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😄 शेखचिल्ली

तैरना सीखने की अजीब कसम

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
तैरना सीखने की अजीब कसम

गर्मियों के दिन थे। सूरज आसमान से आग बरसा रहा था। गाँव के सभी लोग गर्मी से राहत पाने के लिए गाँव के बाहर बहने वाली ठंडी और गहरी नदी में नहाने जाया करते थे।

शेख चिल्ली को 'तैरना' बिल्कुल नहीं आता था। उसे पानी से बहुत डर लगता था। लेकिन उस दिन गर्मी इतनी भयंकर थी कि शेख चिल्ली से रहा नहीं गया। उसने भी सोचा कि आज वह नदी के किनारे जाकर पानी में डुबकी लगाएगा और गर्मी भगाएगा।

शेख चिल्ली नदी के किनारे पहुँचा। वहाँ कई बच्चे और नौजवान पानी में मज़े से तैर रहे थे। शेख चिल्ली ने अपने कपड़े उतारे और बहुत ही सावधानी से नदी के किनारे जहाँ पानी कम था, वहाँ जाकर बैठ गया। वह छप-छप करके अपने ऊपर पानी डाल रहा था।

तभी किनारे की चिकनी काई पर शेख चिल्ली का पैर बुरी तरह फिसल गया!

वह लुढ़कता हुआ नदी के गहरे हिस्से में जा गिरा। पानी बहुत गहरा था और नदी का बहाव भी तेज़ था। चूँकि शेख चिल्ली को तैरना नहीं आता था, इसलिए वह पानी में डूबने लगा। वह अपने हाथ-पैर बेतहाशा मार रहा था और मदद के लिए चिल्लाने की कोशिश कर रहा था— "बचाओ! बचाओ! मैं डूब रहा हूँ!"

वह बार-बार पानी के अंदर जाता, उसके मुँह और नाक में नदी का गंदा पानी भर जाता। वह बुरी तरह खाँसने लगा और उसकी साँसें फूलने लगीं। उसे लगा कि आज तो उसकी ज़िंदगी का आखिरी दिन है।

शेख चिल्ली को डूबता देख पानी में तैर रहे दो-तीन हट्टे-कट्टे नौजवान तुरंत उसकी तरफ दौड़े। उन्होंने शेख चिल्ली के बाल पकड़े और उसे खींचकर नदी के सुरक्षित किनारे पर ले आए।

किनारे पर आते ही शेख चिल्ली ज़मीन पर लेट गया। उसने बहुत सारा पानी निगल लिया था। वह बुरी तरह खाँस रहा था और उसका पूरा शरीर डर के मारे एक सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था।

आज उसने मौत को बहुत करीब से देखा था। पानी का खौफ उसके दिलो-दिमाग में बहुत गहराई तक बैठ गया।

जब उसकी साँसें कुछ सामान्य हुईं, तो वह उठकर बैठा। उसने अपने काँपते हाथों को जोड़ा, आसमान की तरफ देखा और अपने आप से एक बहुत ही बड़ा और अजीबोगरीब वादा किया।

शेख चिल्ली ने पूरी भीड़ के सामने, अपनी सबसे गंभीर आवाज़ में एक कसम खाते हुए कहा:

"या अल्लाह! आज तूने मुझे इस खौफनाक पानी से बचा लिया। आज के बाद मैं अपने कानों को हाथ लगाता हूँ। मैंने आज एक पक्की कसम खाई है... जब तक मैं पूरी तरह से 'तैरना' नहीं सीख लूँगा, तब तक मैं इस पानी में अपना एक पैर भी नहीं रखूँगा!"

यह सुनकर वहाँ खड़े नौजवान और गाँव वाले एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। थोड़ी देर तक तो किसी को कुछ समझ नहीं आया कि शेख चिल्ली ने क्या कहा है। फिर एक नौजवान ने अपनी हँसी रोकते हुए पूछा:

"अरे शेख भाई! तुम्हारी कसम तो बहुत अच्छी है। लेकिन ज़रा अपने दिमाग पर ज़ोर डालकर यह तो सोचो कि तुम जो कह रहे हो, वह कितना बड़ा पागलपन है!"

शेख चिल्ली ने आँखें तरेरते हुए कहा, "इसमें पागलपन कैसा? मैं बिल्कुल सही कह रहा हूँ। पहले मैं किसी से तैरना सीखूँगा, उसके बाद ही पानी में जाऊँगा!"

उस नौजवान ने अपना माथा पीट लिया और कहा, "अरे दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़! इंसान को तैरना सीखने के लिए भी तो 'पानी के अंदर' ही उतरना पड़ता है! कोई हवा में हाथ-पैर मारकर या ज़मीन पर लेटकर थोड़े ही तैरना सीखता है? जब तू कसम खा रहा है कि पानी में कदम ही नहीं रखेगा, तो फिर तू ज़िंदगी में तैरना कैसे सीखेगा?"

यह बात सुनकर शेख चिल्ली का दिमाग सुन्न हो गया। उसने अपना सिर खुजाया। उसे अपनी कसम की बेवकूफी समझ में आने लगी थी।

गाँव वाले पेट पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। शेख चिल्ली ने झेंपते हुए अपने कपड़े उठाए और बिना किसी की बात का जवाब दिए, शर्म के मारे अपना सिर झुकाए चुपचाप अपने घर की तरफ भाग गया। और सच बात तो यह है कि अपनी इस बेवकूफी भरी कसम के चक्कर में शेख चिल्ली पूरी ज़िंदगी कभी तैरना सीख ही नहीं पाया!

🎉 कहानी समाप्त

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