"चोर की दाढ़ी में तिनका"

माधोपुर गाँव में 'सेठ धनीराम' नाम के एक बहुत ही अमीर व्यापारी रहते थे। सेठ जी की हवेली में हमेशा पाँच-छह नौकर काम करते थे। सेठ जी अपना सारा पैसा और जेवर एक बड़े से लोहे के संदूक में रखते थे।
एक रात, जब सेठ जी सो रहे थे, तो किसी ने चुपके से उनके कमरे में घुसकर संदूक का ताला तोड़ दिया और उसमें रखे 'सोने के जेवरों की पोटली' चुरा ली।
सुबह जब सेठ जी उठे और उन्होंने संदूक टूटा हुआ देखा, तो वे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। उन्होंने तुरंत अपने सारे नौकरों (रामू, श्यामू, बिरजू, कालू और लखन) को हवेली के आँगन में इकट्ठा किया।
सेठ जी ने कड़क आवाज़ में पूछा: "रात को हवेली के अंदर कोई बाहर का आदमी नहीं आया था। तुम पाँचों में से ही किसी एक ने मेरे जेवर चुराए हैं। सच-सच बता दो, वरना बहुत बुरा होगा।"
लेकिन कोई भी नौकर चोरी मानने को तैयार नहीं था। सबने कहा, "सेठ जी, हमने कुछ नहीं किया।"
सरपंच की तरकीब: जब सेठ जी को समझ नहीं आया कि असली चोर कौन है, तो वे गाँव के बहुत ही बुद्धिमान 'सरपंच' जी को बुला लाए।
सरपंच जी ने हवेली में आकर सभी नौकरों को एक कतार में खड़ा किया। उन्होंने अपनी झोली से लकड़ी की 'पाँच छोटी छड़ियाँ' निकालीं। सरपंच जी ने सब छड़ियों को एक साथ नाप कर दिखाया— सारी छड़ियाँ लंबाई में बिल्कुल 'एक बराबर' थीं।
सरपंच जी ने हर नौकर को एक-एक छड़ी दे दी और बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा: "ध्यान से सुनो! ये कोई मामूली छड़ियाँ नहीं हैं, ये 'जादुई छड़ियाँ' हैं। तुम सब आज रात इन छड़ियों को अपने-अपने बिस्तर के पास रखकर सोना। जिसने चोरी नहीं की है, उसकी छड़ी वैसी की वैसी ही रहेगी। लेकिन... जिसने सेठ जी के जेवर चुराए हैं, उसकी 'छड़ी आज रात अपने-आप एक इंच लंबी हो जाएगी'!"
सभी नौकर अपनी-अपनी छड़ी लेकर अपने कमरों में चले गए।
मनोवैज्ञानिक खेल और पर्दाफाश: रात का समय था। हवेली में सन्नाटा था। रामू, श्यामू, बिरजू और लखन शांति से सो गए क्योंकि उन्होंने चोरी नहीं की थी और उन्हें जादुई छड़ी का कोई डर नहीं था।
लेकिन 'कालू' नाम का नौकर बिस्तर पर करवटें बदल रहा था। जेवर उसी ने चुराए थे! उसके माथे पर पसीना आ रहा था।
कालू ने घबराहट में सोचा: "हे भगवान! अगर यह जादुई छड़ी रात भर में एक इंच लंबी हो गई, तो सुबह मैं पकड़ा जाऊँगा और सरपंच मुझे जेल भिजवा देंगे। मुझे कुछ तरकीब लगानी होगी।"
चोर का दिमाग हमेशा डर के साये में रहता है। कालू ने एक चाकू निकाला और अपनी छड़ी को नापकर नीचे से ठीक 'एक इंच काट दिया'। उसने मुस्कुराते हुए सोचा: "अब अगर यह छड़ी रात में एक इंच बढ़ भी गई, तो सुबह यह बाकी छड़ियों के बराबर ही रहेगी और मैं बच जाऊँगा!" यह सोचकर वह चैन की नींद सो गया।
अगली सुबह, सरपंच जी ने सभी नौकरों को आँगन में बुलाया और छड़ियाँ वापस माँगीं।
सरपंच जी ने रामू, श्यामू, बिरजू और लखन की छड़ियाँ देखीं— वे सब बिल्कुल पुरानी लंबाई की थीं। लेकिन जैसे ही उन्होंने 'कालू' की छड़ी देखी, वे ज़ोर से मुस्कुराए। कालू की छड़ी बाकी सभी छड़ियों से 'एक इंच छोटी' थी! (क्योंकि जादुई छड़ी जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है, छड़ियाँ बढ़ती नहीं हैं)।
सरपंच जी ने कालू का कॉलर पकड़ा और कड़क कर बोले: "पकड़ा गया चोर! जेवर निकाल!"
कालू डर के मारे काँपने लगा और सेठ जी के पैरों में गिरकर अपना गुनाह कबूल कर लिया। सेठ जी ने हैरान होकर सरपंच से पूछा: "सरपंच जी, आपको कैसे पता चला कि यही चोर है?"
सरपंच जी ने हँसते हुए गाँव वालों से कहा: "सेठ जी! कोई छड़ी जादुई नहीं थी। लेकिन जो इंसान जुर्म करता है, उसके मन में हमेशा एक 'डर' बैठा रहता है। उसी डर के कारण इस कालू ने खुद ही अपनी छड़ी काट ली और अपना गुनाह साबित कर दिया। सच ही कहते हैं, दोषी आदमी हमेशा खौफ में रहता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे— 'चोर की दाढ़ी में तिनका' होता है!" (यानी चोर हमेशा शक के घेरे में खुद को बचाने की मूर्खतापूर्ण कोशिश करता है और पकड़ा जाता है)।
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