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🏹 रामायण

भाग 30: श्रीराम का महा-प्रयाण, दक्षिण सागर तट पर पड़ाव और रावण की राजसभा

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 30: श्रीराम का महा-प्रयाण, दक्षिण सागर तट पर पड़ाव और रावण की राजसभा

चूड़ामणि के दर्शन और हनुमान जी द्वारा लाए गए सीता माता के समाचार ने श्रीराम के भीतर एक अद्भुत परिवर्तन ला दिया था। अब तक उनके हृदय में जो विरह और शोक की अग्नि जल रही थी, उसने अब एक भयंकर और प्रलयंकारी दावानल (जंगल की आग) का रूप ले लिया था। श्रीराम के एक-एक रोम में अब रावण के विनाश और धर्म की स्थापना का संकल्प धधक रहा था।

श्रीराम ने अपनी आंखों के आंसू पोंछे, अपने दिव्य धनुष को उठाया और सुग्रीव की ओर अत्यंत दृढ़ता से देखकर गर्जना की:

"मित्र सुग्रीव! अब एक क्षण का भी विलंब उचित नहीं है। मेरी सीता वहां एक-एक पल गिनकर सांस ले रही है। आकाश में सूर्य मध्य में है, और आज 'अभिजित मुहूर्त' (विजय का सबसे शुभ समय) है। इसी क्षण सेना को कूच करने का आदेश दो!"

सुग्रीव की आज्ञा पाते ही किष्किंधा के सेनापतियों ने युद्ध के नगाड़े और भयंकर शंख बजा दिए। नील, नल, जाम्बवंत, हनुमान और अंगद जैसे महाबलियों के नेतृत्व में वानरों और भालुओं की वह अनंत सेना दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ी।

उस सेना का आकार और वेग इतना विशाल था कि उसकी कल्पना करना भी मनुष्य के लिए असंभव है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, इस सेना में असंख्य (करोड़ों-अरबों) वानर और भालू थे। जब यह महासेना चली, तो उनके चरणों की धूल से आसमान ढक गया और दिन में ही ऐसा अंधकार छा गया मानो सूर्य छिप गया हो। उनके सिंहनाद और किलकारियों से दिशाएं कांपने लगीं। जो पर्वत उनके मार्ग में आते, वे वानरों के पैरों के प्रहार से चूर-चूर होकर धूल बन जाते। उनका वेग इतना प्रचंड था कि नदियां उल्टी बहने लगतीं।

श्रीराम पवनपुत्र हनुमान के चौड़े कंधों पर और लक्ष्मण युवराज अंगद के कंधों पर सवार होकर इस विशाल सेना का नेतृत्व कर रहे थे। वन, पहाड़ और घाटियों को पार करते हुए, अंततः यह महासेना बिना रुके दक्षिण दिशा के अंतिम छोर पर पहुँच गई।

उनके सामने अब अनंत, अथाह और भयंकर 'महोदधि' (हिंद महासागर) लहरें मार रहा था। समुद्र का उफान आकाश को छू रहा था और उसके भीतर के भयंकर जलचर (मगरमच्छ, तिमिंगल मछलियां) जल की सतह पर उछल रहे थे। वानर सेना ने सागर के उत्तरी तट पर अपना डेरा डाल दिया। सेना का विस्तार इतना अधिक था कि समुद्र का किनारा भी छोटा पड़ गया। अब राम की सेना लंका के बिल्कुल सामने, मृत्यु के एक महासागर के इस पार खड़ी थी।

उधर लंका में: हनुमान जी द्वारा महाभयंकर लंका दहन के बाद से ही लंका के राक्षसों के मन में एक गहरा मनोवैज्ञानिक भय बैठ गया था। जो रावण कल तक देवताओं को डराता था, आज उसकी प्रजा छिपकर कानाफूसी कर रही थी कि "जिस वनवासी राम के एक साधारण से दूत वानर ने हमारी अजेय लंका को राख कर दिया, जब वह राम स्वयं अपना धनुष लेकर यहाँ आएगा, तो हमारा क्या होगा?" जब रावण के गुप्तचरों ने उसे यह सूचना दी कि राम अपनी करोड़ों वानरों की सेना के साथ समुद्र के उस पार आ डटे हैं, तो रावण को भी भीतर ही भीतर अपनी भूल का आभास होने लगा, परंतु उसका अहंकार सत्य स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

रावण ने तुरंत अपनी राजसभा बुलाई। रावण अपने ऊंचे स्वर्ण सिंहासन पर बैठा, परंतु आज उसके मुख पर वह पुराना तेज नहीं था। उसने अत्यंत अहंकार का नाटक करते हुए अपने मंत्रियों से कहा:

"हे राक्षसों! वह वनवासी राम एक साधारण वानरों की सेना लेकर समुद्र के तट पर आ गया है। यद्यपि वह सौ योजन का समुद्र पार करके लंका तक नहीं पहुँच सकता, फिर भी एक राजा होने के नाते हमें अपनी रक्षा और युद्ध की योजना बनानी चाहिए। तुम सब अपने विचार रखो।"

रावण के दरबार में केवल वे ही लोग थे जो उसकी हां में हां मिलाते थे (चापलूस)। प्रहस्त, महोदर, और स्वयं रावण का पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) अपनी-अपनी वीरता की झूठी डींगें हांकने लगे।

सेनापति प्रहस्त ने सीना ठोक कर कहा, "महाराज! उस वानर (हनुमान) ने हमें धोखे में डाल दिया था और वह सोते हुए नगर में आग लगाकर भाग गया। यदि वह मेरे सामने आता, तो मैं उसे जीवित नहीं छोड़ता।"

मेघनाद ने अत्यंत घमंड में अपना धनुष उठाते हुए कहा, "पिताजी! आप आज्ञा दें, मैं कल ही अकेला जाकर समुद्र के उस पार राम, लक्ष्मण और उस पूरी वानर सेना का रक्त पीकर लौटूँगा। हमने इंद्र और कुबेर को धूल चटाई है, एक साधारण मनुष्य से इतना भय कैसा?"

रावण इन चापलूस मंत्रियों की बातें सुनकर अपनी मूंछों पर ताव दे रहा था। वह यही सुनना चाहता था। परंतु इसी राजसभा में एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा था, जिसे सत्य दिख रहा था और जो रावण के इस झूठे अहंकार को तोड़ने वाला था। वह व्यक्ति रावण का सबसे छोटा भाई—'विभीषण' था।

🎉 कहानी समाप्त

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