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🏹 रामायण

भाग 28: पूंछ का चमत्कार, महाभयंकर लंका दहन और माता सीता से अंतिम विदा

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 28: पूंछ का चमत्कार, महाभयंकर लंका दहन और माता सीता से अंतिम विदा

रावण की राजसभा में जब यह क्रूर और उपहासपूर्ण आदेश गूंजा कि इस वानर की पूंछ में आग लगा दी जाए, तो राक्षसों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने तालियां पीटीं और तुरंत रस्सियां, तेल और पुराने कपड़े मंगवाए।

राक्षस हंसते हुए हनुमान जी की पूंछ पर कपड़ा लपेटने लगे। परंतु यहाँ हनुमान जी ने अपनी एक अद्भुत और चमत्कारी लीला रची। जैसे-जैसे राक्षस उनकी पूंछ पर कपड़ा लपेटते, हनुमान जी अपनी पूंछ को और लंबा करते जाते। राक्षस कपड़ा लाते-लाते थक गए। देखते ही देखते लंका का सारा कपड़ा, सारा सूत, सारा तेल और सारा घी समाप्त हो गया, परंतु हनुमान जी की पूंछ बढ़ती ही जा रही थी। नगर के लोग इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए छतों और छज्जों पर जमा हो गए।

अंततः, थके-हारे राक्षसों ने जैसे-तैसे उस विशालकाय पूंछ के अंतिम सिरे पर आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही राक्षस ढोल-नगाड़े पीटने लगे। उन्होंने हनुमान जी को रस्सियों से कसकर बांधा और लंका की सड़कों पर घुमाने लगे ताकि पूरी लंका इस रामदूत का अपमान देख सके।

यह अशुभ समाचार हवा की तरह उड़ता हुआ अशोक वाटिका में बैठी माता सीता तक भी पहुँच गया। जब राक्षसियों ने ताना मारते हुए सीता जी को बताया कि तुम्हारे राम के उस वानर दूत की पूंछ में आग लगा दी गई है, तो सीता जी का हृदय तड़प उठा। वे घबराहट से कांपने लगीं। एक पवित्र और पतिव्रता स्त्री के पास उस समय ईश्वर की प्रार्थना के अतिरिक्त कोई अस्त्र नहीं था। वे तुरंत उठीं और अत्यंत आर्त (दुखी) भाव से हाथ जोड़कर साक्षात अग्नि देव की स्तुति करने लगीं:

"सुनहु देव सचराचर स्वामी! प्रनतपाल उर अंतरजामी॥" (अर्थात: हे चराचर जगत के स्वामी अग्नि देव! यदि मन, वचन और कर्म से मेरे भीतर अपने पति श्रीराम के प्रति सच्ची निष्ठा है, यदि मैंने कभी धर्म का उल्लंघन नहीं किया है, तो आप मेरे इस पुत्र हनुमान के लिए अत्यंत शीतल (बर्फ के समान ठंडे) हो जाइए।)

माता सीता के इस महान सतित्व और करुण प्रार्थना का प्रभाव यह हुआ कि चमत्कार घटित हो गया। हनुमान जी की पूंछ में भयंकर आग धधक रही थी, उसकी लपटें आकाश को छू रही थीं, परंतु हनुमान जी को ऐसा लग रहा था मानो उनकी पूंछ पर किसी ने चंदन का लेप लगा दिया हो या बर्फ रगड़ दी हो। आग प्रकाश तो दे रही थी, परंतु उसमें तनिक भी जलन या ताप नहीं था।

अब हनुमान जी समझ गए कि राक्षसों का खेल समाप्त करने और रावण को अपनी शक्ति का वास्तविक और प्रलयंकारी परिचय देने का समय आ गया है।

उन्होंने एक झटके में अपना शरीर अत्यंत सूक्ष्म (छोटा) किया। शरीर छोटा होते ही उन्हें जकड़े हुए सारे बंधन और रस्सियां ढीली होकर धरती पर गिर पड़ीं। इसके अगले ही क्षण उन्होंने एक भयंकर गर्जना की और अपना शरीर बादलों को छूने वाले एक विशाल और भयानक सुमेरु पर्वत के समान कर लिया। उनके इस अचानक रूप परिवर्तन से राक्षस घबराकर एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए इधर-उधर भागने लगे।

अपनी धधकती हुई विशाल पूंछ को हवा में किसी मृत्यु के कोड़े की तरह लहराते हुए हनुमान जी सीधे रावण के ऊंचे स्वर्ण महलों की छतों पर जा कूदे। एक छत से दूसरी छत, एक महल से दूसरे महल... हनुमान जी जिस भी भवन पर कूदते, अपनी पूंछ से उसे आग लगा देते। उसी समय पवन देव (हनुमान जी के पिता) ने भी अपने पुत्र की सहायता के लिए अत्यंत भयंकर और तेज हवाएं चलानी शुरू कर दीं, जिसने आग को और भड़का दिया।

देखते ही देखते रावण की वह अजेय स्वर्ण लंका लपटों से घिर गई। रात का अंधकार उस भयंकर आग की रोशनी से दिन में बदल गया। बहुमूल्य रत्न, मणियां और सोने के खंभे पिघल-पिघल कर सड़कों पर लावा बनकर बहने लगे। रावण के अजेय सेनापतियों और मंत्रियों के महल जलकर राख होने लगे। राक्षस, उनकी रानियां और बच्चे प्राण बचाकर त्राहि-त्राहि करते हुए भागने लगे।

हनुमान जी ने रावण का वह संपूर्ण अहंकार, जो उस स्वर्ण लंका के रूप में खड़ा था, उसे कुछ ही प्रहरों में एक धधकते हुए श्मशान में बदल दिया। परंतु इस महाविनाश के बीच भी हनुमान जी ने अपने विवेक और धर्म को नहीं छोड़ा। उन्होंने पूरी लंका को भस्म कर दिया, परंतु विभीषण के उस भवन को तनिक भी आंच नहीं आने दी, जिसके द्वार पर राम का नाम लिखा था।

लंका को पूरी तरह भस्म करने के पश्चात, हनुमान जी छलांग लगाकर समुद्र के तट पर गए और वहां जल में अपनी पूंछ की अग्नि को शांत किया।

लंका से प्रस्थान करने से पूर्व, वे एक अंतिम बार अशोक वाटिका गए और माता सीता के चरणों में प्रणाम किया। सीता जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और रोते हुए कहा, "पुत्र! मेरे राम से कहना कि उनका धैर्य अब मेरे प्राणों का शत्रु बन रहा है। यदि वे एक महीने के भीतर मुझे यहाँ से मुक्त कराने नहीं आए, तो वे अपनी जानकी को जीवित नहीं पाएंगे।"

माता के इन करुण वचनों को अपने हृदय में गहराई से उतारकर, हनुमान जी उसी अरिष्ट पर्वत की चोटी पर गए और "जय श्रीराम" का भयंकर सिंहनाद करते हुए आकाश में उड़ चले। लंका पीछे धधक रही थी, और राम का दूत विजय की ओर लौट रहा था।

🎉 कहानी समाप्त

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