"नौ नकद न तेरह उधार"

व्यापार नगर नाम के एक कस्बे में अनाज के दो बहुत बड़े व्यापारी रहते थे। एक का नाम था 'सेठ धरमचंद' और दूसरे का नाम था 'सेठ करमचंद'। दोनों की दुकानें आमने-सामने थीं, लेकिन दोनों के व्यापार करने का तरीका बिल्कुल अलग था।
सेठ धरमचंद बहुत ही समझदार और व्यावहारिक व्यापारी थे। वे अपना अनाज सस्ते दाम पर बेचते थे, लेकिन वे 'केवल नकद' में व्यापार करते थे। वे किसी को एक रुपये का भी उधार नहीं देते थे।
वहीं दूसरी तरफ, सेठ करमचंद बहुत ही 'लालची' था। उसे ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की सनक थी। वह अपना अनाज बाज़ार से बहुत महँगे दाम पर बेचता था, और अगर किसी के पास नकद पैसे न हों, तो वह बहुत ही ऊँचे ब्याज पर 'उधार' में माल दे देता था। उसे लगता था कि उधार के इस चक्कर से वह बहुत जल्दी करोड़पति बन जाएगा।
ठग व्यापारी का आगमन: एक दिन कस्बे में शहर से एक नया और बहुत ही 'चिकनी-चुपड़ी' बातें करने वाला व्यापारी आया। उसने महंगे कपड़े पहने हुए थे।
वह सबसे पहले सेठ धरमचंद की दुकान पर गया। उसने कहा: "सेठ जी! मुझे 100 बोरी गेहूँ चाहिए। मैं आपको एक बोरी के '13 रुपये' दूँगा, लेकिन मेरे पास अभी नकद नहीं है। मैं सारा पैसा अगले महीने आकर चुका दूँगा (उधार)।"
सेठ धरमचंद ने अपना बही-खाता बंद किया और बहुत ही शांति से कहा: "भाई साहब! आप मुझे भले ही 13 रुपये दें, लेकिन मैं उधार में काम नहीं करता। मैं अपनी बोरी केवल '9 रुपये' में बेचूँगा, लेकिन मुझे पैसा आज ही 'नकद' चाहिए। अगर नकद है तो माल ले जाइए, वरना आगे बढ़िए।"
वह अजनबी व्यापारी मुँह बनाते हुए सेठ करमचंद की दुकान पर चला गया।
लालच का फंदा: जब सेठ करमचंद ने सुना कि वह व्यापारी एक बोरी के '13 रुपये' देने को तैयार है, तो करमचंद की आँखों में लालच के लड्डू फूटने लगे। (बाज़ार का भाव केवल 9 रुपये था, और 13 रुपये बहुत बड़ा मुनाफ़ा था)।
करमचंद ने तुरंत अपने नौकरों को बुलाया और कहा: "जल्दी करो! 100 बोरी गेहूँ इस व्यापारी की बैलगाड़ी में लाद दो।"
उस अजनबी ने करमचंद की बहुत तारीफ की, एक कागज़ पर अपने जाली हस्ताक्षर किए और 100 बोरी गेहूँ उधार लेकर वहाँ से चला गया। करमचंद बहुत खुश था। वह रोज़ अपनी दुकान पर बैठकर उस अजनबी के लौटने और 1300 रुपये का भारी मुनाफ़ा मिलने के सपने देखता रहता था।
एक महीना बीता, दो महीने बीते... लेकिन वह अजनबी व्यापारी कभी लौटकर नहीं आया!
बाद में पता चला कि वह कोई व्यापारी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा 'ठग' था जो पूरे राज्य में उधार माल लेकर भाग जाता था। सेठ करमचंद का सारा अनाज और पैसा डूब गया। वह अपना माथा पीट-पीट कर रोने लगा। वह पूरी तरह से दिवालिया हो गया।
उसी शाम सेठ धरमचंद अपनी दुकान का नकद गल्ला गिन रहे थे, जो कि पैसों से भरा हुआ था।
धरमचंद ने रोते हुए करमचंद से कहा: "करमचंद भाई! व्यापार में ज़्यादा मुनाफ़े का लालच अक्सर इंसान को डुबो देता है। जो पैसा तुम्हारी मुट्ठी में नहीं आया, वह तुम्हारा कैसे हो सकता है? इसीलिए हमारे बुजुर्ग कह गए हैं— 'नौ नकद, न तेरह उधार!' (यानी 13 रुपये उधार में फँसाने से कहीं बेहतर है कि 9 रुपये नकद जेब में रख लिए जाएँ)।"
सेठ करमचंद को अपनी भूल और अपने लालच पर बहुत पछतावा हुआ, लेकिन अब उसकी दुकान खाली हो चुकी थी।
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