शेख चिल्ली और पेड़ की जड़ें

शेख चिल्ली में धैर्य नाम की कोई चीज़ नहीं थी। वह जो भी काम करता, उसका फल उसे उसी वक्त चाहिए होता था।
गर्मियों के मौसम में एक दिन शेख चिल्ली बाज़ार से पके हुए मीठे 'आम' लेकर आया। आम खाने के बाद जब गुठलियाँ बचीं, तो उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने सोचा कि अगर वह इन गुठलियों को अपने बागीचे में बो दे, तो कुछ ही सालों में उसके पास अपना खुद का आम का एक बहुत बड़ा पेड़ होगा। फिर उसे बाज़ार से आम नहीं खरीदने पड़ेंगे और वह मुफ्त में पेट भर आम खा सकेगा।
शेख चिल्ली ने तुरंत एक कुदाल उठाई, अपने बागीचे में एक छोटा सा गढ्ढा खोदा और उसमें एक आम की गुठली दबा दी। उसने ऊपर से अच्छी मिट्टी डाली और खूब सारा पानी दे दिया।
कुछ हफ्तों के बाद, उस मिट्टी में से एक बहुत ही नन्हा, हरा और सुंदर सा 'आम का पौधा' बाहर निकल आया।
पौधे को देखकर शेख चिल्ली की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसे लगा कि अब बस कुछ ही दिनों में यह पौधा एक विशाल पेड़ बन जाएगा और उस पर रसीले आम लटकने लगेंगे। वह हर रोज़ सुबह-शाम उस नन्हे पौधे के पास जाकर बैठ जाता और उसे निहारता रहता। वह पौधे को पानी देता और उसके आस-पास की घास साफ करता।
दो-तीन दिन बीत गए। शेख चिल्ली को लगा कि पौधा ऊपर से तो बिल्कुल वैसा ही दिख रहा है, यह बड़ा क्यों नहीं हो रहा है?
उसने सोचा: "शायद यह पौधा ज़मीन के ऊपर से नहीं, बल्कि ज़मीन के 'नीचे' से बढ़ रहा होगा। मुझे कैसे पता चलेगा कि इसकी जड़ें कितनी बड़ी हो गई हैं? अगर जड़ें जल्दी बड़ी नहीं होंगी, तो पेड़ कैसे बनेगा? मुझे ज़रूर इसकी जड़ों की जाँच करनी चाहिए।"
अगली सुबह सूरज निकलते ही शेख चिल्ली बागीचे में पहुँचा। उसने बहुत ही 'सावधानी' से उस नन्हे पौधे के चारों तरफ की मिट्टी हटाई। फिर उसने पौधे के तने को पकड़कर उसे ज़मीन से 'पूरा उखाड़ लिया'!
उसने पौधे की छोटी-छोटी जड़ों को बहुत ध्यान से देखा। "हम्म... जड़ें तो थोड़ी सी ही बड़ी हुई हैं," शेख चिल्ली ने खुद से कहा।
जड़ों का मुआयना करने, उसने वापस उस पौधे को उसी गढ्ढे में गाड़ दिया और ऊपर से पानी डाल दिया।
शेख चिल्ली ने यह अपना 'रोज़ का नियम' बना लिया। हर सुबह वह सोकर उठता, बागीचे में जाता, उस बेचारे नन्हे पौधे को ज़मीन से उखाड़ता, उसकी जड़ों को नापता कि वे कितनी लंबी हुई हैं, और फिर उसे वापस ज़मीन में गाड़ देता।
ऐसा करते हुए उसे एक हफ्ता बीत गया।
सातवें दिन जब शेख चिल्ली सुबह-सुबह पौधे को देखने गया, तो वह बहुत उदास हो गया। वह नन्हा, हरा-भरा पौधा बिल्कुल पीला पड़ चुका था। उसकी सारी पत्तियाँ सूख कर मुरझा गई थीं और वह ज़मीन पर गिर गया था।
शेख चिल्ली को कुछ समझ नहीं आया। वह रोनी सूरत बनाकर उस सूखे हुए पौधे के पास बैठ गया।
तभी गाँव के एक बहुत ही अनुभवी और बुजुर्ग किसान का वहाँ से गुज़रना हुआ। उन्होंने शेख चिल्ली को उदास देखा, तो पास आकर पूछा, "क्या बात है शेख? इतना उदास क्यों बैठा है?"
शेख चिल्ली ने सूखे हुए पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, "काका! मैंने कितने प्यार से यह आम का पौधा लगाया था। मैं हर रोज़ इसका इतना ध्यान रखता था, फिर भी यह सूख गया।"
किसान ने पौधे की हालत देखी और पूछा, "तू इसका ध्यान कैसे रखता था? पानी तो तूने डाला है, मिट्टी भी ठीक है। फिर यह सूखा कैसे?"
शेख चिल्ली ने बहुत ही मासूमियत से जवाब दिया, "काका! मैं पानी तो देता ही था, साथ में मैं हर सुबह इस पौधे को 'ज़मीन से उखाड़कर' यह भी देखता था कि इसकी जड़ें कितनी बड़ी हुई हैं। जब जड़ें देख लेता था, तो वापस गाड़ देता था। फिर भी यह बड़ा नहीं हुआ!"
यह सुनते ही किसान ने अपना सिर पकड़ लिया। उसे समझ नहीं आया कि इस इंसान की बेवकूफी पर हँसे या गुस्सा करे।
किसान ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "अरे दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़! पेड़-पौधे शांति और धैर्य से बड़े होते हैं। जड़ें मिट्टी के अंदर अपनी जगह बनाती हैं। तू जब हर रोज़ उसे उखाड़ लेता था, तो बेचारी जड़ें मिट्टी से भोजन और पानी कैसे लेतीं? तूने देखभाल के नाम पर अपने ही हाथों से अपने पौधे का कत्ल कर दिया है!"
शेख चिल्ली की आँखें खुली की खुली रह गईं। उसे अब जाकर समझ आया कि हर चीज़ को बार-बार कुरेद कर देखने से वह बड़ी नहीं होती, बल्कि बर्बाद हो जाती है। उस दिन के बाद शेख चिल्ली ने कभी खेती या बागीचे का काम नहीं किया।
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