कमरा अब मेरा है। आप उठिए और बाहर गायों के तबेले में जाकर रहिए। वहीं आपको सूखी रोटी मिल जाएगी।"
भैरव सिंह को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। जिन बेटों को उसने इतना पैसा और ताक़त दी थी, आज वे उसे उसी के घर से निकाल रहे थे। रंगा और बिल्ला ने अपने बीमार पिता को घसीट कर तबेले में फेंक दिया और हवेली का दरवाज़ा बंद कर लिया।
रात के अँधेरे में, गायों के गोबर और मच्छरों के बीच पड़ा बूढ़ा भैरव सिंह ज़ार-ज़ार रो रहा था। उसे आज वे सारे गरीब किसान याद आ रहे थे जिन्हें उसने बेरहमी से बेघर किया था।
तभी गाँव का एक समझदार बुजुर्ग वहाँ से गुज़रा। उसने भैरव सिंह को रोता देखकर कहा: "भैरव! आज तुम अपने बेटों से दया और प्यार की भीख माँग रहे हो? तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी गरीबों का खून चूसा और अपने बेटों के मन में 'लालच और क्रूरता' के बीज बोए। जब तुमने खुद पूरी ज़िंदगी काँटे बोए हैं, तो आज बुढ़ापे में मीठे फलों की उम्मीद कैसे कर सकते हो? तुम्हारे लिए तो यह कहावत बिल्कुल सच है— 'बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से होय!'"
(यानी जब खेत में काँटेदार बबूल का पेड़ लगाया है, तो उस पर मीठे आम कभी नहीं लग सकते। बुरे कर्मों का फल हमेशा बुरा ही होता है)।
भैरव सिंह को अपने जीवन भर के पापों का अहसास हो गया था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
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