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😄 शेखचिल्ली

गर्म खीर और चोर

लोक परंपरा4 मिनट का पठन
गर्म खीर और चोर

एक बार सर्दियों की रात में शेख चिल्ली किसी काम से दूसरे गाँव से लौट रहा था। रास्ते में उसे चार खूँखार चोर मिल गए, जो किसी अमीर सेठ के घर डकैती डालने जा रहे थे।

चोरों ने सोचा कि यह आदमी हमें देखकर पुलिस को न बता दे, इसलिए उन्होंने शेख चिल्ली को डरा-धमका कर अपने साथ ही ले लिया। चोरों के सरदार ने कहा, "चुपचाप हमारे पीछे चलता आ। जब हम घर में घुसेंगे, तो तू बस बाहर खड़े होकर पहरेदारी करना और बिल्कुल आवाज़ मत करना।"

चोर सेठ के घर की दीवार फाँदकर अंदर घुस गए। शेख चिल्ली भी उनके पीछे-पीछे घर के आँगन में आ गया। चोर सेठ के कमरों में सोने-चाँदी के ज़ेवर और तिजोरी ढूँढने लगे।

शेख चिल्ली को चोरी से कोई मतलब नहीं था, उसे तो बस ज़ोरों की 'भूख' लग रही थी। वह दबे पाँव सेठ की रसोई में चला गया।

रसोई में चूल्हे पर एक बहुत ही बड़े पतीले में गाढ़ी, मीठी और 'गरमा-गरम खीर' रखी हुई थी। खीर की खुशबू से शेख चिल्ली के मुँह में पानी आ गया। उसने एक बड़ा सा कटोरा उठाया, उसे खीर से भरा और मज़े से खाने लगा।

खाते-खाते शेख चिल्ली की नज़र रसोई के बाहर आँगन में पड़ी। वहाँ सेठ की एक बहुत ही बूढ़ी माँ ज़मीन पर एक चटाई बिछाकर सो रही थी।

सर्दी का मौसम था, इसलिए उस बूढ़ी औरत ने ठंड से बचने के लिए अपने 'दोनों हाथों को आपस में जोड़कर (अंजलि बनाकर)' अपने सीने से लगा रखा था, ताकि गर्माहट मिल सके।

शेख चिल्ली का दिल बहुत नर्म था। उसने जब उस बूढ़ी औरत को दोनों हाथ जोड़े हुए देखा, तो उसे लगा कि बेचारी बुढ़िया भूख के मारे अपने हाथ फैलाकर उससे 'खीर माँग रही है'!

शेख चिल्ली ने दया भाव से सोचा: "बेचारी अम्मा! कितनी भूखी है। नींद में भी इसके हाथ खीर माँगने के लिए फैले हुए हैं। मैं अकेला खीर कैसे खा सकता हूँ? मुझे इसे भी खीर देनी चाहिए।"

शेख चिल्ली ने तुरंत उस खौलते हुए पतीले में से एक बड़ा सा कटोरा भरकर उबलती हुई 'गरमा-गरम खीर' निकाली। वह दबे पाँव उस सोती हुई बुढ़िया के पास पहुँचा और उसने वह पूरी की पूरी खौलती हुई खीर बुढ़िया के उन 'जुड़े हुए हाथों' में उड़ेल दी!

खौलती हुई खीर जैसे ही बुढ़िया के हाथों और सीने पर गिरी, बुढ़िया दर्द के मारे तिलमिला उठी।

"हाय रे! जल गई! बचाओ! चोर! चोर!" बुढ़िया ने अपनी पूरी ताक़त से चीखना शुरू कर दिया।

बुढ़िया की भयानक चीखें सुनकर पूरे घर के लोग जाग गए। उन्होंने लालटेन जलाई और लाठियाँ लेकर आँगन में आ गए।

अंदर कमरों में चोरी कर रहे चोरों ने जब यह शोर सुना, तो उनके पसीने छूट गए। वे अपना सारा सामान वहीं छोड़कर, दीवार फाँदकर अपनी जान बचाने के लिए ऐसे भागे कि उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

घर के लोगों ने रसोई में आराम से खीर खाते हुए शेख चिल्ली को पकड़ लिया।

सेठ ने गुस्से से शेख को लाठी दिखाते हुए पूछा, "अरे चोर! तूने मेरी माँ पर यह खौलती हुई खीर क्यों डाली?"

शेख चिल्ली ने बहुत ही मासूमियत से कटोरा चाटते हुए जवाब दिया, "सेठ जी! आप मुझे चोर क्यों कह रहे हैं? मैं तो बड़ा नेक इंसान हूँ। आपकी अम्मा भूख के मारे दोनों हाथ फैलाकर मुझसे खीर माँग रही थी, तो मैंने बस थोड़ी सी खीर उनके हाथों में डाल दी। इसमें मेरी क्या गलती है?"

सेठ को समझ नहीं आया कि वह इस मूर्ख इंसान पर गुस्सा करे या इसके भोलेपन पर हँसे। अंत में, शेख चिल्ली की इस बेवकूफी के कारण ही सही, लेकिन सेठ का घर चोरी होने से बच गया था, इसलिए उन्होंने शेख चिल्ली को बिना पीटे घर से बाहर निकाल दिया।

🎉 कहानी समाप्त

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