छत पर गाय चराना

बरसात का मौसम था। पिछले कई दिनों से गाँव में लगातार झमाझम बारिश हो रही थी। शेख चिल्ली का घर मिट्टी और ईंटों से बना था और उसकी छत बिल्कुल सपाट थी। लगातार बारिश होने की वजह से शेख चिल्ली की छत पर मिट्टी की परतों में से बहुत ही सुंदर, हरी-भरी और मुलायम 'घास' उग आई थी।
कुछ ही दिनों में छत की घास इतनी बड़ी हो गई कि ऐसा लगने लगा जैसे किसी ने छत पर मखमली हरा गलीचा बिछा दिया हो।
शेख चिल्ली के पास एक बहुत ही तगड़ी और भारी-भरकम गाय थी, जिसे वह अपने घर के आँगन में बाँधता था। बारिश के कारण गाय को बाहर चराने ले जाना मुश्किल हो रहा था और वह खूँटे से बँधी-बँधी भूखी रंभा रही थी— "बाँऽऽऽ!"
एक सुबह जब शेख चिल्ली सोकर उठा, तो उसकी नज़र अपनी छत पर लहलहाती हुई उस ताज़ी और हरी घास पर पड़ी। फिर उसने अपनी भूखी गाय की तरफ देखा।
शेख चिल्ली के खुराफाती दिमाग की बत्ती जल उठी। कोई भी साधारण और समझदार इंसान होता, तो वह एक हँसिया लेता, छत पर जाता, घास काटकर उसे एक टोकरी में भरता और नीचे लाकर गाय के सामने डाल देता।
लेकिन शेख चिल्ली साधारण इंसान कहाँ था? उसका दिमाग तो हमेशा उल्टी दिशा में दौड़ता था।
शेख ने सोचा: "मैं भी कितना मूर्ख हूँ जो इस बेचारी गाय को भूखा रखे हुए हूँ। छत पर इतनी ताज़ी घास है। अगर मैं घास को काटूँगा, फिर उसे नीचे लाऊँगा, तो इसमें मेरी बहुत मेहनत लगेगी और मेरे हाथ भी दुखने लगेंगे। समझदारी तो इसी में है कि घास को नीचे लाने के बजाय, इस गाय को ही छत पर ले जाया जाए! गाय अपने आप ताज़ी घास चरेगी और मेरी मेहनत भी बच जाएगी!"
यह महान विचार आते ही शेख चिल्ली बहुत खुश हुआ। वह दौड़कर आँगन में गया और अपनी उस भारी-भरकम गाय के गले में एक बहुत ही मोटी और मज़बूत रस्सी बाँध दी।
अब शुरू हुआ दुनिया का सबसे हास्यास्पद काम! शेख चिल्ली के घर की छत पर जाने के लिए एक बहुत ही संकरी और खड़ी 'सीढ़ी' बनी हुई थी।
शेख चिल्ली सीढ़ियों के ऊपर खड़ा हो गया और उसने गाय की रस्सी पकड़कर अपनी पूरी ताक़त से उसे ऊपर की तरफ खींचना शुरू कर दिया— "आ जा मेरी गऊ माता! छत पर दावत तैयार है! ज़ोर लगा के हईशा!"
गाय बेचारी सीढ़ियों को देखकर घबरा गई। जानवरों के लिए खड़ी सीढ़ियाँ चढ़ना वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। गाय ने अपने चारों पैर ज़मीन पर जमा लिए और ज़ोर-ज़ोर से रंभाने लगी।
लेकिन शेख चिल्ली कहाँ हार मानने वाला था। उसने रस्सी को अपने हाथों में लपेटा और अपना पूरा वज़न पीछे की तरफ डालकर गाय को घसीटने लगा। गाय का आधा शरीर सीढ़ियों पर लटक गया था और वह छटपटा रही थी। गाय की खुरों के सीढ़ियों से टकराने और उसके ज़ोर-ज़ोर से रंभाने से पूरे मोहल्ले में भयानक शोर मच गया।
पड़ोसी भागते हुए शेख चिल्ली के घर पहुँचे। जब उन्होंने देखा कि शेख चिल्ली अपनी भारी-भरकम गाय को घसीट कर छत पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा है, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
गाँव के एक बुजुर्ग ने माथा पीटते हुए चिल्लाकर कहा, "अरे शेख! तू पागल हो गया है क्या? इस बेचारी बेज़ुबान जानवर की जान लेगा क्या? इसे ज़बरदस्ती सीढ़ियों पर क्यों घसीट रहा है?"
शेख चिल्ली ने पसीना पोंछते हुए बहुत ही गर्व से जवाब दिया, "अरे काका! आप लोग तो बेवजह शोर मचा रहे हैं। मेरी छत पर बहुत अच्छी घास उगी है। मैं तो बस अपनी गाय को छत पर चराने के लिए ले जा रहा हूँ, ताकि मुझे घास काटने की मेहनत न करनी पड़े।"
यह तर्क सुनकर भीड़ में खड़े लोगों ने अपना सिर पकड़ लिया।
बुजुर्ग ने झल्लाते हुए कहा, "अरे दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़! मान लिया कि तू इसे ज़ोर लगाकर छत पर चढ़ा भी देगा, लेकिन क्या तूने यह सोचा है कि जब यह घास खा लेगी, तो इतनी भारी गाय सीढ़ियों से नीचे कैसे उतरेगी? उतरते समय तो यह सीढ़ियों से गिरकर अपनी हड्डियाँ तुड़वा लेगी!"
शेख चिल्ली का हाथ रस्सी से छूट गया। उसने इस 'नीचे उतरने' वाली बात पर तो सोचा ही नहीं था। उसका मुँह खुला का खुला रह गया।
बुजुर्ग ने पास पड़ी हुई घास काटने वाली दराँती (हँसिया) उठाई और शेख के हाथ में थमाते हुए कहा, "चुपचाप छत पर जा, घास काट और नीचे लाकर गाय को खिला दे। अक्लमंद बनने के चक्कर में इस बेचारी की जान मत निकाल!"
शेख चिल्ली झेंप गया। उसने चुपचाप गाय की रस्सी खोली और मुँह लटकाए हुए घास काटने के लिए छत पर चला गया, जबकि पूरा मोहल्ला उसकी इस बेवकूफी पर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा रहा था।
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