भाग 13: शूर्पणखा का अपमान, खर-दूषण वध और सीता हरण का षड्यंत्र

पंचवटी के उस शांत और सुंदर वन में एक दिन लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा घूमते हुए आ निकली। वह स्वभाव से अत्यंत क्रूर और दिखने में भयंकर राक्षसी थी। परंतु जब उसने पर्णकुटी के बाहर एक शिला पर बैठे हुए श्रीराम के अलौकिक और मनमोहक रूप को देखा, तो वह उन पर बुरी तरह मोहित हो गई।
अपने राक्षसी रूप को छिपाकर, उसने अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और श्रीराम के पास जाकर विवाह का प्रस्ताव रखा। उसने कहा, "हे वीर! मेरे समान इस वन में कोई सुंदरी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पुरुष नहीं। हम दोनों की जोड़ी सबसे उत्तम रहेगी।"
श्रीराम ने मुस्कुराते हुए देवी सीता की ओर संकेत किया और विनोदपूर्ण (मज़ाकिया) स्वर में कहा, "हे सुंदरी! मेरा विवाह तो हो चुका है और मेरी पत्नी मेरे साथ है। तुम मेरे छोटे भाई लक्ष्मण के पास जाओ। शायद वह तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार कर ले।"
शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई। लक्ष्मण ने भी व्यंग्य करते हुए कहा, "मैं तो स्वयं मेरे भैया का दास हूँ। मुझसे विवाह करके तुम भी दासी बन जाओगी। तुम वापस उन्हीं के पास जाओ और उनसे हठ करो।"
जब दोनों भाइयों ने इस प्रकार उसका उपहास किया, तो शूर्पणखा अपने असली भयंकर राक्षसी रूप में आ गई। क्रोध में अंधी होकर वह माता सीता को खाने के लिए झपटी। श्रीराम ने तुरंत लक्ष्मण की ओर देखा। लक्ष्मण ने बिजली की गति से अपनी तलवार निकाली और शूर्पणखा की नाक और कान काट डाले।
खून से लथपथ शूर्पणखा भयंकर चीत्कार करती हुई अपने भाइयों—खर और दूषण—के पास 'जनस्थान' (दंडक वन का ही एक भाग) में पहुँची। अपनी बहन की यह दुर्दशा देखकर खर और दूषण क्रोध से पागल हो गए। उन्होंने तुरंत अपनी चौदह हज़ार (14,000) राक्षसों की विशाल सेना तैयार की और श्रीराम पर आक्रमण करने निकल पड़े।
श्रीराम ने जब राक्षसों की सेना को आते देखा, तो लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे सीता को लेकर पास की एक सुरक्षित गुफा में चले जाएं। श्रीराम अकेले ही अपना दिव्य धनुष लेकर उस विशाल सेना के सामने खड़े हो गए। जब राक्षसों ने चारों ओर से तीरों, भालों और गदाओं की वर्षा की, तब श्रीराम ने अपने अचूक अस्त्रों का संधान किया।
श्रीराम के बाणों की गति इतनी तीव्र थी कि राक्षसों को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि राम कब तरकश से बाण निकालते हैं, कब धनुष पर चढ़ाते हैं और कब छोड़ते हैं। आसमान बाणों से ढक गया। देखते ही देखते, केवल डेढ़ प्रहर (लगभग साढ़े चार घंटे) के भीतर श्रीराम ने खर, दूषण, त्रिशिरा और पूरी 14,000 राक्षसों की सेना का अकेले ही विनाश कर दिया।
इस भयंकर युद्ध में केवल एक राक्षस—अकम्पन—जीवित बचा, जो किसी तरह छिपकर लंका पहुँच गया और उसने रावण को यह समाचार दिया। कुछ ही समय बाद शूर्पणखा भी विलाप करती हुई रावण की राजसभा में पहुँच गई।
रावण को अपनी शक्ति पर अत्यंत अहंकार था। उसने शूर्पणखा से कहा, "किसकी इतनी हिम्मत हुई जिसने मेरी बहन का यह हाल किया?"
शूर्पणखा ने रावण को उकसाते हुए कहा, "राम और लक्ष्मण अत्यंत पराक्रमी हैं। उन्होंने खर-दूषण की पूरी सेना को नष्ट कर दिया है, तुम युद्ध में उन्हें नहीं जीत सकते। लेकिन रावण, राम की पत्नी सीता इतनी सुंदर है कि वह तीनों लोकों की सबसे सुंदर स्त्री है। वह तो तुम्हारी रानी होनी चाहिए। यदि तुम छल से उसका हरण कर लो, तो राम उसके वियोग में तड़प-तड़प कर खुद ही मर जाएगा।"
रावण अत्यंत कामी और अहंकारी था। 'सीता की सुंदरता' का वर्णन सुनकर उसके भीतर कामुकता और प्रतिशोध दोनों की आग भड़क उठी। उसने तुरंत अपने पुष्पक विमान पर सवार होकर समुद्र पार किया और सीधे अपने मामा 'मारीच' के आश्रम पहुँचा। (मारीच वही राक्षस था जिसे श्रीराम ने विश्वामित्र के यज्ञ में बिना फल वाले बाण से सौ योजन दूर फेंक दिया था)।
रावण ने मारीच से कहा, "मामा! तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी। तुम अपनी माया से एक अद्भुत सोने का हिरण (स्वर्ण मृग) बन जाओ और राम की कुटिया के पास जाकर सीता को मोहित करो। जब राम तुम्हें पकड़ने पीछे आएंगे, तब मैं सीता का हरण कर लूँगा।"
मारीच राम के बाण का प्रहार पहले ही सह चुका था। वह राम का नाम सुनते ही कांप उठा। उसने रावण को बहुत समझाया कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात काल हैं, उनसे शत्रुता मत लो। परंतु रावण नहीं माना और उसने तलवार निकालकर मारीच को मारने की धमकी दी।
मारीच ने सोचा कि इस दुष्ट रावण के हाथों मरने से अच्छा है कि मैं भगवान राम के बाणों से मृत्यु पाकर स्वर्ग प्राप्त करूँ। विवश होकर मारीच को रावण के इस नीच और विनाशकारी षड्यंत्र का हिस्सा बनना पड़ा।
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