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"लातों के भूत बातों से नहीं मानते"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"लातों के भूत बातों से नहीं मानते"

रामगढ़ गाँव में 'किशन' नाम का एक बहुत ही सीधा और शराफ़त पसंद धोबी रहता था। किशन कभी किसी पर गुस्सा नहीं करता था। उसके पास कपड़े ढोने के लिए एक बहुत ही हट्टा-कट्टा 'गधा' था, जिसका नाम था 'मंगोलू'।

मंगोलू शरीर से तो बहुत मज़बूत था, लेकिन वह दुनिया का सबसे 'अड़ियल और ढीठ' गधा था। उसे कामचोरी करने की बहुत गंदी आदत थी।

एक दिन सुबह-सुबह किशन को गाँव के सारे मैले कपड़े लादकर नदी घाट पर धोने के लिए ले जाने थे। किशन ने कपड़ों की भारी गठरी मंगोलू की पीठ पर लाद दी। लेकिन मंगोलू ने सोच लिया था कि आज वह एक कदम भी नहीं चलेगा। वह ज़मीन पर चारों पैर पसार कर बैठ गया।

प्यार और मिन्नतें: किशन बहुत ही शरीफ़ इंसान था, वह जानवरों को मारना-पीटना पसंद नहीं करता था। उसने सोचा कि प्यार से काम निकल जाएगा। किशन ने मंगोलू के सिर पर हाथ फेरते हुए बहुत ही मीठी आवाज़ में कहा: "उठ जा मेरे प्यारे मंगोलू! चल नदी पर चलते हैं। मैं तुझे शाम को हरी-हरी घास और मीठी गाजर खिलाऊँगा। उठ जा मेरा बच्चा!"

लेकिन मंगोलू ने तो जैसे कसम खा रखी थी। उसने किशन की तरफ देखा, ज़ोर से 'ढेंचू-ढेंचू' किया और अपनी आँखें बंद करके ज़मीन पर और भी पसर गया।

किशन परेशान हो गया। उसने मंगोलू के सामने ताज़े चने रखे, उसके पैर सहलाए, यहाँ तक कि उसके सामने हाथ भी जोड़े: "अरे भाई! उठ जा। लोग मेरे कपड़ों का इंतज़ार कर रहे होंगे, मेरी रोज़ी-रोटी का सवाल है।"

लेकिन मंगोलू टस से मस नहीं हुआ। गाँव के कुछ लोग वहाँ से गुज़र रहे थे, वे किशन की यह बेबसी देखकर हँसने लगे। "अरे किशन! यह गधा है, कोई इंसान नहीं जो तेरी मिन्नतें समझेगा," एक राहगीर ने कहा।

सख़्ती का असर: तभी गाँव के एक पुराने और अनुभवी सूबेदार वहाँ से गुज़रे। उन्होंने देखा कि किशन हाथ जोड़कर एक गधे से बात कर रहा है और गधा ढीठ बनकर बैठा है।

सूबेदार जी ने अपनी बड़ी मूँछों पर ताव दिया और पास पड़ी एक बहुत ही मोटी और मज़बूत 'बाँस की लाठी' उठा ली।

उन्होंने किशन को किनारे किया और कहा: "किशन बेटा! तुम बहुत सीधे हो। तुम गलत जानवर पर अपनी शराफत दिखा रहे हो।"

सूबेदार जी ने वह मोटी लाठी हवा में ज़ोर से घुमाई और पूरे ज़ोर से लाठी ज़मीन पर पटकी— 'ठकाक!'

उन्होंने मंगोलू को घूरते हुए कड़क और डरावनी आवाज़ में चिल्लाकर कहा: "उठता है या दूँ एक लाठी पीठ पर? तेरी सारी अड़ियलपन अभी निकालता हूँ!"

लाठी की वह भयानक आवाज़ और सूबेदार का गुस्सा देखकर ढीठ मंगोलू की रूह काँप गई। लाठी उसके शरीर पर पड़ी भी नहीं थी, कि मंगोलू बिजली की फुरती से एक सेकंड में 'खड़ा हो गया' और बिना कुछ खिलाए-पिलाए, चुपचाप नदी की तरफ दौड़ लगा दी!

किशन यह चमत्कार देखकर हैरान रह गया।

सूबेदार जी ने हँसते हुए किशन के कंधे पर हाथ रखा और कहा: "देखा किशन! जो काम तुम्हारे घंटों के प्यार, हाथ जोड़ने और गाजर के लालच ने नहीं किया, वह एक लाठी की आवाज़ ने कर दिया। कुछ लोग और जानवर स्वभाव से ही ऐसे होते हैं कि शराफत उनकी समझ में नहीं आती। हमेशा याद रखना— 'लातों के भूत, बातों से नहीं मानते!'"

🎉 कहानी समाप्त

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