भाग 29: वानर सेना की प्रतीक्षा, मधुवन का आनंद और श्रीराम को चूड़ामणि अर्पण

समुद्र के उत्तरी तट पर युवराज अंगद, भालूराज जाम्बवंत और पूरी वानर सेना अत्यंत निराशा के अंधकार में डूबी हुई थी। हनुमान जी को गए हुए लंबा समय बीत चुका था। सुग्रीव द्वारा दी गई एक मास की अवधि तो पहले ही समाप्त हो चुकी थी, और अब हनुमान जी के न लौटने से वानरों को लगने लगा था कि लंका के भयंकर राक्षसों ने अवश्य ही उन्हें मार डाला होगा। अंगद मृत्यु की प्रतीक्षा में प्रायोपवेशन (अनशन) पर बैठे हुए थे।
तभी अचानक, आकाश के उस पार से आती हुई एक भयंकर और उत्साह से भरी गर्जना गूंजी। वह सिंहनाद इतना शक्तिशाली था कि समुद्र की लहरें भी कांप उठीं।
जाम्बवंत तुरंत खड़े हो गए। उनकी आंखों में चमक आ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर अंगद से कहा, "युवराज! उठिए! हमारे हनुमान लौट रहे हैं! और उनकी इस हर्षपूर्ण गर्जना से यह पूर्णतः स्पष्ट है कि राम का कार्य पूर्ण हो गया है। यदि वे असफल होते, तो उनका स्वर इतना ओजस्वी न होता!"
क्षण भर बाद ही हनुमान जी आकाश से एक स्वर्ण उल्कापिंड की भांति धरती पर उतरे। उन्होंने उतरते ही सबसे पहले अपने वृद्ध जाम्बवंत और युवराज अंगद के चरण छुए और फिर सभी को अपने गले से लगा लिया।
वानरों ने जब व्यग्रता से पूछा, तो हनुमान जी ने अत्यंत संक्षेप में बताया, "मैंने माता सीता के दर्शन किए हैं। वे पूर्णतः सुरक्षित हैं।" यह सुनते ही वानर सेना खुशी से पागल हो गई। कोई नाचने लगा, कोई हवा में छलांग लगाने लगा और कोई एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगा।
वहां से पूरी सेना अत्यंत तीव्र गति से किष्किंधा की ओर वायु मार्ग से उड़ी। मार्ग में किष्किंधा की सीमा पर सुग्रीव का एक अत्यंत सुंदर, विशाल और सुरक्षित उपवन था, जिसे 'मधुवन' कहा जाता था। यह उपवन सुग्रीव को प्राणों से भी प्रिय था और वहां किसी को भी जाने की अनुमति नहीं थी।
परंतु आज वानरों का उत्साह चरम पर था। अंगद ने कहा, "आज हमने असंभव कार्य कर दिखाया है। आज उत्सव का दिन है।" अंगद की आज्ञा पाकर पूरी वानर सेना मधुवन में घुस गई। उन्होंने पेड़ों से मीठे फल तोड़े, मधु (शहद) के विशाल छत्ते निचोड़ कर पिए और खुशी में पेड़ों को तोड़ने लगे।
जब मधुवन के रक्षक 'दधिमुख' (जो सुग्रीव के मामा थे) ने वानरों को रोकने का प्रयास किया, तो वानरों ने उन्हें भी पीट-पीट कर भगा दिया। दधिमुख लहूलुहान अवस्था में रोते हुए राजमहल में सुग्रीव के पास पहुँचे और शिकायत की, "महाराज! अंगद और हनुमान के दल ने आपके प्रिय मधुवन को उजाड़ दिया है और हमें बहुत पीटा है!"
दधिमुख की बात सुनकर लक्ष्मण क्रोधित होने लगे, परंतु सुग्रीव के मुख पर एक चौड़ी मुस्कान आ गई। सुग्रीव अपने आसन से उठ खड़े हुए और बोले, "मामा! वानर यह उद्दंडता और निर्भयता तभी दिखा सकते हैं जब उन्हें कोई बहुत बड़ी सफलता मिली हो। यदि वे खाली हाथ लौटते, तो वे सीधे मृत्यु को गले लगाते, मधुवन में उत्सव नहीं मनाते। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उन्होंने सीता माता को खोज लिया है!"
सुग्रीव ने तुरंत दधिमुख को आदेश दिया कि वह ससम्मान पूरे दल को राजसभा में बुला लाए।
किष्किंधा के बाहर एक शिला पर श्रीराम और लक्ष्मण व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी अंगद के नेतृत्व में वानर सेना वहां पहुँची। हनुमान जी सबसे आगे आए और उन्होंने साष्टांग दंडवत करते हुए श्रीराम के चरणों में अपना सिर रख दिया।
श्रीराम का धैर्य अब जवाब दे चुका था। उन्होंने अत्यंत व्यग्रता और भर्राए हुए गले से पूछा, "हे हनुमान! उठो! मुझे सत्य बताओ, क्या मेरी सीता जीवित है? वह किस हाल में है? वह मेरे बिना राक्षसों के बीच कैसे सांस ले रही है?"
हनुमान जी ने अपनी आंखों में आंसू भरकर माता सीता की उस मलिन, कृशकाय (कमजोर) और उदास अवस्था का पूरा मनोवैज्ञानिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कैसे रावण उन्हें नित्य डराता है, कैसे वे एक सूखी टहनी के समान अशोक वृक्ष के नीचे बैठी रहती हैं, और कैसे सीता माता केवल राम-नाम के सहारे जीवित हैं।
इसके पश्चात, हनुमान जी ने अपने वस्त्रों में से सीता माता द्वारा दी गई वह दिव्य 'चूड़ामणि' (बालों का आभूषण) निकाली और उसे अत्यंत आदर के साथ श्रीराम के हाथों में रख दिया।
अपनी प्रिय पत्नी के उस पवित्र आभूषण को देखते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का सारा संयम और कठोरता टूट गई। उन्होंने उस चूड़ामणि को अपने सीने से लगा लिया और एक साधारण मनुष्य की भांति फूट-फूट कर रोने लगे। वह आभूषण राम के लिए केवल एक पत्थर नहीं था; वह सीता के स्पर्श, उनके वियोग और उनके प्रेम का जीवंत प्रतीक था। श्रीराम को ऐसा लगा मानो सीता स्वयं छटपटाती हुई उनके हाथों में आ गई हों।
श्रीराम ने आंसू पोंछते हुए हनुमान जी को अपने गले से कसकर लगा लिया। उनका कंठ गदगद हो गया। उन्होंने अत्यंत भावुक स्वर में कहा:
"हे हनुमान! तुमने जो कार्य किया है, वह तीनों लोकों में कोई देवता भी नहीं कर सकता था। तुमने मेरी सीता का समाचार लाकर मुझे आज एक नया जीवन दिया है। मैं तुम्हारा यह ऋण कई जन्मों तक नहीं चुका सकता। मेरे पास तुम्हें देने के लिए मेरे इस आलिंगन (गले लगाने) के सिवा और कुछ भी नहीं है।"
हनुमान जी अपने स्वामी के इन वचनों को सुनकर और उनका स्पर्श पाकर उनके चरणों से लिपट गए। उनका जीवन सफल हो चुका था।
अब सीता माता का निश्चित पता चल चुका था। राम की आंखों में विरह के जो आंसू थे, वे अब एक भयंकर और प्रलयंकारी युद्ध के संकल्प में बदल चुके थे। श्रीराम ने सुग्रीव और अंगद की ओर देखा। अब समय आ गया था करोड़ों वानरों की सेना को लेकर दक्षिण सागर के उस अथाह तट पर कूच करने का, जहाँ रावण के साम्राज्य और श्रीराम की मर्यादा के बीच इतिहास का सबसे बड़ा महायुद्ध लड़ा जाने वाला था।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
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