दरवाज़े की रखवाली

शेख चिल्ली को जब भी कोई काम सौंपा जाता, तो वह शब्दों का बिल्कुल सीधा अर्थ (Literal meaning) निकालता था।
एक दिन शेख चिल्ली की अम्मी को किसी ज़रूरी काम से पास के गाँव जाना था। घर में शेख चिल्ली अकेला था। अम्मी जानती थीं कि शेख चिल्ली बहुत लापरवाह है, इसलिए जाने से पहले उन्होंने उसे बहुत ही सख्ती से समझाया।
"देख शेख! मैं शाम तक लौट आऊँगी। तू कहीं बाहर आवारागर्दी करने मत चले जाना। घर में बहुत सारा कीमती सामान और अनाज रखा है। जब तक मैं न आऊँ, तू घर के 'दरवाज़े की अच्छी तरह रखवाली करना'। इस दरवाज़े पर अपनी नज़र गड़ाए रखना, समझ गया?" अम्मी ने कहा।
शेख चिल्ली ने सीना तानकर कहा, "अम्मी, आप बिल्कुल बेफिक्र होकर जाइए! जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इस 'दरवाज़े' को कोई हाथ भी नहीं लगा सकेगा।"
अम्मी के जाने के कुछ घंटों बाद, गाँव के चौराहे पर से एक बहुत ही बड़ी और शानदार 'बारात' गुज़रने लगी। बारात में ज़ोर-ज़ोर से ढोल-नगाड़े बज रहे थे और लोग नाच रहे थे।
शेख चिल्ली को बारात देखने का और नाचने का बहुत शौक था। ढोल की आवाज़ सुनकर उसके पैर थिरकने लगे। उसका मन किया कि वह भी जाकर बारात का मज़ा ले।
लेकिन फिर उसे अपनी अम्मी का आदेश याद आया— "दरवाज़े की रखवाली करना!"
शेख चिल्ली ने सोचा: "अम्मी ने मुझे 'दरवाज़े' की रखवाली करने को कहा है, घर की नहीं। अगर मैं दरवाज़े को यहीं छोड़कर बारात देखने चला गया, तो पीछे से कोई इस दरवाज़े को चुरा कर ले जाएगा। लेकिन अगर मैं इस दरवाज़े को ही अपने साथ लेकर बारात में चला जाऊँ, तो मैं बारात भी देख लूँगा और 'दरवाज़े की रखवाली' भी हो जाएगी!"
क्या शानदार विचार था! शेख चिल्ली ने तुरंत घर का वह भारी लकड़ी का मुख्य दरवाज़ा उसके कब्ज़ों से उखाड़ लिया। उसने वह भारी दरवाज़ा अपने सिर पर रखा और खुशी-खुशी बारात देखने के लिए चौराहे की तरफ चल दिया।
पीछे से शेख चिल्ली का पूरा घर बिना दरवाज़े के एकदम 'खुला' रह गया था।
उसी दोपहर को गाँव के कुछ चोर उस रास्ते से गुज़रे। उन्होंने देखा कि शेख चिल्ली के घर का तो दरवाज़ा ही गायब है और घर पूरा खुला पड़ा है। चोरों की तो जैसे लॉटरी लग गई। वे मजे से घर में घुसे और घर का सारा सोना, पैसे, अनाज और बर्तन लेकर फरार हो गए।
शाम को जब शेख चिल्ली की अम्मी घर लौटीं, तो घर का दरवाज़ा गायब देखकर उनके होश उड़ गए। अंदर गईं तो देखा कि पूरा घर लुट चुका है।
तभी शेख चिल्ली सिर पर वह 'भारी दरवाज़ा' उठाए, पसीने से लथपथ होकर घर पहुँचा।
अम्मी ने अपना माथा पीटते हुए कहा, "अरे दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख! यह तूने क्या किया? तूने पूरा घर लुटवा दिया! मैंने तुझे घर की रखवाली करने को कहा था!"
शेख चिल्ली ने दरवाज़ा ज़मीन पर रखते हुए बहुत ही मासूमियत से जवाब दिया: "अम्मी! आप बेवजह मुझ पर गुस्सा कर रही हैं। आपने जाते वक्त मुझे 'घर' की नहीं, बल्कि इस 'दरवाज़े' की रखवाली करने को कहा था। देखिए, चोर घर का फालतू सामान भले ही ले गए हों, लेकिन आपके इस 'दरवाज़े' को कोई खरोंच तक नहीं आई है। मैं इसकी जान की बाज़ी लगाकर रखवाली कर रहा था!"
अम्मी यह तर्क सुनकर अपना सिर दीवार पर मारने के अलावा और कुछ नहीं कर सकीं।
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