"दूर के ढोल सुहावने"

'शांतिपुर' एक बहुत ही हरा-भरा और सुंदर गाँव था। वहाँ ताज़ी हवा, साफ़ पानी, और खेतों की ताज़ी सब्ज़ियाँ खाने को मिलती थीं। इसी गाँव में 'मोहन' नाम का एक नौजवान लड़का रहता था।
मोहन के पिता एक किसान थे और वे चाहते थे कि मोहन खेती में उनका हाथ बँटाए। लेकिन मोहन को गाँव की यह शांत ज़िंदगी बहुत 'उबाऊ' लगती थी। उसे खेत की मिट्टी, गाय-भैंस का गोबर और सादा खाना बिल्कुल पसंद नहीं था।
मोहन के गाँव में अक्सर शहर से कुछ लोग छुट्टियाँ मनाने आते थे। वे लोग चमकदार गाड़ियाँ लाते, महँगे कपड़े पहनते और शहर की चकाचौंध की बड़ी-बड़ी बातें करते थे।
मोहन उन्हें देखकर सोचता: "वाह! शहर की ज़िंदगी कितनी शानदार है। वहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, सिनेमा है, चमक-दमक है और पैसा कमाना कितना आसान है। यह गाँव तो बिल्कुल बेकार है। मुझे तो शहर जाकर बाबू बनना है।"
शहर की तरफ उड़ान: एक दिन मोहन ने ज़िद पकड़ ली। उसने अपने पिता से थोड़े पैसे लिए और बिना कोई हुनर सीखे सपनो के शहर (मुंबई/दिल्ली) की ट्रेन पकड़ ली।
जब मोहन ट्रेन से उतरा, तो बड़ी-बड़ी इमारतें और गाड़ियों की भीड़ देखकर उसकी आँखें फटी रह गईं। उसे लगा कि वह स्वर्ग में आ गया है। लेकिन, उसका यह भ्रम कुछ ही दिनों में बुरी तरह टूटने वाला था।
सपनों का टूटना: शहर में मोहन को न तो कोई अच्छी नौकरी मिली और न ही रहने के लिए कोई साफ जगह। जब उसके पैसे खत्म हो गए, तो उसे मजबूरी में एक बहुत ही घुटन भरी 'कपड़े की फैक्ट्री' में मज़दूरी करनी पड़ी।
जहाँ गाँव में वह खुले आसमान के नीचे सोता था, यहाँ उसे एक गंदी और सीलन भरी छोटी सी 'झुग्गी' में दस लोगों के साथ सोना पड़ता था।
जहाँ गाँव में उसे माँ के हाथ की ताज़ी रोटियाँ और शुद्ध दूध मिलता था, यहाँ उसे सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाला रूखा-सूखा और बासी खाना खाना पड़ता था। शहर के धुएँ और प्रदूषण से उसे खाँसी हो गई। फैक्ट्री के मालिक की गालियाँ सुनकर वह रात-रात भर रोता था।
अब मोहन को अपने शांतिपुर गाँव की ताज़ी हवा, अपने पिता का प्यार और खेतों की शांति बहुत याद आने लगी।
एक साल बाद, मोहन जैसे-तैसे कुछ पैसे बचाकर वापस अपने गाँव लौट आया। जब वह गाँव पहुँचा, तो उसका शरीर कमज़ोर हो चुका था और कपड़े फटे हुए थे। उसके पिता ने उसे गले से लगा लिया।
शाम को जब मोहन ने अपने पिता को शहर की असलियत, वहाँ की मज़दूरी और झुग्गियों की गंदी ज़िंदगी के बारे में बताया, तो उसके पिता ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा:
"बेटा! इंसान को अक्सर वह ज़िंदगी अच्छी लगती है जो उसके पास नहीं होती। जब तुम गाँव में थे, तो तुम्हें शहर की चकाचौंध लुभा रही थी, क्योंकि तुमने केवल उसकी बाहरी चमक देखी थी, उसका संघर्ष नहीं। इसी को कहते हैं— 'दूर के ढोल सुहावने'!" (यानी जब ढोल दूर बजता है तो उसकी आवाज़ मीठी लगती है, लेकिन जो ढोल के बिल्कुल पास खड़ा होता है, उसके कान फटने लगते हैं)।
उस दिन के बाद मोहन ने कभी गाँव छोड़कर जाने की ज़िद नहीं की और खुशी-खुशी अपने खेतों में मेहनत करने लगा।
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