चोरी करने चला गले में घंटी बाँध कर

शेख चिल्ली के पास कभी पैसे नहीं टिकते थे। एक बार उसके घर में खाने के लिए एक दाना तक नहीं बचा। वह बहुत भूखा और परेशान था।
गाँव में बैठे कुछ आवारा लोगों ने मज़ाक में उससे कहा, "अरे शेख! अगर पैसे कमाने हैं, तो शहर के उन बड़े-बड़े चोरों की तरह कोई काम क्यों नहीं करता? वे एक ही रात में अमीर सेठों के घर से इतना माल उड़ा लाते हैं कि ज़िंदगी भर बैठकर खाते हैं।"
भोले शेख चिल्ली ने इस मज़ाक को सच मान लिया। उसके दिमाग में यह बात बैठ गई कि अब अपनी गरीबी दूर करने के लिए उसे भी 'चोरी' करनी पड़ेगी।
उसने तय किया कि आज रात अमावस्या है, आसमान में चाँद नहीं होगा और घना अँधेरा रहेगा। चोरी करने के लिए इससे अच्छी रात कोई हो ही नहीं सकती। उसने अपने ही गाँव के सबसे अमीर सेठ 'किरोड़ीमल' के घर चोरी करने की योजना बनाई।
जब रात बहुत गहरी हो गई, तो शेख चिल्ली अपने घर से निकलने की तैयारी करने लगा।
लेकिन शेख चिल्ली के सामने एक बहुत बड़ी समस्या थी। उसे 'अँधेरे' से बहुत डर लगता था। उसने सोचा: "रात बहुत काली है। मैं सेठ के घर तो चला जाऊँगा, लेकिन जब मैं उसके घर के अंदर अँधेरे में दबे पाँव चलूँगा, तो मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं कहाँ हूँ? ऐसा न हो कि मैं भटक कर किसी और के कमरे में चला जाऊँ या खुद ही कहीं खो जाऊँ! अँधेरे में तो इंसान को अपनी ही आवाज़ सुनाई नहीं देती।"
तभी उसकी नज़र आँगन में बँधी अपनी बकरी के गले में पड़ी। बकरी के गले में पीतल की एक बहुत ही बड़ी और भारी 'घंटी' बँधी हुई थी, जो हिलने पर 'टन-टन... टन-टन' की ज़ोरदार आवाज़ करती थी।
शेख चिल्ली की आँखें चमक उठीं। उसके दिमाग ने एक और 'महान' आविष्कार किया था! उसने सोचा: "वाह! क्या तरकीब है। मैं यह घंटी अपने गले में बाँध लेता हूँ। जब मैं अँधेरे में सेठ के घर चोरी करने के लिए चलूँगा, तो मेरे हर कदम के साथ यह घंटी बजेगी। घंटी की आवाज़ सुनकर मुझे पता चलता रहेगा कि मैं किस दिशा में जा रहा हूँ और मैं अँधेरे में बिल्कुल नहीं खोऊँगा!"
शेख चिल्ली ने तुरंत बकरी के गले से वह पीतल की भारी घंटी खोली और एक मोटी रस्सी से उसे 'अपने ही गले में' कसकर बाँध लिया!
रात के सन्नाटे में, शेख चिल्ली सेठ किरोड़ीमल की हवेली की तरफ दबे पाँव बढ़ने लगा।
चोरों की खासियत होती है कि वे बिना कोई आवाज़ किए, बिल्ली की तरह चलते हैं। लेकिन हमारा शेख चिल्ली जैसे ही अपना एक कदम आगे बढ़ाता, उसके गले में बँधी घंटी ज़ोर से बज उठती— 'टन्न...!'
वह दूसरा कदम बढ़ाता— 'टन्न... टन्न...!'
रात का सन्नाटा इतना गहरा था कि उस पीतल की घंटी की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूँजने लगी। घंटी की आवाज़ सुनकर मोहल्ले के कुत्ते जाग गए और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगे।
शेख चिल्ली अपने होंठों पर उँगली रखकर कुत्तों को चुप कराने की कोशिश करता— "श्श्श! चुप रहो, मैं चोरी करने जा रहा हूँ।" लेकिन वह जितना हिलता, घंटी उतनी ही ज़ोर से बजती।
घंटी की इस लगातार आवाज़ से सेठ किरोड़ीमल और उनके घर के सभी नौकरों की नींद खुल गई। उन्होंने सोचा कि शायद कोई लावारिस गाय या भैंस उनके अहाते में घुस आई है। सेठ ने अपने नौकरों को लालटेन और मोटे-मोटे डंडे देकर बाहर भेजा।
नौकरों ने जैसे ही हवेली के मुख्य दरवाज़े के पास लालटेन की रोशनी की, उन्होंने देखा कि कोई गाय या भैंस नहीं, बल्कि शेख चिल्ली अपने गले में एक बहुत बड़ी घंटी लटकाए, दबे पाँव घर के अंदर घुसने की कोशिश करता है।
नौकरों ने तुरंत शेख चिल्ली को चारों तरफ से घेर लिया और उस पर डंडे तान लिए। सेठ किरोड़ीमल ने बाहर आकर कड़कती आवाज़ में पूछा, "अरे शेख चिल्ली! इतनी रात को गले में यह घंटी बाँधकर तू मेरे घर में क्या कर रहा है?"
शेख चिल्ली ने बहुत ही घबराहट में, लेकिन अपनी ईमानदारी दिखाते हुए कहा: "अरे सेठ जी! आप लोग इतना शोर क्यों मचा रहे हैं? मैं तो बस चुपचाप आपके घर 'चोरी' करने आया था। और यह घंटी मैंने इसलिए बाँधी थी ताकि अँधेरे में मुझे अपना रास्ता पता चलता रहे और मैं खो न जाऊँ। आप लोग बीच में आकर मेरा सारा काम बिगाड़ रहे हैं!"
यह सुनकर सेठ किरोड़ीमल और उनके नौकरों के हाथ से डंडे छूट गए। वे एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। फिर हवेली के आँगन में ठहाकों की गूँज उठने लगी। लोग इतना हँसे कि उनकी आँखों से पानी आ गया।
सेठ जी ने हँसते-हँसते अपना पेट पकड़ लिया और कहा, "अरे मेरे भोले चोर! जो चोर अपने ही गले में घंटी बाँधकर चोरी करने चले, उसे दुनिया की कोई पुलिस नहीं पकड़ सकती, क्योंकि वह खुद ही अपना ढिंढोरा पीट रहा है! तू चोरी करने के लायक नहीं है, तू तो बस हँसने के लायक है।"
सेठ जी को शेख चिल्ली के इस भोलेपन पर बहुत तरस आया। उन्होंने नौकरों से कहकर शेख को कुछ खाने का सामान दिया और उसे समझाकर वापस घर भेज दिया। उस रात के बाद शेख चिल्ली ने कभी चोरी करने का खयाल अपने दिमाग में नहीं लाया।
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