"धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का"

'चंदनपुर' गाँव में 'रंगीला' नाम का एक आदमी रहता था। रंगीला बहुत ही चालाक, लालची और बिना पेंदे के लोटे जैसा इंसान था। उसका अपना कोई ईमान नहीं था; जहाँ उसे ज़्यादा पैसे या फायदा दिखता, वह उसी तरफ लुढ़क जाता था।
एक बार गाँव के दो बड़े किसानों— 'रामदीन' और 'शामदीन' — के बीच खेत की मेड़ को लेकर बहुत भयंकर झगड़ा हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि मामला गाँव की पंचायत में पहुँच गया।
उस दिन रंगीला वहीं खेत के पास मौजूद था और उसने सब कुछ देखा था, इसलिए पंचायत ने उसे 'मुख्य गवाह' के रूप में बुलाया।
लालच का खेल: रंगीला ने सोचा कि यह पैसे कमाने का बहुत अच्छा मौका है। पंचायत से एक रात पहले, वह चुपके से रामदीन के घर गया। रंगीला ने कहा: "रामदीन भाई! अगर तुम मुझे 500 रुपये दो, तो मैं कल पंचायत में सारा दोष शामदीन पर मढ़ दूँगा और गवाही तुम्हारे पक्ष में दूँगा।" रामदीन अपनी ज़मीन बचाना चाहता था, इसलिए उसने तुरंत 500 रुपये रंगीला की जेब में डाल दिए।
वहाँ से निकलकर रंगीला का लालच और बढ़ गया। वह अँधेरे का फायदा उठाकर दूसरे किसान 'शामदीन' के घर पहुँच गया। वहाँ जाकर उसने कहा: "शामदीन काका! रामदीन तो तुम्हें फँसाना चाहता है, लेकिन अगर तुम मुझे 500 रुपये दो, तो मैं पंचायत में गवाही दूँगा कि गलती रामदीन की थी।" शामदीन ने भी डर के मारे उसे 500 रुपये दे दिए।
रंगीला बहुत खुश था। उसने सोचा कि कल वह पंचायत में कोई गोल-मोल बात कह देगा, जिससे दोनों खुश रहें और उसके 1000 रुपये पक्के हो जाएँ।
पंचायत का फैसला और पर्दाफाश: अगले दिन चौपाल पर पंचायत बैठी। सरपंच ने रंगीला को आगे बुलाया और कड़क आवाज़ में पूछा: "रंगीला! कल खेत पर क्या हुआ था? सच-सच बताना, गलती किसकी थी?"
रंगीला घबरा गया। वह रामदीन की तरफ देखता, तो रामदीन आँखें दिखाता, और शामदीन की तरफ देखता, तो शामदीन उसे घूरता। रंगीला ने हकलाते हुए एक बहुत ही अजीब और उलझा हुआ बयान दिया: "सरपंच जी... गलती तो रामदीन की भी थी... लेकिन शामदीन भी कम नहीं था... मतलब मेड़ खुद टूट गई... और दोनों सही हैं!"
उसकी यह मूर्खतापूर्ण और गोल-मोल बात सुनकर सरपंच को शक हो गया। सरपंच बहुत होशियार था, उसने कड़ाई से पूछताछ की। थोड़ी ही देर में रामदीन और शामदीन का गुस्सा फूट पड़ा। दोनों ने भरी पंचायत में चिल्लाकर बता दिया कि रंगीला ने उन दोनों से गवाही के नाम पर 500-500 रुपये की 'रिश्वत' ली है!
यह सुनते ही सरपंच का पारा चढ़ गया। उसने आदेश दिया: "इस गद्दार और लालची इंसान से दोनों के पैसे वापस छीन लिए जाएँ और इसे गाँव से निकाल दिया जाए!"
रामदीन और शामदीन ने मिलकर रंगीला की खूब धुनाई की और अपने-अपने पैसे उसकी जेब से निकाल लिए। जो रंगीला कल तक दोनों तरफ से पैसे ऐंठने के सपने देख रहा था, आज वह ज़मीन पर पड़ा रो रहा था। न तो रामदीन ने उसे अपना दोस्त माना और न ही शामदीन ने।
गाँव के सरपंच ने उसे दुत्कारते हुए कहा: "रंगीला! जो इंसान चंद पैसों के लिए दोनों तरफ का होने का नाटक करता है, उसका यही हश्र होता है। तुम्हारी हालत तो बिल्कुल उस कहावत जैसी हो गई है— 'धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का!'" (यानी जो कुत्ता घाट और घर के बीच दौड़ता रहता है, उसे न तो घर पर खाना मिलता है और न ही घाट पर कोई उसे पूछता है)।
रंगीला रोता और लंगड़ाता हुआ गाँव से हमेशा के लिए भाग गया।
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