"जल में रहकर मगर से बैर"

नदी के किनारे बसे 'जलगांव' नाम के एक गाँव में 'ठाकुर भवानी सिंह' का राज चलता था। ठाकुर साहब गाँव के सबसे ताक़तवर, अमीर और रसूखदार इंसान थे। गाँव की ज़्यादातर ज़मीन, अनाज के गोदाम और यहाँ तक कि गाँव का 'सबसे बड़ा कुआँ' भी ठाकुर की ही ज़मीन पर था। ठाकुर स्वभाव से बुरे नहीं थे, लेकिन उन्हें अनुशासन और अपनी इज़्ज़त से बहुत प्यार था। गाँव का बच्चा-बच्चा उनका सम्मान करता था।
एक दिन शहर से 'शेरा' नाम का एक घमंडी और अक्खड़ नौजवान उस गाँव में रहने आया। शेरा को अपनी ताक़त और शहर के रहन-सहन का बहुत घमंड था। वह गाँव वालों को बहुत तुच्छ समझता था।
गाँव के एक बुजुर्ग ने शेरा को समझाया: "बेटा शेरा! यह ठाकुर भवानी सिंह का गाँव है। यहाँ शांति से रहना और कभी ठाकुर साहब से नहीं उलझना, क्योंकि वे इस गाँव के अन्नदाता हैं।" शेरा ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा: "अरे काहे का ठाकुर! मैं किसी से नहीं डरता। मैं अपने तरीके से जिऊँगा।"
अहंकार का टकराव: गर्मियों के दिन थे। एक सुबह शेरा गाँव के उसी बड़े कुएँ पर नहाने और पानी भरने गया। वहाँ पहले से ही ठाकुर भवानी सिंह के नौकर पानी भर रहे थे और ठाकुर साहब खुद वहाँ खड़े थे।
नियम के अनुसार, पहले ठाकुर के घर का पानी भरा जाता था और फिर गाँव वाले पानी लेते थे। लेकिन शेरा ने अपनी अकड़ दिखाने के लिए, ज़बरदस्ती ठाकुर के नौकरों को धक्का दे दिया और अपना घड़ा कुएँ में डाल दिया।
ठाकुर भवानी सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा: "नौजवान! अपनी बारी का इंतज़ार करो। धक्का-मुक्की मत करो।"
शेरा ने पलटकर ठाकुर की आँखों में आँखें डालीं और बेहद बदतमीज़ी से बोला: "मैं किसी का इंतज़ार नहीं करता! कुआँ किसी के बाप का नहीं है। मैं तो अभी पानी भरूँगा, जो उखाड़ना है उखाड़ लो!"
पूरा गाँव यह सुनकर सन्न रह गया। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ठाकुर से ऐसे बात करे। ठाकुर साहब ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और शांति से वहाँ से चले गए। शेरा को लगा कि उसने ठाकुर को डरा दिया है और वह अपनी जीत पर बहुत घमंड करने लगा।
ताक़त का एहसास: अगली सुबह जब शेरा सोकर उठा, तो उसे बहुत ज़ोरों की प्यास लगी थी। वह अपना घड़ा लेकर कुएँ पर गया, लेकिन कुएँ के चारों तरफ ठाकुर के लठैत (Guards) खड़े थे।
लठैतों ने अपनी लाठियाँ तान लीं और कहा: "ठाकुर साहब का हुक्म है कि इस लड़के को गाँव के कुएँ से एक बूँद पानी न दिया जाए।"
शेरा घबरा गया। उसने सोचा कि वह गाँव के दूसरे लोगों से पानी माँग लेगा। वह पूरे गाँव में घर-घर भटका। उसने लोगों के दरवाज़े खटखटाए, लेकिन ठाकुर के डर से किसी ने उसे पानी का एक गिलास तक नहीं दिया। बनिए ने उसे राशन देने से मना कर दिया और ज़मींदार ने उसे काम देने से इंकार कर दिया।
दोपहर होते-होते चिलचिलाती धूप में शेरा का गला सूखकर काँटा हो गया। वह प्यास और भूख से तड़पने लगा। उसकी सारी शहर की अकड़ और ताक़त हवा हो गई। उसे समझ आ गया कि इस गाँव में रहकर ठाकुर से पंगा लेना उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी।
तड़पता हुआ शेरा दौड़कर ठाकुर भवानी सिंह की हवेली गया और उनके पैरों में गिरकर रोने लगा: "मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब! मैं प्यास से मर रहा हूँ। मेरा घमंड टूट गया है।"
ठाकुर ने उसे एक लोटा पानी दिया और बहुत ही शांत लेकिन कड़क आवाज़ में कहा: "शेरा! इंसान को अपनी ताक़त का घमंड वहीं दिखाना चाहिए जहाँ उसका ज़ोर चले। जिस गाँव की ज़मीन पर तुम खड़े हो और जिसका पानी तुम पीते हो, उसी से दुश्मनी करके तुम ज़िंदा कैसे रह सकते हो? याद रखना— 'जल में रहकर मगर से बैर' कभी नहीं करना चाहिए!" (यानी जैसे पानी में रहकर मगरमच्छ से लड़ना मौत को दावत देना है, वैसे ही ताक़तवर के इलाके में उसी से दुश्मनी करना मूर्खता है)।
📖 मुहावरों की कहानियाँ की और कहानियाँ
"नाच न जाने आँगन टेढ़ा"
अपनी कमी छिपाने के लिए दूसरों पर या परिस्थितियों पर दोष मढ़ना।
पढ़ें →"अंधों में काना राजा"
मूर्खों के बीच थोड़ा सा पढ़ा-लिखा या ज्ञानी इंसान भी बहुत महान माना जाता है।
पढ़ें →"अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"
समय निकल जाने के बाद पछताने से या रोने से कोई फायदा नहीं होता, इसलिए हर काम समय पर करना चाहिए।
पढ़ें →"जिसकी लाठी उसकी भैंस"
जिसके पास ताक़त या सत्ता होती है, जीत उसी की होती है और उसी का कब्ज़ा मान लिया जाता है।
पढ़ें →"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"
मूर्ख या अज्ञानी इंसान किसी मूल्यवान या गुणवान चीज़ की कद्र नहीं कर सकता, क्योंकि उसे उसकी परख नहीं होती।
पढ़ें →"थोथा चना बाजे घना"
'थोथा' मतलब खाली। जिस इंसान में गुण या ज्ञान कम होता है, वह अपनी अहमियत दिखाने के लिए दिखावा बहुत ज़्यादा करता है और बहुत बड़ी-बड़ी डिंगें मारता है।
पढ़ें →